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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

नौजवान भारत सभा,
लाहौर का घोषणापत्र
भगतसिंह और भगवतीचरण वोहरा ने नौजवानों और विद्यार्थियों को संगठित
करने के प्रयास 1926 से ही शुरू कर दिये थे। अमृतसर में 11, 12, 13 अप्रैल,
1928 को हुए नौजवान भारत सभा के सम्मेलन के लिए सभा का घोषणापत्र तैयार
किया गया। भगतसिंह इस सभा के महासचिव और भगवतीचरण वोहरा प्रचार-सचिव
बने।
नौजवान साथियो,
हमारा देश एक अव्यवस्था की स्थिति से गुज़र रहा है। चारों तरफ़ एक-दूसरे
के प्रति अविश्वास और हताशा का साम्राज्य है। देश के बड़े नेताओं ने अपने आदर्श
के प्रति आस्था खो दी है और उनमें से अधिकांश को जनता का विश्वास प्राप्त
नहीं है। भारत की आज़ादी के पैरोकारों के पास कोई कार्यक्रम नहीं है, और उनमें
उत्साह का अभाव है। चारों तरफ़ अराजकता है। लेकिन किसी राष्ट्र के निर्माण की
प्रक्रिया में अराजकता एक अनिवार्य तथा आवश्यक दौर है। ऐसी ही नाज़ुक घड़ियों
में कार्यकर्ताओं की ईमानदारी की परख होती है, उनके चरित्र का निर्माण होता है,
वास्तविक कार्यक्रम बनता है, और तब नये उत्साह, नयी आशाओं, नये विश्वास
और नये जोशो-खरोश के साथ काम आरम्भ होता है। इसलिए इसमें मन ओछा करने
की कोई बात नहीं है।
हम अपनेआप को एक नये युग के द्वार पर खड़ा पाकर बड़े भाग्यशाली हैं।
अंग्रेज़ नौकरशाही के बड़े पैमाने पर गुणगान करने वाले गीत अब सुनायी नहीं देते।
अंग्रेज़ का हमसे यह ऐतिहासिक प्रश्न है कि “तुम तलवार से प्रशासित होगे या
क़लम से?” अब ऐसा नहीं रहा कि उसका उत्तर न दिया जाता हो। लॉर्ड बर्केनहेड
के शब्दों में, “हमने भारत को तलवार के सहारे जीता और तलवार के बल से ही
हम उसे अपने हाथ में रखेंगे।” इस खरेपन ने अब सबकुछ साफ़ कर दिया है।
जलियाँवाला और मानावाला के अत्याचारों को याद करने के बाद यह उद्धृत करना
कि “अच्छी सरकार स्वशासन का स्थान नहीं ले सकती”, बेहूदगी ही कही
नौजवान भारत सभा और राष्ट्रीय नेतृत्व का मूल्यांकन / 299

जायेगी। यह बात तो स्वतः स्पष्ट है।
भारत में अंग्रेज़ी हुकूमत की दी हुई सुख-सम्पदाओं के बारे में भी सुन
लीजिये।
भारत के उद्योग-धन्धों के पतन और विनाश के बारे में बतौर गवाही क्या
रमेशचन्द्र दत्त, विलियम डिगबी और दादा भाई नौरोजी के सारे ग्रन्थों को उद्धृत
करने की आवश्यकता होगी? क्या इस बात को साबित करने के लिए कोई प्रमाण
जुटाना पड़ेगा कि अपनी उपजाऊ भूमि तथा खानों के बावजूद आज भारत सबसे
ग़रीब देशों में से एक है, कि भारत जो अपनी महान सभ्यता पर गर्व कर सकता
था आज बहुत पिछड़ा हुआ देश है, जहाँ साक्षरता का अनुपात केवल पाँच प्रतिशत
है? क्या लोग यह नहीं जानते कि भारत में सबसे अधिक लोग मरते हैं और यहाँ
बच्चों की मौत का अनुपात दुनिया में सबसे ऊँचा है? प्लेग, हैजा, इनफ़्लुएंज़ा तथा
इसी प्रकार की अन्य महामारियाँ आये दिन की व्याधियाँ बनती जा रही हैं? क्या
बार-बार यह सुनना कि हम स्वशासन के योग्य नहीं हैं, एक अपमानजनक बात
नहीं है? क्या यह तौहीन की बात नहीं है कि गुरु गोविन्द सिंह, शिवाजी और हरी
सिंह जैसे शूरवीरों के बाद भी हमसे कहा जाये कि हममें अपनी रक्षा करने की
क्षमता नहीं है? खेद है कि हमने अपने वाणिज्य और व्यवसाय को उसकी
शैशवावस्था में ही कुचला जाते नहीं देखा। जब बाबा गुरुदत्त सिंह ने 1914 में गुरु
नानक स्टीमशिप चालू करने का पहला प्रयास किया था तो दूर देश कनाडा में और
भारत आते समय उनके साथ अमानवीय व्यवहार किया गया और अन्त में बज-बज
के बन्दरगाह पर उन साहसी मुसाफ़िरों का गोलियों से खूनी स्वागत किया गया।
और भी क्या कुछ नहीं किया गया? क्या हमने यह सब नहीं देखा? उस भारत में
जहाँ एक द्रौपदी के सम्मान की रक्षा में महाभारत जैसा महायुद्ध लड़ा गया था, वहाँ
1919 में दर्जनों द्रौपदियों को बेइज़्ज़त किया गया, उनके नंगे चेहरों पर थूका गया।
क्या हमने यह सब नहीं देखा? फिर भी हम मौजूदा व्यवस्था से सन्तुष्ट हैं। क्या
यह जीने योग्य ज़िन्दगी है?
क्या हमें यह महसूस कराने के लिए कि हम गुलाम हैं और हमें आज़ाद होना
चाहिए, किसी दैवी ज्ञान या आकाशवाणी की आवश्यकता है? क्या हम अवसर
की प्रतीक्षा करेंगे या किसी अज्ञात की प्रतीक्षा करेंगे कि हमें महसूस कराये कि
हम दलित लोग हैं? क्या हम इन्तज़ार में बैठे रहेंगे कि कोई दैवी सहायता आ जाये
या फिर कोई जादू हो जाये कि हम आज़ाद हो जायें? क्या हम आज़ादी के बुनियादी
सिद्धान्तों से अनभिज्ञ हैं? “जिन्हें आज़ाद होना है उन्हें स्वयं चोट करनी पड़ेगी।”
नौजवानो जागो, उठो, हम काफ़ी देर सो चुके!
हमने केवल नौजवानों से ही अपील की है क्योंकि नौजवान बहादुर होते हैं,
उदार एवं भावुक होते हैं, क्योंकि नौजवान भीषण अमानवीय यन्त्रणाओं को मुस्कुराते
300 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

हुए बरदाश्त कर लेते हैं और बग़ैर किसी प्रकार की हिचकिचाहट के मौत का
सामना करते हैं, क्योंकि मानव-प्रगति का सम्पूर्ण इतिहास नौजवान आदमियों तथा
औरतों के ख़ून से लिखा है; क्योंकि सुधार हमेशा नौजवानों की शक्ति, साहस,
आत्मबलिदान और भावात्मक विश्वास के बल पर ही प्राप्त हुए हैं - ऐसे नौजवान
जो भय से परिचित नहीं हैं और जो सोचने के बजाय दिल से महसूस कहीं अधिक
करते हैं।
क्या ये जापान के नौजवान नहीं थे जिन्होंने पोर्ट आर्थर तक पहुँचने के लिए
सूखा रास्ता बनाने के उद्देश्य से अपनेआप को सैकड़ों की तादाद में खाइयों में झोंक
दिया था? और जापान आज विश्व के सबसे आगे बढ़े हुए देशों में से एक है। क्या
यह पोलैण्ड के नौजवान नहीं थे जिन्होंने पिछली पूरी शताब्दीभर बार-बार संघर्ष
किये, पराजित हुए और फिर बहादुरी के साथ लड़े? और आज एक आज़ाद पोलैण्ड
हमारे सामने है। इटली को आस्ट्रिया के जुवे से किसने आज़ाद किया था? तरुण
इटली ने!
युवा तुर्कों ने जो कमाल दिखलाया, क्या आप उसे जानते हैं? चीन के नौजवान
जो कर रहे हैं, उसे क्या आप रोज़ समाचारपत्रों में नहीं पढ़ते हैं? क्या यह रूस के
नौजवान नहीं थे जिन्होंने रूसियों के उद्धार के लिए अपनी जानें कुर्बान कर दी थीं?
पिछली शताब्दीभर लगातार केवल समाजवादी परचे बाँटने के अपराध में
सैकड़ों-हज़ारों की संख्या में उन्हें साइबेरिया में जलावत़न किया गया था,
दोस्तोयेव्स्की जैसे लोगों को सिर्फ़ इसलिए जेलों में बन्द किया गया कि वे
समाजवादी डिबेटिंग (बहस-मुबाहसा चलाने वाली) सोसाइटी के सदस्य थे।
बार-बार उन्होंने दमन के तूफ़ान का सामना किया, लेकिन उन्होंने साहस नहीं
खोया। ये संघर्षरत नौजवान थे। और सब जगह नौजवान ही निडर होकर बग़ैर किसी
हिचकिचाहट के और बग़ैर (लम्बी-चौड़ी) उम्मीदें बाँधे लड़ सकते हैं। और आज
हम महान रूस में विश्व के मुक्तिदाता के दर्शन कर सकते हैं।
जबकि हम भारतवासी, हम क्या कर रहे हैं? पीपल की एक डाल टूटते ही
हिन्दुओं की धार्मिक भावनाएँ चोटिल हो उठती हैं! बुतों को तोड़ने वाले मुसलमानों
के ताजिये नामक काग़ज़ के बुत का कोना फटते ही अल्लाह का प्रकोप जाग उठता
है और फिर वह ‘नापाक’ हिन्दुओं के ख़ून से कम किसी वस्तु से सन्तुष्ट नहीं
होता! मनुष्य को पशुओं से अधिक महत्त्व दिया जाना चाहिए, लेकिन यहाँ भारत
में लोग पवित्र पशु के नाम पर एक-दूसरे का सिर फोड़ते हैं।
हमारे बीच और भी बहुत से लोग हैं जो अपने आलसीपन को
अन्तरराष्ट्रीयतावाद की निरर्थक बकवास के पीछे छिपाते हैं। जब उनसे अपने देश
की सेवा करने को कहा जाता है तो वे कहते हैं, “श्रीमानजी, हम लोग जगत-बन्धु
हैं और सार्वभौमिक भाईचारे में विश्वास करते हैं। हमें अंग्रेजों से नहीं झगड़ना
नौजवान भारत सभा और राष्ट्रीय नेतृत्व का मूल्यांकन / 301

