भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 424, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंमुझे यक़ीन है कि आपको यह बात याद होगी कि आप आरम्भ से ही मुझसे
यह बात मनवा लेने की कोशिशें करते रहे हैं कि मैं अपना मुक़दमा संजीदगी से
लड़ूँ और अपना बचाव ठीक से प्रस्तुत करूँ, लेकिन आपको यह भी मालूम है
कि मैं सदा इसका विरोध करता रहा हूँ। मैंने कभी भी अपना बचाव करने की इच्छा
प्रकट नहीं की और न ही मैंने कभी इस पर संजीदगी से गौर किया है।
आप जानते हैं कि हम एक निश्चित नीति के अनुसार मुक़दमा लड़ रहे हैं।
..मेरा हर क़दम इस नीति, मेरे सिद्धान्तों और हमारे कार्यक्रम के अनुरूप होना
चाहिए। आज स्थितियाँ बिल्कुल अलग हैं। लेकिन अगर स्थितियाँ इससे कुछ और
भी अलग होतीं तो भी मैं अन्तिम व्यक्ति होता जो बचाव प्रस्तुत करता। इस पूरे
मुक़दमे में मेरे सामने एक ही विचार था और वह यह कि हमारे विरुद्ध जो संगीन
आरोप लगाये गये हैं, बावजूद उनके हम पूर्णतया इस सम्बन्ध में अवहेलना का
व्यवहार करें। मेरा नज़रिय यह रहा है कि सभी राजनीतिक कार्यकर्ताओं को ऐसी
स्थितियों में उपेक्षा दिखानी चाहिए और उनको जो भी कठोरतम सज़ा दी जाये, वह
उन्हें हँसते-हँसते बरदाश्त करनी चाहिए। इस पूरे मुक़दमे के दौरान हमारी योजना
इसी सिद्धान्त के अनुरूप रही है। हम ऐसा करने में सफल हुए या नहीं, यह फ़ैसला
करना मेरा काम नहीं। हम खुदगर्जी को त्यागकर अपना काम कर रहे हैं।
वायसराय ने लाहौर साज़िश केस आर्डिनेंस जारी करते हुए इसके साथ जो
वक्तव्य दिया था, उसमें उन्होंने कहा था कि इस साज़िश के मुजरिम
शान्ति-व्यवस्था को समाप्त करने के प्रयास कर रहे हैं। इससे जो हालात पैदा हुए
उसने हमें यह मौक़ा दिया कि हम जनता के समक्ष यह बात प्रस्तुत करें कि वह
स्वयं देख ले कि शान्ति-व्यवस्था एवं क़ानून समाप्त करने की कोशिशें हम कर
रहे हैं या हमारे विरोधी? इस बात पर मतभेद हो सकते हैं। शायद आप भी उनमें
से एक हों जो इस बात पर मतभेद रखते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि
आप मुझसे सलाह किये बिना मेरी ओर से ऐसे क़दम उठायें। मेरी ज़िन्दगी इतनी
क़ीमती नहीं जितनी कि आप सोचते हैं। कम से कम मेरे लिए तो इस जीवन की
इतनी क़ीमत नहीं कि इसे सिद्धान्तों को कुर्बान करके बचाया जाये। मेरे अलावा
मेरे और साथी भी हैं जिनके मुक़दमे इतने ही संगीन हैं जितना कि मेरा मुक़दमा।
हमने एक संयुक्त योजना अपनायी है और इस योजना पर हम अन्तिम समय तक
डटे रहेंगे। हमें इस बात की कोई परवाह नहीं कि हमें व्यक्तिगत रूप में इस बात
के लिए कितना मूल्य चुकाना पड़ेगा।
पिता जी, मैं बहुत दुख का अनुभव कर रहा हूँ। मुझे भय है, आप पर दोषारोपण
करते हुए या इससे बढ़कर आपके इस काम की निन्दा करते हुए मैं कहीं सभ्यता
की सीमाएँ न लाँघ जाऊँ और मेरे शब्द ज़्यादा सख्त़ न हो जायें। लेकिन मैं स्पष्ट
शब्दों में अपनी बात अवश्य कहूँगा। यदि कोई अन्य व्यक्ति मुझसे ऐसा व्यवहार
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