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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 308, कुल 788 में से

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पृष्ठ 308

चाहिए। वे हमारे भाई हैं।” क्या खूब विचार है, क्या खूबसूरत शब्दावली है! लेकिन
वे इसके उलझाव को नहीं पकड़ पाते। सार्वभौमिक भाईचारे के सिद्धान्त की माँग
है कि मनुष्य द्वारा मनुष्य का और राष्ट्र द्वारा राष्ट्र का शोषण असम्भव बना दिया
जाये, सबको बगैर किसी भेदभाव के समान अवसर प्रदान किये जायें। भारत में
ब्रिटिश शासन इन सब बातों का ठीक उल्टा है और हम उससे किसी प्रकार का
सरोकार नहीं रखेंगे।
अब दो शब्द समाजसेवा के बारे में। बहुत से नेक मनुष्य सोचते हैं कि
समाजसेवा (उन संकुचित अर्थों में जिनमें हमारे देश में इस शब्द का प्रयोग किया
जाता है और समझा जाता है) हमारी सभी बीमारियों का इलाज है और देशसेवा
का सबसे अच्छा तरीक़ा है। इस प्रकार हम देखते हैं कि बहुत से ईमानदार नौजवान
सारी ज़िन्दगी ग़रीबों में अनाज बाँटकर या बीमारों की सेवा करके ही सन्तुष्ट हो
जाते हैं। ये अच्छे और आत्मत्यागी लोग हैं लेकिन वे यह समझ पाने में असमर्थ
हैं कि भारत में भूख और बीमारी की समस्या को ख़ैरात के माध्यम से हल नहीं
किया जा सकता।
धार्मिक अन्धविश्वास और कट्टरपन हमारी प्रगति में बहुत बड़े बाधक हैं।
वे हमारे रास्ते के रोड़े साबित हुए हैं और हमें उनसे हर हालत में छुटकारा पा
लेना चाहिए। “जो चीज़ आज़ाद विचारों को बरदाश्त नहीं कर सकती उसे समाप्त
हो जाना चाहिए।” इसी प्रकार की और भी बहुत-सी कमज़ोरियाँ हैं जिन पर हमें
विजय पानी है। हिन्दुओं का दकियानूसीपन और कट्टरपन, मुसलमानों की
धर्मान्धता तथा दूसरे देशों के प्रति लगाव और आमतौर पर सभी सम्प्रदायों के
लोगों का संकुचित दृष्टिकोण आदि बातों का विदेशी शत्रु हमेशा लाभ उठाता है।
इस काम के लिए सभी समुदायों के क्रान्तिकारी उत्साह वाले नौजवानों की
आवश्यकता है।
हमने कुछ भी हासिल नहीं किया और हम किसी भी उपलब्धि के लिए
कुछ भी त्याग करने को तैयार नहीं हैं। सम्भावित उपलब्धि में किस सम्प्रदाय का
क्या हिस्सा होगा, यह तय करने में हमारे नेता आपस में झगड़ रहे हैं। महज
अपनी बुज़दिली को और आत्मत्याग की भावना के अभाव को छिपाने के लिए
वे असली समस्या पर पर्दा डालकर नक़ली समस्याएँ खड़ी कर रहे हैं। ये
आरामतलब राजनीतिज्ञ हड्डियों के उन मुट्ठीभर टुकड़ों पर आँखें गड़ाये बैठे हैं
जिन्हें, जैसा उनका विश्वास है, सशक्त शासकगण उनके सामने फेंक सकते हैं।
यह बहुत ही अपमानजनक बात है। जो लोग आज़ादी की लड़ाई में बढ़कर आते
हैं वे बैठकर यह तय नहीं कर सकते कि इतने त्याग के बाद उनकी क़ामयाबी
होगी और उसमें उन्हें इतना हिस्सा सुनिश्चित रहना चाहिए। इस प्रकार के लोग
कभी भी किसी प्रकार का त्याग नहीं करते। हमें ऐसे लोगों की आवश्यकता है
302 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़