चाहिए। वे हमारे भाई हैं।” क्या खूब विचार है, क्या खूबसूरत शब्दावली है! लेकिन
वे इसके उलझाव को नहीं पकड़ पाते। सार्वभौमिक भाईचारे के सिद्धान्त की माँग
है कि मनुष्य द्वारा मनुष्य का और राष्ट्र द्वारा राष्ट्र का शोषण असम्भव बना दिया
जाये, सबको बगैर किसी भेदभाव के समान अवसर प्रदान किये जायें। भारत में
ब्रिटिश शासन इन सब बातों का ठीक उल्टा है और हम उससे किसी प्रकार का
सरोकार नहीं रखेंगे।
अब दो शब्द समाजसेवा के बारे में। बहुत से नेक मनुष्य सोचते हैं कि
समाजसेवा (उन संकुचित अर्थों में जिनमें हमारे देश में इस शब्द का प्रयोग किया
जाता है और समझा जाता है) हमारी सभी बीमारियों का इलाज है और देशसेवा
का सबसे अच्छा तरीक़ा है। इस प्रकार हम देखते हैं कि बहुत से ईमानदार नौजवान
सारी ज़िन्दगी ग़रीबों में अनाज बाँटकर या बीमारों की सेवा करके ही सन्तुष्ट हो
जाते हैं। ये अच्छे और आत्मत्यागी लोग हैं लेकिन वे यह समझ पाने में असमर्थ
हैं कि भारत में भूख और बीमारी की समस्या को ख़ैरात के माध्यम से हल नहीं
किया जा सकता।
धार्मिक अन्धविश्वास और कट्टरपन हमारी प्रगति में बहुत बड़े बाधक हैं।
वे हमारे रास्ते के रोड़े साबित हुए हैं और हमें उनसे हर हालत में छुटकारा पा
लेना चाहिए। “जो चीज़ आज़ाद विचारों को बरदाश्त नहीं कर सकती उसे समाप्त
हो जाना चाहिए।” इसी प्रकार की और भी बहुत-सी कमज़ोरियाँ हैं जिन पर हमें
विजय पानी है। हिन्दुओं का दकियानूसीपन और कट्टरपन, मुसलमानों की
धर्मान्धता तथा दूसरे देशों के प्रति लगाव और आमतौर पर सभी सम्प्रदायों के
लोगों का संकुचित दृष्टिकोण आदि बातों का विदेशी शत्रु हमेशा लाभ उठाता है।
इस काम के लिए सभी समुदायों के क्रान्तिकारी उत्साह वाले नौजवानों की
आवश्यकता है।
हमने कुछ भी हासिल नहीं किया और हम किसी भी उपलब्धि के लिए
कुछ भी त्याग करने को तैयार नहीं हैं। सम्भावित उपलब्धि में किस सम्प्रदाय का
क्या हिस्सा होगा, यह तय करने में हमारे नेता आपस में झगड़ रहे हैं। महज
अपनी बुज़दिली को और आत्मत्याग की भावना के अभाव को छिपाने के लिए
वे असली समस्या पर पर्दा डालकर नक़ली समस्याएँ खड़ी कर रहे हैं। ये
आरामतलब राजनीतिज्ञ हड्डियों के उन मुट्ठीभर टुकड़ों पर आँखें गड़ाये बैठे हैं
जिन्हें, जैसा उनका विश्वास है, सशक्त शासकगण उनके सामने फेंक सकते हैं।
यह बहुत ही अपमानजनक बात है। जो लोग आज़ादी की लड़ाई में बढ़कर आते
हैं वे बैठकर यह तय नहीं कर सकते कि इतने त्याग के बाद उनकी क़ामयाबी
होगी और उसमें उन्हें इतना हिस्सा सुनिश्चित रहना चाहिए। इस प्रकार के लोग
कभी भी किसी प्रकार का त्याग नहीं करते। हमें ऐसे लोगों की आवश्यकता है
302 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

जो बग़ैर उम्मीदों के, निर्भय होकर और बग़ैर किसी प्रकार की हिचकिचाहट के
लड़ने को तैयार हों और बग़ैर सम्मान के, बग़ैर आँसू बहाने वालों के और बग़ैर
प्रशस्तिगान के मृत्यु का आलिंगन करने को तैयार हों। इस प्रकार के उत्साह के
अभाव में हम दो मोर्चों वाले उस महान युद्ध को नहीं लड़ सकेंगे, जिसे हमें
लड़ना है – यह युद्ध दो मोर्चों वाला है, क्योंकि हमें एक तरफ़ अन्दरूनी शत्रु से
लड़ना है और दूसरी तरफ़ बाहरी दुश्मन से। हमारी असली लड़ाई स्वयं अपनी
अयोग्यताओं के ख़िलाफ़ है। हमारा शत्रु और कुछ हमारे अपने लोग निजी स्वार्थ
के लिए उनका फ़ायदा उठाते हैं।
पंजाब के नौजवानो, दूसरे प्रान्तों के युवक अपने क्षेत्रों में जी-तोड़ परिश्रम कर
रहे हैं। बंगाल के नौजवानों ने 3 फ़रवरी को जिस जागृति तथा संगठन-क्षमता का
परिचय दिया उससे हमें सबक लेना चाहिए। अपनी तमाम कुर्बानियों के बावजूद
हमारे पंजाब को राजनीतिक तौर पर पिछड़ा हुआ प्रान्त कहा जाता है। क्यों? क्योंकि
लड़ाकू क़ौम होने के बावजूद हम संगठित एवं अनुशासित नहीं हैं। हमें तक्षशिला
विश्वविद्यालय पर गर्व है, लेकिन आज हमारे पास संस्कृति का अभाव है और
संस्कृति के लिए उच्चकोटि का साहित्य चाहिए, जिसकी संरचना सुविकसित भाषा
के अभाव में नहीं हो सकती। दुख की बात है कि आज हमारे पास उनमें से कुछ
भी नहीं है।
देश के सामने उपस्थित उपरोक्त प्रश्नों का समाधान तलाश करने के
साथ-साथ हमें अपनी जनता को आने वाले महान संघर्ष के लिए भी तैयार करना
पड़ेगा। हमारी राजनीतिक लड़ाई 1857 के स्वतन्त्रता संग्राम के ठीक बाद से ही
आरम्भ हो गयी थी। वह कई दौरों से होकर गुज़र चुकी है। बीसवीं शताब्दी के
आरम्भ से अंग्रेज़ नौकरशाही ने भारत के प्रति एक नयी नीति अपनायी है। वे हमारे
देश के पूँजीपति तथा निम्नपूँजीपति वर्ग को सहूलियतें देकर उन्हें अपनी तरफ़ मिला
रहे हैं। दोनों का हित एक हो रहा है। भारत में ब्रिटिश पूँजी के अधिकाधिक प्रवेश
का अनिवार्यतः यही परिणाम होगा। निकट भविष्य में बहुत शीघ्र हम उस वर्ग को
तथा उसके नेताओं को विदेशी शासकों के साथ जाते देखेंगे। किसी गोलमेज
कॉन्फ्रेंस या इसी प्रकार की और किसी संस्था द्वारा दोनों के बीच समझौता हो
जायेगा। तब उनमें शेर और लोमड़ी के बच्चे का रिश्ता नहीं रह जायेगा। समस्त
भारतीय जनता के आने वाले महान संघर्ष के भय से आज़ादी के इन तथाकथित
पैरोकारों की क़तारों की दूरी बग़ैर किसी समझौते के भी कम हो जायेगी।
देश को तैयार करने के भावी कार्यक्रम का शुभारम्भ इस आदर्श वाक्य से
होगा – “क्रान्ति जनता द्वारा, जनता के हित में।” दूसरे शब्दों में, 98 प्रतिशत के
लिए स्वराज्य। स्वराज्य, जनता द्वारा प्राप्त ही नहीं, बल्कि जनता के लिए भी। यह
एक बहुत कठिन काम है। यद्यपि हमारे नेताओं ने बहुत से सुझाव दिये हैं लेकिन
नौजवान भारत सभा और राष्ट्रीय नेतृत्व का मूल्यांकन / 303

