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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 307, कुल 788 में से

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पृष्ठ 307

हुए बरदाश्त कर लेते हैं और बग़ैर किसी प्रकार की हिचकिचाहट के मौत का
सामना करते हैं, क्योंकि मानव-प्रगति का सम्पूर्ण इतिहास नौजवान आदमियों तथा
औरतों के ख़ून से लिखा है; क्योंकि सुधार हमेशा नौजवानों की शक्ति, साहस,
आत्मबलिदान और भावात्मक विश्वास के बल पर ही प्राप्त हुए हैं - ऐसे नौजवान
जो भय से परिचित नहीं हैं और जो सोचने के बजाय दिल से महसूस कहीं अधिक
करते हैं।
क्या ये जापान के नौजवान नहीं थे जिन्होंने पोर्ट आर्थर तक पहुँचने के लिए
सूखा रास्ता बनाने के उद्देश्य से अपनेआप को सैकड़ों की तादाद में खाइयों में झोंक
दिया था? और जापान आज विश्व के सबसे आगे बढ़े हुए देशों में से एक है। क्या
यह पोलैण्ड के नौजवान नहीं थे जिन्होंने पिछली पूरी शताब्दीभर बार-बार संघर्ष
किये, पराजित हुए और फिर बहादुरी के साथ लड़े? और आज एक आज़ाद पोलैण्ड
हमारे सामने है। इटली को आस्ट्रिया के जुवे से किसने आज़ाद किया था? तरुण
इटली ने!
युवा तुर्कों ने जो कमाल दिखलाया, क्या आप उसे जानते हैं? चीन के नौजवान
जो कर रहे हैं, उसे क्या आप रोज़ समाचारपत्रों में नहीं पढ़ते हैं? क्या यह रूस के
नौजवान नहीं थे जिन्होंने रूसियों के उद्धार के लिए अपनी जानें कुर्बान कर दी थीं?
पिछली शताब्दीभर लगातार केवल समाजवादी परचे बाँटने के अपराध में
सैकड़ों-हज़ारों की संख्या में उन्हें साइबेरिया में जलावत़न किया गया था,
दोस्तोयेव्स्की जैसे लोगों को सिर्फ़ इसलिए जेलों में बन्द किया गया कि वे
समाजवादी डिबेटिंग (बहस-मुबाहसा चलाने वाली) सोसाइटी के सदस्य थे।
बार-बार उन्होंने दमन के तूफ़ान का सामना किया, लेकिन उन्होंने साहस नहीं
खोया। ये संघर्षरत नौजवान थे। और सब जगह नौजवान ही निडर होकर बग़ैर किसी
हिचकिचाहट के और बग़ैर (लम्बी-चौड़ी) उम्मीदें बाँधे लड़ सकते हैं। और आज
हम महान रूस में विश्व के मुक्तिदाता के दर्शन कर सकते हैं।
जबकि हम भारतवासी, हम क्या कर रहे हैं? पीपल की एक डाल टूटते ही
हिन्दुओं की धार्मिक भावनाएँ चोटिल हो उठती हैं! बुतों को तोड़ने वाले मुसलमानों
के ताजिये नामक काग़ज़ के बुत का कोना फटते ही अल्लाह का प्रकोप जाग उठता
है और फिर वह ‘नापाक’ हिन्दुओं के ख़ून से कम किसी वस्तु से सन्तुष्ट नहीं
होता! मनुष्य को पशुओं से अधिक महत्त्व दिया जाना चाहिए, लेकिन यहाँ भारत
में लोग पवित्र पशु के नाम पर एक-दूसरे का सिर फोड़ते हैं।
हमारे बीच और भी बहुत से लोग हैं जो अपने आलसीपन को
अन्तरराष्ट्रीयतावाद की निरर्थक बकवास के पीछे छिपाते हैं। जब उनसे अपने देश
की सेवा करने को कहा जाता है तो वे कहते हैं, “श्रीमानजी, हम लोग जगत-बन्धु
हैं और सार्वभौमिक भाईचारे में विश्वास करते हैं। हमें अंग्रेजों से नहीं झगड़ना
नौजवान भारत सभा और राष्ट्रीय नेतृत्व का मूल्यांकन / 301