भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 442, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंवैद्य ही बनने का उपदेश न देना, बल्कि साथ ही साथ मनुष्य बनना भी बतलाना।
आजकल मनुष्य वही हो सकता है जिसे वर्तमान वातावरण का ज्ञान हो, जो मनुष्य
के कर्तव्य को जानता ही न हो परन्तु उसका पालन भी करता हो। इसलिए समाज
की धरोहर को आलस्य तथा आरामतलबी तथा स्वार्थपरता में डालकर समाज के
सामने कृतघ्न न साबित हो। इससे शारीरिक तथा मानसिक दोनों ही प्रकार की
उन्नति करता रहे, क्योंकि दोनों आवश्यक हैं। शारीरिक पुष्टि अन्न तथा व्यायाम
से तथा मानसिक अध्ययन से। उसे आजकल के वातावरण का ज्ञान करने के लिए
समाचारपत्र तथा ऐतिहासिक, साम्पत्तिक तथा राजनीतिक, सामाजिक पुस्तकों का
अवलोकन (अध्ययन) को कहिये। समाज से मेरा मतलब आर्य समाज अथवा अन्य
संकीर्णताव्यंजक समाज नहीं है, परन्तु जन-साधारण का है। क्योंकि ये धार्मिक
समाज मेरे सामने संकीर्ण होने के कारण कोई भी मूल्य नहीं रखते हैं और साथ
ही इस संकीर्णता तथा स्वार्थपरता तथा अन्यायपूर्ण होने के कारण सब धर्मों से दूर
रहना चाहता हूँ और दूसरों को भी ऐसा ही उपदेश देता हूँ। केवल एक बात मानता
हूँ (और) उसको सबसे बढ़कर तथा मनुष्य तथा समाज का (के लिए)
कल्याणकारी समझता हूँ। वह है, “मनुष्य का मनुष्य तथा प्राणी-मात्र के साथ
कर्तव्य – बिना किसी जाति-भेद, रंग-भेद, धर्म तथा धन-भेद के।” यही मेरा
उपदेश बेटी सरोजिनी को है और दूसरे हमारे भाइयों को भी है।
पूज्यवर, आज जब मैं देखता हूँ कि सबकी बहनें समाज की सेवा के लिए
अपने को तन, मन, धन से लगाये हुए हैं, अभागा मैं ही ऐसा हूँ जिसकी ऐसी कोई
बहन नहीं। यद्यपि यह मेरी संकीर्णता है क्योंकि अपने मन के अनुसार दूसरी बहनें
भी अपनी ही हैं और वैसी ही समझता भी हूँ, परन्तु मैं उनकी संख्या में बढ़ती
चाहता हूँ, जिसकी कुछ आशा में अपनी पूजनीय जिया महताब कुँवरि से करता
था। उनका बहुत समय से कोई समाचार नहीं पाया है। यदि हो सके, मेरा
चरण-स्पर्श कहियेगा। श्रीमान दादा जी सरदार सिंह जी को, जो मेरे पहले-पहल
गुरु और आपके शिष्य हैं, सादर प्रणाम कहें। धनराज सिंह का हाल लिखना। चाचा
वर्ग तथा सब माताओं को चरण-स्पर्श, भाइयों को नमस्ते। पूज्य बुआ जी तथा माता
जी को प्रणाम, लली दोनों बहनों को, मुंशी सिंह जी को नमस्कार, भानजे तथा
भतीजों को प्यार। इति शुभम। पत्र शीघ्र भेजियेगा।
पता : महावीर सिंह पी.आई. 68 आपका आज्ञाकारी पुत्र,
सेल्युलर जेल, पोर्टब्लेयर (अण्डमान) महावीर
436 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़