जनता को जगाने के लिए कोई योजना पेश करके उस पर अमल करने का
किसी ने भी साहस नहीं किया। विस्तार में गये बग़ैर हम यह दावे से कह सकते
हैं कि अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए रूसी नवयुवकों की भाँति हमारे हज़ारों
मेधावी नौजवानों को अपना बहुमूल्य जीवन गाँवों में बिताना पड़ेगा और लोगों को
समझाना पड़ेगा कि भारतीय क्रान्ति वास्तव में क्या होगी। उन्हें समझाना पड़ेगा
कि आने वाली क्रान्ति का मतलब केवल मालिकों की तब्दीली नहीं होगा।
उसका अर्थ होगा नयी व्यवस्था का जन्म – एक नयी राजसत्ता। यह एक दिन या
एक वर्ष का काम नहीं है। कई दशकों का अद्वितीय आत्मबलिदान ही जनता को
उस महान कार्य के लिए तत्पर कर सकेगा और इस कार्य को केवल क्रान्तिकारी
युवक ही पूरा कर सकेंगे। क्रान्तिकारी से लामुहाला एक बम और पिस्तौल वाले
आदमी से अभिप्राय नहीं है।
युवकों के सामने जो काम है, वह काफ़ी कठिन है और उनके साधन बहुत
थोड़े हैं। उनके मार्ग में बहुत-सी बाधाएँ भी आ सकती हैं। लेकिन थोड़े किन्तु
निष्ठावान व्यक्तियों की लगन उन पर विजय पा सकती है। युवकों को आगे जाना
चाहिए। उनके सामने जो कठिन एवं बाधाओं से भरा हुआ मार्ग है, और उन्हें जो
महान कार्य सम्पन्न करना है, उसे समझना होगा। उन्हें अपने दिल में यह बात रख
लेनी चाहिए कि “सफलता मात्र एक संयोग है, जबकि बलिदान एक नियम है।”
उनके जीवन अनवरत असफलताओं के जीवन हो सकते हैं – गुरु गोविन्द सिंह को
आजीवन जिन नारकीय परिस्थितियों का सामना करना पड़ा था, हो सकता है उससे
भी अधिक नारकीय परिस्थितियों का सामना करना पड़े। फिर भी उन्हें यह कहकर
कि अरे, यह सब तो भ्रम था, पश्चाताप नहीं करना होगा।
नौजवान दोस्तो, इतनी बड़ी लड़ाई में अपनेआप को अकेला पाकर हताश मत
होना। अपनी शक्ति को पहचानो। अपने ऊपर भरोसा करो। सफलता आपकी है।
धनहीन, निस्सहाय एवं साधनहीन अवस्था में भाग्य आज़माने के लिए अपने पुत्र
को घर से बाहर भेजते समय जेम्स गैरीबाल्डी की महान जननी ने उससे जो शब्द
कहे थे (उन्हें) याद रखो। उसने कहा, “दस में से नौ बार एक नौजवान के साथ
जो सबसे अच्छी घटना हो सकती है वह यह है कि उसे जहाज़ की छत पर से
समुद्र में फेंक दिया जाये ताकि वह तैरकर या डूबकर स्वयं अपना रास्ता तय करे।”
प्रणाम है उस माँ को जिसने ये शब्द कहे और प्रणाम है उन लोगों को जो इन शब्दों
पर अमल करेंगे।
इतालवी पुनरुत्थान के प्रसिद्ध विद्वान मैजिनी ने एक बार कहा था, “सभी
महान राष्ट्रीय आन्दोलनों का शुभारम्भ जनता के अविख्यात या अनजाने,
ग़ैर-प्रभावशाली व्यक्तियों से होता है, जिनके पास समय और बाधाओं की परवाह
न करने वाला विश्वास तथा इच्छा-शक्ति के अलावा और कुछ नहीं होता।” जीवन
304 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

सेन्ट्रल असेंबली बम काण्ड, पर्चे एवं ऐतिहासिक अदालती बयान

की नौका को लंगर उठाने दो। उसे सागर की लहरों पर तैरने दो और फिर –
लंगर ठहरे हुए छिछले पानी में पड़ता है।
विस्तृत और आश्चर्यजनक सागर पर विश्वास करो
जहाँ ज्वार हर समय ताज़ा रहता है
और शक्तिशाली धाराएँ स्वतन्त्र होती हैं –
वहाँ अनायास, ऐ नौजवान कोलम्बस
सत्य का तुम्हारा नया विश्व हो सकता है।
मत हिचको, अवतार के सिद्धान्त को लेकर अपना दिमाग़ परेशान मत करो
और उसे तुम्हें हतोत्साहित मत करने दो। हर व्यक्ति महान हो सकता है, बशर्ते
कि वह प्रयास करे। अपने शहीदों को मत भूलो। करतार सिंह एक नौजवान
था, फिर भी बीस वर्ष से कम की आयु में ही देश की सेवा के लिए आगे
बढ़कर मुस्कुराते हुए वन्देमातरम् के नारे के साथ वह फाँसी के तख़्ते पर चढ़
गया। भाई बालमुकुन्द और अवधबिहारी दोनों ने ही जब ध्येय के लिए जीवन
दिया तो वे नौजवान थे। वे तुममें से ही थे। तुम्हें भी वैसा ही ईमानदार
देशभक्त और वैसा ही दिल से आज़ादी को प्यार करने वाला बनने का प्रयास
करना चाहिए, जैसेकि वे लोग थे। सब्र और होशो-हवास मत खोओ, साहस
और आशा मत छोड़ो। स्थिरता और दृढ़ता को स्वभाव के रूप में अपनाओ।
नौजवानों को चाहिए कि वे स्वतन्त्रतापूर्वक, गम्भीरता से, शान्ति और सब्र के
साथ सोचें। उन्हें चाहिए कि वे भारतीय स्वतन्त्रता के आदर्श को अपने जीवन के
एकमात्र लक्ष्य के रूप में अपनायें। उन्हें अपने पैरों पर खड़े होना चाहिए। उन्हें
अपनेआप को बाहरी प्रभावों से दूर रहकर संगठित करना चाहिए। उन्हें चाहिए कि
मक्कार तथा बेईमान लोगों के हाथों में न खेलें, जिनके साथ उनकी कोई समानता
नहीं है और जो हर नाजुक मौक़े पर आदर्श का परित्याग कर देते हैं। उन्हें चाहिए
कि संजीदगी और ईमानदारी के साथ “सेवा, त्याग, बलिदान” को अनुकरणीय
वाक्य के रूप में अपना मार्गदर्शक बनायें। याद रखिये कि “राष्ट्रनिर्माण के लिए
हज़ारों अज्ञात स्त्री-पुरुषों के बलिदान की आवश्यकता होती है जो अपने आराम व
हितों के मुक़ाबले, तथा अपने एवं अपने प्रियजनों के प्राणों के मुक़ाबले देश की
अधिक चिन्ता करते हैं।”
6-4-1928 वन्देमातरम!
(भगवतीचरण वोहरा बी.ए., प्रचारमन्त्री, नौजवान भारत सभा द्वारा
अरोड़ वंश प्रेस, लाहौर से मुद्रित एवं प्रकाशित।)
नौजवान भारत सभा और राष्ट्रीय नेतृत्व का मूल्यांकन / 305

