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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 427, कुल 788 में से

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पृष्ठ 427

सुखदेव का तायाजी के नाम पत्र¹
बोर्स्टल, लाहौर
मान्य ताया जी,
दो पत्र पहले लिख चुका हूँ। कोई उत्तर नहीं मिला।
मैं सुन रहा हूँ मेरे कारण आपको बहुत कुछ मानसिक कष्ट उठाना पड़ रहा
है इसके पूर्व भी इस ख़याल से आपको पत्र द्वारा कहने की चेष्टा की है। अब फिर
वही कह रहा हूँ।
मैं जानता हूँ कि आपको मेरे स्वभाव (मूलपत्र में 'स्वाभाव' लिखा है। – स.
) के कारण बहुत चिन्तित रहना पड़ता है और मैं यह भी चाहता हूँ कि आपकी
यह चिन्ता किसी प्रकार दूर हो जाये। ख़ासकर इन दिनों में जबकि आपके लिए
दूसरे कष्ट काफ़ी इकट्ठा हो रहे हैं। परन्तु एक बात मैं आपसे साफ़ कहना चाहता
हूँ। मुझसे कोई बात सिर्फ़ इसीलिए कि उससे दूसरे खुश होंगे – नहीं हो सकती।
दाढ़ी ही की बात लीजिये। भला इससे आपको इतना दुखी होने की क्या
आवश्यकता थी। जैसे दाढ़ी-मूँछ कटाना एक फ़ैशन है वैसे ही दाढ़ी रखना भी तो
एक फ़ैशन ही है। अब क्या किसी व्यक्ति को इस बारे में भी माता-पिता द्वारा इतना
बाध्य होना पड़ेगा और उसे सर, दाढ़ी और मूँछ के बाल अपने माता-पिता की इच्छा
पर ही रखाने या कटाने चाहिए। तो क्या वे लोग जो दाढ़ी इत्यादि धर्म अथवा
माँ-बाप की ख़ातिर या रूढ़ी को क़ायम रखने की ख़ातिर रखते हैं ऐसा करने में
(justified) हुए न। मैं नहीं समझता कि आप जैसे स्वतन्त्र विचार रखने वाला पुरुष
क्यों अपने पुत्र से ऐसी आशा करता है कि वह मामूली-मामूली बात करने में इस
बात का विचार रखे कि उसके वैसा करने से उसका पिता तो बुरा नहीं मानेगा।
और वह आदमी आज़ाद विचारों वाला ही कैसे हो सकता है जो दूसरे व्यक्ति को
उसके अपनी इच्छानुसार करने पर बुरा समझे जबकि वह बात कोई ऐसी नहीं है
जिसे बुरी दृष्टि से (Morally) देखा जाना चाहिए।
हाँ, एक बात और है, शायद आपका यह विचार होता होगा कि इससे मैं
बदसूरत मालूम होता हूँ और मैं जान-बूझकर अपनी हालत ज़्यादा गन्दी रखना चाहता
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 421