भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 439, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंफाँसी से पहले साथियों को
भगतसिंह का अन्तिम पत्र
22 मार्च, 1931
साथियो,
स्वाभाविक है कि जीने की इच्छा मुझमें भी होनी चाहिए, मैं इसे छिपाना नहीं
चाहता। लेकिन मैं एक शर्त पर ज़िन्दा रह सकता हूँ, कि मैं क़ैद होकर या पाबन्द
होकर जीना नहीं चाहता।
मेरा नाम हिन्दुस्तानी क्रान्ति का प्रतीक बन चुका है और क्रान्तिकारी दल के
आदर्शों और कुर्बानियों ने मुझे बहुत ऊँचा उठा दिया है – इतना ऊँचा कि जीवित
रहने की स्थिति में इससे ऊँचा मैं हरगिज़ नहीं हो सकता।
आज मेरी कमज़ोरियाँ जनता के सामने नहीं हैं। अगर मैं फाँसी से बच गया
तो वे ज़ाहिर हो जायेंगी और क्रान्ति का प्रतीक-चिह्न मद्धिम पड़ जायेगा या सम्भवतः
मिट ही जाये। लेकिन दिलेराना ढंग से हँसते-हँसते मेरे फाँसी चढ़ने की सूरत में
हिन्दुस्तानी माताएँ अपने बच्चों के भगतसिंह बनने की आरज़ू किया करेंगी और देश
की आज़ादी के लिए कुर्बानी देने वालों की तादाद इतनी बढ़ जायेगी कि क्रान्ति
को रोकना साम्राज्यवाद या तमाम शैतानी शक्तियों के बूते की बात नहीं रहेगी।
हाँ, एक विचार आज भी मेरे मन में आता है कि देश और मानवता के लिए
जो कुछ करने की हसरतें मेरे दिल में थीं, उनका हज़ारवाँ भाग भी पूरा नहीं कर
सका। अगर स्वतन्त्र, ज़िन्दा रह सकता तब शायद इन्हें पूरा करने का अवसर मिलता
और मैं अपनी हसरतें पूरी कर सकता।
इसके सिवाय मेरे मन में कभी कोई लालच फाँसी से बचे रहने का नहीं आया।
मुझसे अधिक सौभाग्यशाली कौन होगा? आजकल मुझे स्वयं पर बहुत गर्व है। अब
तो बड़ी बेताबी से अन्तिम परीक्षा का इन्तज़ार है। कामना है कि यह और नज़दीक
हो जाये।
आपका साथी,
भगतसिंह
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 433