लाला लाजपत राय के नाम खुला ख़त
लाला लाजपत राय को देश के बुजुर्ग नेता मानते हुए भी क्रान्तिकारी उनके
विचारों से असहमत थे। लाला जी और भगतसिंह व उनके साथियों के बीच बहस
में जो तर्क प्रस्तुत किये गये, उसका परिचय देने के लिए ‘किरती’ पत्रिका से कुछ
लेख यहाँ दिये जा रहे हैं।
नवम्बर, 1927 में लाला जी के नाम एक खुला पत्र छापा गया। जनवरी, 1928
में ‘लाला लाजपत राय और कुमारी एग्निस स्मेडली’ शीर्षक से दूसरा लेख छपा।
एग्निस स्मेडली यूरोप की प्रसिद्ध लेखिका थीं, जिनकी भारत व चीन के
स्वतन्त्रता-आन्दोलन में गहरी दिलचस्पी थी। लाला जी ने अपने अख़बार में मिस
स्मेडली की पुस्तक से कुछ अंश छापकर उनका छपना बन्द कर दिया। उसी सन्दर्भ
में यह लेख है। तीसरा लेख अगस्त, 1928 में ‘लाला लाजपत राय और नौजवान
आन्दोलन’ शीर्षक से छपा। – स.
‘किरती’ की सम्पादकीय टिप्पणी
(जिन सज्जनों को लाला लाजपत राय से राजनीतिक जीवन में अच्छी तरह वास्ता
पड़ा है, वे लाला जी की नेतागिरी की कोरी इच्छा और देश के लिए सिवाय टर्र-टर्र
करने तथा और कुछ न करने को अच्छी तरह जानते हैं। विदेशों में बसे भाइयों,
विशेषतः अमेरिका व कनाडा निवासी सिखों का विश्वास 1914 में ही लाला जी
से उठ गया था, जब आप कनाडा-अमेरिका गये थे और आपको उन हिन्दुस्तानी
भाइयों ने अपने गाढ़े पसीने की कमाई का काफ़ी रुपया हिन्दुस्तान में आज़ादी के
लक्ष्य के लिए दिया था और उन भाइयों के अनुसार लाला जी ने वह रुपया अपनी
मर्ज़ी से ख़र्च किया था और बहुत-सा रुपया स्वयं ही हड़प गये थे।
लाला जी की आजकल की मनमरजी और टेढ़ी चालों से हिन्दुस्तान के लोगों
व राजनीतिक क्षेत्रों में उनका विश्वास उठ गया है। हमारे पास 22 सज्जनों की ओर
से छपा ‘लाला जी के नाम ख़त’ प्रकाशित होने के लिए आया है, जिसका अनुवाद
प्रस्तुत है। – सम्पादक, ‘किरती’)
लाहौर, 18 सितम्बर, 1927
306 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

प्रिय लाला लाजपत राय जी,
असेम्बली चुनाव के दिनों जब जनसभाएँ की जाती थीं, तब आपने एक बार
दस हज़ार हिन्दुओं की सभा के समक्ष अपने बारे में सिपाही होने की घोषणा की
थी।
इसके उत्तर में कि आप एक मर चुके नेता हैं, आपने कहा था कि बेशक
हिन्दुओं के हाथों से एक नेता निकल रहा है, लेकिन नेता की जगह उन्हें एक
सिपाही मिल गया है। आपकी घोषणा सुनकर हमें भी बहुत प्रसन्नता हुई, क्योंकि
हम भी ऐसे नेताओं से जोकि राजनीतिक समस्याओं के सम्बन्ध में तो बहुत
लम्बी-चौड़ी बातें किया करते थे, तंग आये हुए थे। पिछले भले दिनों में आप
तर्कशील भाषणों में यह कहते नहीं थकते थे कि “मैं या तख़्त लूँगा या तख़्ता।”
लाहौर के 16 युवकों ने जो घोषणा ‘पंजाब के नौजवानों से अपील’ शीर्षक के
अन्तर्गत की थी, उसके उत्तर में आपने उन पर आरोप लगाया था कि उन्होंने
आप पर एक धब्बा लगाकर आपको इस राजनीतिक क्षेत्र से निकालने की
कोशिश की है।
यह आरोप देखने से ही कड़वा लगता था। हम आपको फिर मैदान-ए-जंग में
लाना चाहते हैं और आप में यह शतरंजी चालें खेलने की जो चाह पैदा हो गयी है
उसे ख़त्म करना चाहते हैं। आपने कहा था कि ये तो बोल्शेविक हैं इसलिए अपना
नेता लेनिन को मानते हैं। बोल्शेविक होना कोई गुनाह नहीं है और आज हिन्दुस्तान को
लेनिन की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है। क्या आपने उन नौजवानों को सी.आई.डी. की
‘मेहरबान’ नज़रों में लाने का कमीना प्रयत्न नहीं किया? आपकी इस बुरी इच्छा को
फल लग गया है, इसलिए आप स्वयं को इस सफलता की बधाई दे सकते हैं। आपने
लंगे मण्डी में इन नौजवानों पर मात्र इसलिए कीचड़ उछाला क्योंकि उन्होंने जनता को
वास्तविक स्थितियों से परिचित कराने का साहस दिखाया। आपकी चुनाव सम्बन्धी
लड़ाई का यह आरम्भिक दिन था। मदनमोहन मालवीय जी को इसका शुभारम्भ करने
के लिए आमन्त्रित किया गया था। आपको संक्षिप्त-सा अध्यक्षीय भाषण करना था,
लेकिन आप अपना संयम खो बैठे। पण्डित मालवीय को लम्बा भाषण करने का समय
ही न मिला, जिसकी कि वह तैयारी करके आये थे। आपने दो घण्टे, बल्कि इससे
भी अधिक ‘पंजाब के नौजवानों से अपील’ कर कड़कती आवाज़ में (उनका) विरोध
किया। आपने इन नौजवानों को दिल खोलकर कोसा और आरोप लगाये। आपने सारे
भाषण में ही तर्कशीलता को बिल्कुल दरकिनार कर दिया। हम आप पर निम्नलिखित
आरोप लगाते हैं –

  1. राजनीतिक ढुलमुलपन।
  2. राष्ट्रीय शिक्षा के साथ विश्वासघात।
  3. स्वराज्य पार्टी के साथ विश्वासघात।
    नौजवान भारत सभा और राष्ट्रीय नेतृत्व का मूल्यांकन / 307
  1. हिन्दू-मुस्लिम-तनाव को बढ़ाना।
  2. उदारवादी बन जाना।
    इन आरोपों में से एक का भी आपने कोई तर्क-सम्मत खण्डन नहीं किया।
    जब चुनावों का जोश शान्त हो गया तब हमने बहुत चिन्तापूर्वक सुना कि आपके
    शरीर को फिर कोई रोग लग गया है। अफ़सोस, अस्वस्थता हमारे नेताओं का एक
    हिस्सा बन गयी है। वे अस्वस्थता की तभी शिकायत करने लग जाते हैं जब उन्हें
    मालूम होता है कि कोई न कोई हमसे गाँव की प्रगति और जन-एकता के वायदे
    को पूरा करने के सम्बन्ध में कुछ न कुछ कहेगा। ये वायदे ऐसे हैं जो हज़ारों बार
    किये तो गये, पर पूरे कभी नहीं उतरे।
    चिकित्सा विज्ञान क्या यही कहता है कि बुरे स्वास्थ्य का रोगी केवल यूरोप
    के ही स्वास्थ्य-लाभ-केन्द्र पर ठीक होगा? रोग की रोकथाम के लिए जो राय
    डॉक्टर दें उसे मानने से कौन इन्कार कर सकता है? हिन्दुस्तान एक बदक़िस्मत
    देश है जो जंगल और दलदल से भरा है। यहाँ कोई पहाड़ी स्थान नहीं है और न
    ही कोई स्वास्थ्य-लाभ-केन्द्र है। इन नेताओं का कश्मीर केवल इटली के उत्तर में
    है। 'मरी', मसूरी और नैनीताल भी यूरोप में ही मिलते हैं। आप जानते हैं कि अपने
    देश की सेवा के लिए जीना बहुत ज़रूरी है। इसलिए जीवन बहुमूल्य है। यह भी
    कहा जाता है कि सिपाही के लिए कोई आराम नहीं। वह मरने के लिए जीता है,
    ताकि वह दुख झेलते, देश की सेवा में रहते हुए ही मरे। और दुखी देश के लिए
    मरने के वास्ते कमर कसकर युद्ध में मरे, उसकी, बड़ी इच्छा होती है।
    लेकिन यूरोप जाने से पहले आप जब हिन्दुस्तान की ही हवाख़ोरी कर रहे थे
    और हिन्दुस्तान की ही ज़मीन पर चल रहे थे, तब आपके और आपके साथियों
    द्वारा बोये काँटे उग पड़े। आपने 'हिन्दुओ, मारो!' का प्रचार किया था और हिन्दू
    ही मारे गये!
    आप जैसे ही अन्य सज्जनों ने 'मुसलमानो, मारो!' का प्रचार किया था। जब
    मुसलमानों के मारे जाने का समय आया तो उनके नेताओं ने यह कमज़ोरी दर्शायी
    और वह सिपाही वाला काम न कर सके। इस तरह उन्हें भी काफ़ी मार पड़ी।
    लेकिन हमारा सिपाही उस समय बुज़दिली दर्शाने में बहादुर निकला। जब हिन्दू मारे
    जाने लगे तो आपने प्रथम श्रेणी के गद्दों पर बैठकर यूरोप चले जाना ही श्रेयस्कर
    समझा। आपने लाहौर के हिन्दुओं की इस संकट में मदद करने से असमर्थता प्रकट
    की। चुनाव के दिनों में आप आमतौर पर हिन्दुओं की मुसलमानों के हाथों रक्षा करने
    की डींगें हाँका करते थे।
    लेकिन अफ़सोस है कि यह सबकुछ आपका चुनावी सफलता तक ही सीमित
    था। इसके साक्ष्य में हम केवल यह कहना ही पर्याप्त समझते हैं कि आपने यूरोप
    से वापस लौटकर भी लाहौर के ग़रीब और दुखी हिन्दुओं की सहायता के लिए
    308 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

लाहौर पहुँचने तक का भी कष्ट नहीं उठाया। हमें मालूम नहीं कि आपने सीमा से
पागल पठानों के निकाले हुए हिन्दुओं की रक्षा के लिए कौन-से तरीक़े इस्तेमाल
किये? इसके विपरीत आप सीधे ही शिमला असेम्बली में भाग लेने और अपने
साथियों पर भाषण का असर दर्शाने के लिए चले गये। संकट के समय
अलग-थलग रहना आपकी बहादुरी का बड़ा हिस्सा है।
अनेक युवतियों के सिर से पति का साया उठ गया और उनकी सारी उम्र दुखों
भरी और एकान्तमय रह गयी। कई कुँआरी कन्याएँ अपना सतीत्व भंग होने के
कारण अपने भीतर ही भीतर आँसुओं से रो रही हैं। कई मासूमों का क़त्ल किया
गया। तीस लाख ज़िन्दगियाँ भयावह नरक में से गुज़र रही हैं। गवर्नर, पंजाब तो
अपनी पहाड़ी आरामगाह छोड़कर इन लोगों के बोये हुए काँटे काटने के लिए लाहौर
आ जाता है, लेकिन हमारा सिपाही लाला लाजपत राय इतना बीमार है कि वह
अपनी ड्यूटी पर नहीं पहुँच सकता और कह देता है कि लाहौर में गर्मी बहुत है
तथा रेलवे की सीटें पहले ही बुक हो चुकी हैं। रोने दो इन विधवा हो चुकी स्त्रियों
को, यतीम हो चुके बच्चों को, हमें इनसे क्या लेना! मुसीबतें अजब-अजब लोगों
को एकजुट कर देती हैं। जनता के सामने जिनके बारे में हम यह आरोप लगाते थे
कि ये लोग आम जनता के विश्वास योग्य नहीं हैं, तो क्या अब उन्हीं के दरवाज़े
पर माँगने में हमें सुकून मिलता है? होशियार रहो कि आदमी अपने साथियों से ही
पहचाना जाता है। यह कोई विस्मयकारी बात नहीं है कि आप एक उदारवादी गिने
जाने लगे हैं जबकि आप जी-हज़ूरियों और पिछलग्गुओं के साथ बाँह में बाँह डाले
साथ चल रहे हैं।
(हस्ताक्षरकर्ता)

  1. केदारनाथ सहगल : सदस्य, अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी, अध्यक्ष
    पंजाब राजनीतिक पीड़ित कॉन्फ़्रेंस।
  2. मेलाराम वफ़ा : सम्पादक, वन्देमातरम और नेशनल कॉलेज के भूतपूर्व
    प्रोफ़ेसर।
  3. प्रेम प्रकाश देवीश्वर : महासचिव, पंजाब सनातन धर्म राजनीतिक
    कॉन्फ़्रेंस।
  4. अब्दुल मजीद : सचिव, पंजाब प्रेस कर्मचारी यूनियन।
  5. भगवानचरण क़ौमी, बी.ए. : सचिव, क़ौमी ग्रेजुएट यूनियन।
  6. नरेन्द्रनाथ क़ौमी, बी.ए. : पूर्व सहायक सम्पादक, 'भीष्म'।
  7. धर्मचन्द्र क़ौमी, बी.ए.।
  8. गणपतराय क़ौमी, बी.ए.।
  9. बाबू सिंह क़ौमी, बी.ए.।
    नौजवान भारत सभा और राष्ट्रीय नेतृत्व का मूल्यांकन / 309
  1. जी.आर. दरवेशी : सम्पादक, ‘मेहनतकश’।
  2. कर्मचन्द : सम्पादक, ‘लाहौर’।
  3. मोहम्मद युसूफ क़ौमी, बी.ए. : सहायक सम्पादक ‘अकाली’।
  4. सीताराम मास्टर : राजनीतिक कार्यकर्ता, पंजाब।
  5. हरदयाल : हिन्दी साहित्य भवन।
  6. धर्मेन्द्र क़ौमी, बी.ए.।
  7. सुरेन्द्रनाथ।
  8. एन. कालमऊल्ला।
  9. पिण्डीदास सोढी : पूर्व सम्पादक, ‘भीष्म’, लाहौर।
  10. धर्मेन्द्र ठाकुर : पूर्व उपदेशक, हिन्दू सभा।
  11. डॉ. इन्द्रलाल कपूर।
  12. लद्धाराम : पूर्व सम्पादक, ‘स्वराज्य’, इलाहाबाद।
  13. वेदराज भल्ला क़ौमी, बी.ए.।
    310 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

लाला लाजपत राय
और एग्निस स्मेडली
'दि पीपल' (The People) एक अंग्रेज़ी साप्ताहिक समाचारपत्र है। इसके संस्थापक
और सम्पादक पंजाब केसरी लाला लाजपत राय हैं। जिस समय वह पत्र आरम्भ
किया गया था तब उसमें पहले पृष्ठ पर लाला जी की ओर से यह घोषणा की
गयी थी कि इस समाचारपत्र में हर प्रकार के विचार दिये जायेंगे तथा हर विचार
को, भले ही वह किसी भी तरह का हो, सुना जाया करेगा और उस पर धैर्य और
गम्भीरता से विचार किया जायेगा। कुल मिलाकर यह कि यह पत्र एक खुला
विचार-मंच (ओपन फ़ोरम) बनाया गया था, जहाँ प्रत्येक बात पर बहस और
विचार होना था ताकि अंग्रेज़ी पढ़ी-लिखी जनता वास्तविक स्थितियों से परिचित
हो सके तथा अपनी सही राय क़ायम कर सके।
इन पंक्तियों का लेखक इस पत्र को आरम्भ से पढ़ता रहा है। यह पत्र अच्छे
समाचारपत्रों में एक है। इसमें अक्टूबर, 1927 तक घोषित उद्देश्यों का पूर्णतया पालन
किया जाता रहा है। इसमें विद्वान लेखकों के अच्छे-अच्छे लेख प्रकाशित होते रहे
हैं, लेकिन 10 अक्टूबर, 1927 से इसने अपने मुख्य उद्देश्य से मुँह फेर लिया है
और मिस स्मेडली के लेख प्रकाशित करने बन्द कर दिये हैं।
मिस एग्निस स्मेडली यूरोप की एक प्रख्यात लेखिका हैं। वे बर्लिन के एक
विश्वविद्यालय में अंग्रेज़ी की प्राध्यापिका हैं। लाला जी व्यक्तिगत तौर पर उन्हें
जानते हैं। लाला जी ने उनके सन्दर्भ में लिखा था – "पिछले दस बरसों से मैं
मिस स्मेडली को जानता हूँ। मैंने उनकी ईमानदारी पर कभी शक नहीं किया। यह
ऐसी स्त्री नहीं जिन्हें कि रुपये-पैसे से ख़रीदा जा सके। वे जन्मजात युगान्तकारी
हैं। इसलिए उनका स्वभाव, रुझान एवं आदतें सभी एक युगान्तकारी जैसी हैं। उनका
जीवन सम्मान से जीने में बीता है। इन बातों ने युग-परिवर्तन की ओर उनका झुकाव
बढ़ा दिया है। व्यक्तिगत तौर पर उनके विचार पूर्णतया पवित्र एवं सुस्पष्ट हैं। वह
एक ऐसी स्त्री हैं जो अपने कार्य एवं मित्रों के लिए बड़े से बड़ा बलिदान कर
सकती हैं। मैं व्यक्तिगत परिचय के आधार पर कह सकता हूँ कि उन्हें सोना-चाँदी
जैसी चीजें बिल्कुल भी नहीं भरमा सकती हैं।"
नौजवान भारत सभा और राष्ट्रीय नेतृत्व का मूल्यांकन / 311

मिस स्मेडली के लेख ‘द पीपल’ में प्रकाशित होते रहते हैं। जिसने उनके लेख
पढ़े हैं वह उनकी लेखकीय विद्वता एवं ज्ञान की प्रशंसा किये बिना नहीं रह सकता।
मिस स्मेडली बहुत अच्छी लेखिका हैं। वह जिस विषय को छूती हैं उसे जीवन्त
कर देती हैं। राष्ट्रीय राजनीति, हिन्दुस्तान का युगान्तकारी इतिहास तथा हिन्दुस्तान
के जलावतनों के बारे में जितना वह जानती हैं उतना शायद ही कोई हिन्दुस्तानी
जानता हो। हिन्दुस्तान के गुलाम होने की वजह से या किन्हीं दूसरे कारणों से वह
इससे बहुत लगाव रखती हैं तथा यहाँ के पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से अपने विचारों
से अवगत कराती रहती हैं।
लेकिन लाला लाजपत राय को मिस स्मेडली के विचार अच्छे नहीं लगते।
उनको मिस स्मेडली के लेखों में से बोल्शेविक वाली बू आती है। उनकी कोमल
नाक इस बोल्शेविकी बू को सहन न कर सकी। तभी लाला जी पुराने क़िस्सों की
तरह मानस-गन्ध, मानस-गन्ध चीख़ रहे हैं और मिस स्मेडली के लेखों से
तौबा-तौबा कर चुके हैं। इस बोल्शेविकी भय के कारण ही वे अपने मुख्य उद्देश्य
को भी छोड़ चुके हैं और अब अच्छे बच्चों के ‘बीबे राने’ लेख प्रकाशित करने
लगे हैं।
लाला लाजपत राय मज़दूरों के कट्टर समर्थक हैं। ट्रेड यूनियन कांग्रेस के
अध्यक्ष भी रह चुके हैं। आप जेनेवा की अन्तरराष्ट्रीय मज़दूर कांग्रेस में मज़दूरों के
प्रतिनिधि के रूप में शामिल हुए थे। आप मिस्टर मैकाडॉल्ड एण्ड कम्पनी को
पूँजीपति तथा तानाशाही समर्थक लिखते थे। लेकिन आप कौन हैं? मज़दूर हैं? नहीं,
बिल्कुल भी नहीं। आप तो असली पूँजीपति हैं तथा पूँजीपतियों से मित्रता रखते हैं।
आप अपने स्वास्थ्य-लाभ के बहाने मिस्टर बिरला के साथ जेनेवा गये थे तथा वहाँ
उसकी मदद करते रहे थे।
आपने लिखा है कि “मिस स्मेडली ने हमें कोई नयी बात नहीं बतायी। हम
जानते हैं, और पिछले दो सौ बरसों से जानते रहे हैं कि इंग्लैण्ड विकासशील देशों
में हिन्दुस्तान को अपनी जंग-जंगी तैयारियों के लिए उपयोग करता रहा है।” लेकिन
लाला जी से कोई पूछे कि जब आप अंग्रेज़ों की दो सौ बरसों की चालबाज़ियों से
परिचित हैं कि वह हिन्दुस्तान को युद्ध-कार्य के लिए इस्तेमाल करते रहे हैं, तब
आपने इस उपयोग के बारे में शोर क्यों न मचाया? आपने पिछले युद्ध में ही ये
सलाह क्यों नहीं दी कि हिन्दुस्तानियो सशक्त हो जाओ, अब वक़्त है कि युद्ध के
लिए इन्हें कोई मदद न दो और आज़ादी के लिए संघर्ष करो। लेकिन उस समय
आप ऐसा क्यों कहते? उस समय तो आप आनन्दमग्न बैठे अमेरिका में तमाशा देख
रहे थे और जर्मनी के विरुद्ध केवल लिखकर अंग्रेज़ों को यह भरोसा दिला रहे थे
कि आप ख़तरनाक नहीं हैं और देश-निकाले के बाद आपके वापस हिन्दुस्तान आने
में कोई डर नहीं है।
312 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

लाला जी, आप सर्वज्ञाता हैं। आपके समक्ष अनपढ़ सिख भाई अमेरिका में
से जत्थे बना-बनाकर यहाँ आये और उन्होंने जनता का आह्वान किया कि जनता
जंग में कोई सहायता न करे। अब वक़्त है, लोहा गर्म है, ज़बरदस्त चोट मारकर
आज़ाद हो जाओ। उनकी किसी ने नहीं सुनी। लेकिन वे शहादत पाकर अपना
कर्तव्य पूरा कर गये। उस समय आप सबकुछ जानते थे। आपके लिए तो कोई
नयी बात नहीं हुई। क्या आपके भीतर का सच मर गया था? आपको हिन्दुस्तान
लौटने की चाह ने तड़पाया? दरअसल आप अंग्रेज़ों की नज़र में भले बनकर
हिन्दुस्तान आना चाहते थे, इसलिए आप शान्त रहे और मौन धारण कर लिया।
अंग्रेज़ों के प्रति वफ़ादार बनने के लिए आप जर्मन के विरुद्ध क़लम उठाते रहे।
क्यों लाला जी, ठीक है ना?
लाला जी, वैसे तो सबकुछ आप जानते ही हैं, लेकिन चेतावनी देनी बेहतर
होगी। सुनिए, अब फिर युद्ध छिड़ने वाला है। अब फिर अंग्रेज़ हिन्दुस्तान को अपने
स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करेंगे। देश की जनता को सचेत करने के लिए घोषणा
करवा दो, ताकि जनता अंग्रेज़ों की चालबाज़ियों का शिकार न बने और अपने सहारे
खड़े होने के लिए तैयार हो जाये। क्या आप मैदान में आयेंगे?
लेकिन लाला जी तो अपनी अन्तर्आत्मा की आवाज़ के अनुसार काम करते हैं।
वे किसी के कहने पर कोई काम नहीं करते। लेकिन ज़माना बुरी चीज़ है। यह
किसी तरह भी नहीं जीने देता। क्यों, यह अन्तर्आत्मा का प्रकाश किसी भीतरी
कमज़ोरी का ही तो दूसरा नाम नहीं? प्रकाश प्रकाश में फ़र्क़ होता है, इसलिए लाला
जी ने भी अपने भीतर कई प्रकार के प्रकाश रखे हैं। एक आत्मप्रकाश तो वह था
जो लाला लाजपत राय को विदेशों में दौड़ाये फिरता था, एक प्रकाश यह है जो
उन्हें यहाँ ले आया है। एक प्रकार का प्रकाश लाहौर सेन्ट्रल जेल से छूटने के
पश्चात हुआ था। तब लाला जी असहयोग आन्दोलनकारियों का नेतृत्व करते थे।
समझ नहीं आता लाला जी, आप किस प्रकाश के पीछे फिरते हैं? कृपया बताइये!
क्या साम्यवाद स्वयं में, कम से कम आजकल की दुनिया में, फिरकेदारी नहीं
है? क्या यह एक वर्ग का दूसरे वर्ग के विरुद्ध संगठित संघर्ष नहीं है? लाला जी
तो यही कहते हैं। लेकिन लाला जी, आप स्वयं बतायें कि आप साम्यवाद को
फिरकेदारी समझकर ही तो नहीं आये? दरअसल आपने सोचा होगा कि लो
साम्यवादी क्या बनना, हिन्दू ही फिर बन जाते हैं।
लाला जी वर्ग-संघर्ष के भी विरुद्ध दिखायी देते हैं। क्योंकि मालूम होता है,
जैसे लाला जी को दो सौ बरसों से हिन्दुस्तान का ज्ञान है, ऐसे ही जो कुछ महात्मा
मार्क्स ने सिखाया है, उसका भी ज्ञान है। लाला जी ठहरे मज़दूर नेता, तो फिर क्यों
न वर्ग-संघर्ष के सिद्धान्त के ख़िलाफ़ हों, मज़दूर-आन्दोलन की नींव रखने वाले
महात्मा कार्ल मार्क्स के मोटे-मोटे तीन सिद्धान्तों में से एक वर्ग-संघर्ष है और इसी
नौजवान भारत सभा और राष्ट्रीय नेतृत्व का मूल्यांकन / 313

सिद्धान्त पर चलते हुए आज दुनिया के मज़दूर अपनी-अपनी सरकारों और
अपने-अपने देश से टूटकर विश्व-मज़दूर-संगठन में शामिल हो रहे हैं। लेकिन
लाला जी, आज तो आप वर्ग-संघर्ष के ख़िलाफ़ होकर पूँजीवाद तथा तानाशाही को
भी रहने देना चाहते हैं। आप शायद यह समझते हैं कि सामाजिक विकास में, जिस
तरह आप जैसे पूँजीवादी कहते हैं, दोनों की ही आवश्यकता है।
असल बात तो यह है कि लाला जी एक-एक करके अपने पहले के सिद्धान्त
छोड़ रहे हैं और पुनः आर्यसमाजी बन रहे हैं। इसीलिए आपने बहुत खीजते हुए मिस
एग्निस स्मेडली के राष्ट्रवादी सिद्धान्त बताने वाले लेखों को प्रकाशित करना बन्द
कर दिया है। इस तरह प्रकाशन बन्द करते हुए जो टिप्पणी आपने 13 अक्टूबर के
पत्र में लिखी, उसने आपकी शान में चार चाँद नहीं लगाये। जहाँ तक हमें जानकारी
है कि मिस एग्निस स्मेडली अपने लेख बिना कोई पारिश्रमिक लिये भेजती रही
हैं। इस टिप्पणी पर अनेक विरोधात्मक पत्र आये हैं, जिन्हें आपने प्रकाशित करने
का भी साहस नहीं दिखाया। 15 दिसम्बर के पत्र में आपने इस तरह मिस स्मेडली
से क्षमा-याचना की है - “हम अपनी इच्छानुसार कार्य करते हैं। मिस स्मेडली को
यह जानना चाहिए कि ज़िन्दगी में मेरा तो अन्य कोई दूसरा (देशसेवा के अलावा)
काम ही नहीं है। अगर मैंने उन्हें कष्ट पहुँचाया है तो मुझे इसका बहुत अफ़सोस
है। मुझे यह सोचना चाहिए था कि मेरे 'रिमार्क' उन्हें दुख पहुँचाने के अलावा और
कर भी क्या सकते थे।”
लाला जी नित्य सूर्योदय से नौजवानों को उपदेश करने आरम्भ कर देते हैं, कि
शान्तिपूर्वक बुजुर्ग अनुभवी नेताओं के आदेशों को मानना चाहिए, तथा देश के लिए
कुर्बानियाँ करनी चाहिए। लेकिन लाला जी जब स्वयं पग-पग पर ठोकरें खाते हैं,
कई जगहों पर भूलें करते हैं, आत्मसंयम में नहीं रहते। क्षमा-याचनाएँ करते फिरते
हैं तो आप कैसे नौजवानों को नेतृत्व दे सकते हैं?
यदि सच पूछें तो 'पंजाब केसरी' अब बूढ़ा हो गया है। इसके ख़तरनाक दाँत झड़
गये हैं। नौकरशाही को डराने वाले इसके भयानक नाखून तेज़ नहीं रहे। अब तो यह
सर्कस के एक पालतू शेर की तरह बेअसर हो गया है। लाला पहले वाले लाला नहीं
रहे। पहले वाला लाला नौजवान था। उसमें नौजवानों वाला जोश, नौजवान वाला साहस
और जवाँमर्दों वाली कुर्बानी कूट-कूटकर भरी थी। वह लाला हिसाबी नहीं था। वह
कुर्बानी के समुद्र में कूदना जानता था और नौजवान भाइयो, देश का दुर्भाग्य! अब यह
लाला हम नौजवानों को उपदेश करने के लिए रह गया है। लाला स्वयं स्वीकारता है
और कहता है कि “मेरी तौबा, मैं कोई कुर्बानी नहीं कर सकता।” लेकिन वह
“नौजवानों को सही मार्ग” पर चलाने को अपना अधिकार समझता है। किसी कवि
ने ठीक कहा है, “बदलता है रंग आसमाँ कैसे-कैसे?”
जनवरी, 1928
314 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

लाला लाजपत राय और नौजवान

लाला लाजपत राय आदि न जाने क्यों पहले से ही नौजवानों के भाषणों के विरोधी
चले आ रहे हैं। आपने देश-भक्ति का आदर्श इटली के महान मैजिनी से सीखा।
वह नौजवानों का बहुत बड़ा प्रशंसक था और कहता था कि “महान कार्यों का भार
नौजवान ही उठाते हैं, उनकी आवाज़ में जादू-सा असर होता है। वे जनता को
स्वतन्त्रता-संग्राम के लिए तुरन्त तैयार कर देते हैं।” ऐसे व्यक्ति को अपने जीवन
का आदर्श बताने वाला व्यक्ति इसके बिल्कुल विपरीत आचरण करे, यही देखकर
आश्चर्य होता है। 1907-08 के पुराने गड़े मुर्दे क्या उखाड़ने? आजकल की ही
कुछ बातें पर्याप्त हैं।
पिछले कौंसिल के चुनावों में लाला जी ने कांग्रेस का साथ छोड़कर उसकी
मुख़ालफ़त करनी आरम्भ कर दी और इसी दौरान ऐसी बातें कहते रहे जोकि किसी
भी तरह उन्हें शोभा नहीं देती थीं। यह देखकर कुछ संवेदनशील नौजवानों ने आपके
विरुद्ध आवाज़ उठायी। उसका बदला लेने के लिए लाला जी ने खुलेआम भाषणों
में कहा कि ये नौजवान बहुत ही ख़तरनाक एवं क्रान्ति-समर्थक हैं तथा लेनिन जैसा
नेता चाहते हैं। मुझमें लेनिन बनने की ताक़त नहीं। साथ ही यह भी कह दिया कि
इन नौजवानों को अगर पचास रुपये की भी नौकरी मिल गयी तो ये झाग की तरह
बैठ जायेंगे। इसका क्या अर्थ है? क्या पचास रुपयों के लिए अपना आदर्श छोड़ने
वाले नौजवान ही लेनिन के साथ थे? क्या लेनिन इसी स्तर का है? नहीं तो ऐसी
बात क्यों कही गयी? सिर्फ़ इसलिए कि लाला जी जहाँ एक ओर सरकार को इनके
विरुद्ध कठोर कार्यवाही करने के लिए उकसा रहे हैं, वहीं जनता की नज़रों में
नौजवानों का सम्मान गिराने की कोशिश भी कर रहे हैं।
सद्भावना से किसी व्यक्ति के किसी कार्य अथवा विचार की कठोरतम
आलोचना करने का प्रत्येक को अधिकार है, लेकिन जानबूझकर किसी के विचारों
की ग़लतबयानी करके, ग़लतफ़हमियाँ फैलाकर किसी को हानि पहुँचाने का प्रयत्न
करना प्रत्येक के लिए ना-मुनासिब है। तब चाहे वह लाला लाजपत राय हों या कोई
अज्ञात नौजवान। उस चुनाव के बाद अनेक अवसर ऐसे आये, लेकिन उनका
उल्लेख करने की आवश्यकता नहीं।
लाला जी ने अभी दूसरा लेख लिखा है। वास्तव में तो यह ‘कण्ट्री लीग’,
नौजवान भारत सभा और राष्ट्रीय नेतृत्व का मूल्यांकन / 315

जिसका उल्लेख हम पिछले अंक में कर चुके हैं, के सन्दर्भ में लिखा गया था, लेकिन
उसमें नौजवानों का उल्लेख आ गया। लाला जी फ़रमाते हैं कि आजकल के उग्र
विचारों वाले नौजवानों के भाषणों से जनता को बचना चाहिए। ये युगान्तकारी क्रान्ति
समर्थक हैं। सम्पत्ति के लिए इनका प्रचार हानिकारक है, क्योंकि इससे वर्ग-संघर्ष
छिड़ने का डर है। अन्त में कहा कि यह काम कुछ विदेशी शरारती तत्त्वों के उकसावे
में आकर आरम्भ किया गया है। वह बाहरी तत्त्व हमारे राष्ट्रीय आन्दोलन में फूट
डालना चाहते हैं, इसलिए वह बहुत ख़तरनाक हैं। साथ वह यह भी मानते हैं कि इस
तरह के प्रचार से सम्पत्ति वाले व्यक्ति सरकार में मिल जायेंगे। इन प्रचारक नौजवानों
को गुमराह, बाहरी तत्त्वों के उकसावे में आये हुए, शरारती और लोभी बताते हुए अन्त
में कहा है कि उन्हें पण्डित जवाहरलाल नेहरू पर पूरी तरह यक़ीन है। वे यदि कुछ
कर रहे हैं अथवा कह रहे हैं तो नेकनीयती और समझबूझ से। बहुत ख़ूब! जिन पण्डित
जवाहरलाल नेहरू आदि के विचारों पर रूस का अच्छा-ख़ासा असर हुआ, जिन्होंने
रूस से लौट आने पर इन विचारों का प्रचार शुरू किया, उनकी नीयत पर कोई शक
नहीं। वह विदेशी प्रभाव या उकसावे में ये बातें नहीं कह रहे, बल्कि नेकनीयती से
कह रहे हैं, लेकिन जो बेचारे देश से बाहर नहीं जा सके वे उकसावे में आये हुए हैं!
ख़ूब! बहुत ख़ूब! असल बात यह है कि जवाहरलाल नेहरू की हैसियत बहुत बड़ी
हो गयी है। उनका नाम कांग्रेस की अध्यक्षता के लिए पेश हो रहा है, तो उम्मीद भी
है कि वे जल्द ही अध्यक्ष बन भी जायेंगे। उनके विरुद्ध लिखने पर ईंट का जवाब
पत्थर से मिलने का भय होता है, लेकिन गुमनाम नौजवानों के लिए जो मन में आये.
..कौन पूछता है। नौजवानों को संकटों में फँसाने की इन कोशिशों को हम क्या कहें?
लाला जी को यह शोभा नहीं देता। ख़ैर, जो उनके मन में आये, करें। अब हम उनकी
कुछ बातों का उत्तर देना चाहेंगे।
सबसे पहले हम यह बताना चाहते हैं कि इस प्रचार के लिए कोई विदेशी
हमें गुमराह नहीं कर रहा। नौजवान किसी के उकसावे में आकर ऐसी बातें नहीं
कह रहे, बल्कि अब देश के भीतर से ही महसूस करने लगे हैं। लाला जी स्वयं
बड़े आदमी हैं। प्रथम या द्वितीय श्रेणी में यात्रा करते हैं। उन्हें क्या मालूम कि
तीसरे दर्जे में कौन सफ़र कर रहा है? वे क्या जानें कि तीसरे दर्जे के मुसाफ़िर-
ख़ानों में किसे लातें खानी पड़ती हैं? वे मोटर में बैठकर अपने साथियों के साथ
हँसते-खेलते हज़ारों गाँवों से गुज़र जाते हैं। उन्हें क्या मालूम कि हज़ारों लोगों पर
क्या गुज़र रही है? क्या आज हम 'अनहैप्पी इण्डिया' जैसी किताब के लेखक
को हिन्दुस्तान के करोड़ों भूखों मरने वालों की दयनीय दशा बतायें? क्या आज
उन करोड़ों मनुष्यों को देखकर जो सुबह से शाम तक ख़ून-पसीना एक करके
पेट भी नहीं भर सकते, यह आवश्यकता शेष रह जाती है कि कोई बाहर से
आकर हमें कहे कि उनके पेट भरने की कोई राह निकालो। हम गाँवों में गर्मी,
316 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

सर्दी, बारिश, धूप, लू और कोहरे में रात-दिन किसानों को काम करते देखते
हैं। लेकिन वे बेचारे रूखी-सूखी रोटी खाकर गुज़ारा कर रहे हैं – और क़र्ज़ के
नीचे दबे हुए हैं। तब क्या हम तड़प नहीं उठते? उस समय हमारे दिलों में आग
नहीं भड़क उठती? तब भी क्या हमें किसी की आवश्यकता रह जाती है जो
आकर यह बताये कि इस व्यवस्था को बदलने का प्रयास करो। जब हम नित्य
प्रति देखते हैं कि श्रमिक भूखे मरते हैं और निठल्ले बैठकर खाने वाले आनन्द
मना रहे हैं, तो क्या हम इस आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था की गड़बड़ियाँ
अनुभव नहीं कर सकते? जब हम देखते हैं कि दिनोदिन अपराध बढ़ रहे हैं,
जनता की हालत रोज़-ब-रोज़ दयनीय होती जा रही है, तब क्या हमें बाहरी
उपदेशकों की आवश्यकता है जो हमें आकर समझायें कि क्रान्ति की
आवश्यकता है...करोड़ों मनुष्यों को जिन्हें हमने अछूत कहकर दूर किया हुआ है
उनकी दर्दनाक स्थितियाँ देखकर क्या क्रोध नहीं आता? करोड़ों (लोग) दुनिया
का बहुत विकास कर सकते हैं, वे जन-सेवा कर सकते थे, लेकिन आज वे हम
पर भार महसूस होते हैं। उनकी इस स्थिति में सुधार के लिए, उन्हें पूर्ण रूप
से मनुष्य बनाने के लिए और कुओं की जगत पर चढ़ाने-मात्र के लिए क्या
आन्दोलनों की ज़रूरत नहीं है? क्या उन्हें ऐसी अवस्था में लाने की आवश्यकता
नहीं थी कि वे हमारी तरह कमा-खा सकें? इसके लिए क्या सामाजिक और
आर्थिक नियमों में क्रान्ति आवश्यक नहीं है? क्या पंजाब तथा हिन्दुस्तान के
नौजवानों में स्वयं कुछ अहसास करने की कोई शक्ति शेष नहीं बची? उनके
सीने में क्या दिल नहीं धड़कता? क्या उनके दिलों में मानवता नहीं है? नहीं तो
फिर क्यों कहा जाता है कि विदेशियों ने आकर उन्हें उकसाया है। हाँ, हम यह
स्वीकारते हैं कि रूसी क्रान्ति ने दुनिया के समक्ष एकदम नये विचार रखे हैं।
हम मानते हैं कि जिन बातों का हल शायद अभी हम स्वयं नहीं सोच सकते,
रूसी विद्वानों ने उम्रभर कष्ट सहते हुए, तिल-तिल कर जीवन समाप्त करते हुए
उनके बारे में अपने विचार दुनिया के सामने रखे। क्या उन्हें उसका कोई लाभ
नहीं मिलना चाहिए? क्या उनसे विचारों की समानता भी उकसावा है? तब तो
लाला जी को मैजिनी ने देश के नौजवानों को गुमराह करके देशसेवा के काम
में जुटाया हुआ था!
प्रश्न यह है कि आजकल, 1928 में, क्या दुनिया को फ़्रांसीसी क्रान्ति से
कोई सबक सीखना और उसे अपना आदर्श बनाना चाहिए या आज नये वातावरण
में नये विचारों से पूर्ण रूसी क्रान्ति को? क्या लाला जी की यह मंशा है कि
अब अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध ही क्रान्ति की जाये और शासन की बागडोर अमीरों
के हाथों में दी जाये? करोड़ों जन इसी तरह नहीं, इससे भी अधिक बुरी
स्थितियों में पड़ें, मरें और तब फिर सैकड़ों बरसों के खून-ख़राबे के पश्चात
नौजवान भारत सभा और राष्ट्रीय नेतृत्व का मूल्यांकन / 317

पुनः इस राह पर आयें और फिर हम अपने पूँजीपतियों के विरुद्ध क्रान्ति करें?
यह अव्वल दर्जे की मूर्खता होगी।
लाला जी ने एक-दो बार दास के शब्द सुन-सुनाकर गाँवों में संगठन की बात
थोड़ी-सी उठायी थी। लाला जी को तो गाँवों में जाने की फुरसत ही नहीं। वे क्या
जानें कि जनता के विचार क्या हैं? लोग साफ़ कहते हैं कि हमें इन्कलाब का क्या
लाभ? जब इसी तरह मर-खपकर दो जून की रोटी जुटनी है और तब भी नम्बरदार,
तहसीलदार और थानेदार को इसी तरह अत्याचार करने हैं, इसी तरह किराये वसूल
किये जाने हैं तो हम अभी की रोटी क्यों गँवाये? किसी के लिए अपने प्रियजनों
को क्यों उलझनों में डालें? हम उन्हें क्या बतायें कि उनके पूर्वज कैसे थे, जिससे
कि वे बलिदान के लिए तैयार हो जायें।
अच्छा, माना कि यहाँ क्रान्ति हो जाये तब लाला जी के विचार से किसे शासन
सौंपा जायेगा? क्या महाराज वर्द्धमान या महाराज पटियाला को और पूँजीपतियों के
टोले को? क्या आज अमेरिका और फ़्रांस के करोड़ों मज़दूर भूखों नहीं मर रहे?
हम सबकुछ जानते-बुझते क्यों कुएँ में गिरें?
लाला जी कहते हैं कि हमारे साम्यवादी विचारों के प्रचार से पूँजीपति सरकार
के साथ मिल जायेंगे। बहुत ख़ूब! पहले वे किधर हैं? कितने पूँजीपति युगान्तरकारी
बने हैं? क्रान्ति से जिन्हें अपनी सम्पत्ति में थोड़ी-बहुत हानि होने का डर होगा वे
हमेशा ही विरोधी हो जाते हैं। ऐसी स्थितियों में उनकी जी-हजूरी के लिए आदर्श
त्यागकर ख़ामखाह अपने कार्य को हानि पहुँचाना उचित नहीं। दूसरी बात यह कि
पूँजीपति ज़रा सोचें कि किस स्थिति में उन्हें लाभ है? आज अंग्रेज़ उन्हें अपने स्वार्थ
के लिए अपने साथ अवश्य मिला लेंगे, लेकिन धीरे-धीरे उनकी पूँजी छीनकर उसे
अपने पूँजीपतियों के हाथों में स्थानान्तरित कर देंगे। तब यह ग़रीब (हो गये
सरमायेदार) आज जैसे करोड़ों मज़दूरों में शामिल होकर मरते-खपते रहेंगे। इन्हें
सामाजिक व्यवस्था में अन्याय दिखायी देगा। अगर वे साम्यवादी क्रान्ति कर लें तो
आज उनकी हरामख़ोरी पर तो ज़रूर रोक लगायी जायेगी लेकिन दुनिया की आम
खुशहाली में जोकि निश्चय ही आनी है, शामिल होकर वे बहुत सुखी रहेंगे।
हिन्दुस्तानी पूँजीपति सोच लें कि उनको किस में लाभ है?
लेकिन मज़दूर-आन्दोलन उनके लिए रुक नहीं सकता, उनकी प्रतीक्षा भी नहीं
कर सकता। नौजवानों को घबराना नहीं चाहिए। काम को आरम्भ करने में बहुत
कठिनाइयाँ पैदा होती हैं, धीरज से मुक़ाबला करना चाहिए। लाला जी और दूसरे
प्रकार के पूँजीवादी नीति वाले नेता भी धीरे-धीरे स्वयं मैदान से बाहर हो रहे हैं,
जिस प्रकार पहले सुरेन्द्रनाथ बनर्जी हुए थे और आज सप्रू तथा चिन्तामणि जैसे हो
रहे हैं। अन्त में मज़दूर-आन्दोलन की जीत होगी। बोलो साम्यवादियों की जय!
युगान्तकारी धारा क़ायम रहे!
318 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़