भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
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शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
V.
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न :
कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि
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ट्रेड यूनियन बिल
1927 में पूँजीवादी विश्व आर्थिक मन्दी की चपेट में आ रहा था, और मज़दूर
वर्ग के जनवादी अधिकारों पर हमले शुरू हो गये थे। इंग्लैण्ड में जब ट्रेड यूनियन
बिल पास हो रहा था तो ‘किरती’ ने (मई, 1927 में) एक लेख इस सम्बन्ध में
प्रकाशित किया। लेख के लेखक के सम्बन्ध में जानकारी हासिल नहीं है, लेकिन
यह उस समय क्रान्तिकारियों की सोच के बारे में बताता है। 1929 में जब ट्रेड
डिस्प्यूट्स बिल भारत में लागू करने की कोशिश की गयी थी तो भगतसिंह और
बी.के. दत्त ने असेम्बली हॉल, दिल्ली में बम फेंका था। – स.
इंग्लिस्तान के एक जगह टिके (Conservative) गुट के लोग कब से इस बात की
ताक में थे कि कैसे मज़दूरों में बढ़ती हुई ताक़त को रोका जाये। उनको यह बात
स्पष्ट नज़र आती थी कि यदि मज़दूरों की बढ़त को अभी न रोका गया तो मज़दूर
देखते ही देखते राज के मालिक बन जायेंगे और इस तरह उन्हें राज की बागडोर
छोड़नी पड़ेगी। उन्हें यह स्पष्ट पता था कि नाम मात्र स्वतन्त्र (Liberal) गुट तो
किसी काम का नहीं है और न ही अभी जल्दी उनके ताक़त में आने की उम्मीद
है। इसलिए यदि उन्हें ख़तरा था तो मज़दूरों से ही था और मज़दूरों की मुश्कें बाँधना
ही उन्होंने सबसे पहले ठीक समझा।
इस काम के लिए उन्होंने ट्रेड यूनियन बिल का आविष्कार किया, जिसके
सम्बन्ध में पिछले अंक में बताया गया था। वे मज़दूरों के सब करे-धरे को यह
बिल पास कर कुएँ में डालना चाहते हैं।
मज़दूरों ने इस बिल के ख़िलाफ़ बड़ी ज़ोरदार आवाज़ बुलन्द की है। उन्होंने
कहा है कि यह बिल एक वर्ग के द्वारा दूसरे वर्ग को मटियामेट करने के लिए
लाया गया वर्ग-बिल है। मि. रामजे मैकडानल्ड जैसे मज़दूर भी इस बिल को
वर्ग-युद्ध की घोषणा समझते हैं और श्रमिक-संसार में सब जगह इस बिल से तूफ़ान
मच गया है। मज़दूर फिर एक दिन के लिए बड़ी आम हड़ताल करने की सोच
रहे हैं। वे विरोध में मीटिंग कर रहे हैं। ख़याल किया जाता है कि संसद में इस
बिल पर घमासान बहस होगी, और मज़दूर-नेता यदि ख़रीद न लिये गये तो
जी-तोड़कर लड़ेंगे।
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आजकल जो लोग अंग्रेज़ी अख़बार पढ़ते हैं उन्हें पता है कि इस बिल का
किस तरह अंग्रेज़ी श्रमिक प्रेस में विरोध हो रहा है। इस बिल को वर्ग-क़ानून कहा
जाता है। मज़दूर समझते हैं कि बाल्डविन की सरकार ने उनके बुनियादी अधिकारों
पर धावा बोल दिया है। इस बिल से उनके संगठन के बिखर जाने का भारी ख़तरा
है। मज़दूरों का अपना दैनिक अख़बार 'डेली हेराल्ड' (Daily Herald) लिखता है
कि यह बिल मज़दूरों को मानसिक रोगी समझता है और सख़्त अपराधियों के लिए
इसने सज़ा भी नियत कर दी है। एक और मज़दूर नेता ने इसे मुसोलिनी जैसा क़ानून
कहा है।
बड़ी हड़ताल के समय से ही एक जगह खड़े (अनुदार) गुट के लोग यह
माँग कर रहे थे कि सरकार कोई बिल संसद में पेश करे, जिससे कि सबके सब
मज़दूर हड़ताल ही न कर सकें। और यदि एक यूनियन के मज़दूर किसी दूसरी
यूनियन की हमदर्दी में हड़ताल कर दें तो वह हड़ताल गैर-क़ानूनी मानी जाये। इस
समय यदि कोई यूनियन हड़ताल करती है तो वे मज़दूर जो हड़ताल में शामिल नहीं
होंगे, उन्हें यह समझाया नहीं जा सकेगा कि वे भी इसमें शामिल हों, क्योंकि यदि
मज़दूर पिकेटिंग आदि के जरिये ऐसा करेंगे तो उन्हें सज़ा दी जा सकेगी। इस बिल
से सिविल सर्विस के कर्मचारियों के लिए किसी पार्टी में शामिल होना मना हो
गया है और सबसे बड़ी चोट मज़दूरों की राजनीतिक पार्टी पर की गयी है। वह
यह है कि कोई मज़दूर राजनीतिक कामों के लिए तब तक चन्दा नहीं दे सकता,
जब तक कि वह लिखकर न दे कि वह राजनीतिक कामों के लिए चन्दा इकट्ठा
कर सकते हैं, लेकिन जो लोग चन्दा नहीं देना चाहते, वे लिखकर दें कि वे चन्दा
नहीं देना चाहते। अब स्थिति उलटी हो गयी है।
इस आख़िरी अंक से श्रमिकों के संगठन को बड़ी भारी चोट पड़ेगी और इस
ज़माने में जबकि कोई पार्टी रुपयों के बग़ैर चल ही नहीं सकती तो यह स्पष्ट है
कि श्रमिक पार्टी का रुपयों के बग़ैर गला दबाने के लिए यह चाल चली गयी है।
अन्य पार्टियों की तरह लेबर पार्टी को भी संसद में अपने उम्मीदवार खड़े करने
और उन्हें सफल बनाने के लिए रुपयों की ज़रूरत है। जब दूसरी पार्टियाँ जैसे चाहे
रुपये इकट्ठा कर सकती हैं और उन्हें कभी पूछा तक नहीं गया है तो कोई वजह
नहीं कि मज़दूरों की पार्टी के भीतर कामों में ख़ामख़ाह टाँग अड़ायी जाये।
इस समय तक मज़दूरों की राजनीतिक पार्टी अपने फण्ड ट्रेड यूनियनों से
इकट्ठा करती रही है। अनुदारवादी गुट का यह विचार है कि इस तरह यदि मज़दूर
पार्टी के फण्ड ही बन्द कर दिये गये तो मज़दूरों का संगठन स्वयं ही दोफाड़ हो
जायेगा और इनके घरों में घी के दिये जल जायेंगे। इस तरह श्रमिक संगठन के टूट
जाने से यह सदा ही इंग्लिस्तान के राज पर क़ब्ज़ा जमाये रखेंगे। पर कौन-सी पार्टी
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टूटेगी और कौन-सी सत्ता में आयेगी, इस बात का पता तो अनुभव और भविष्य
ही बतायेगा।
यदि यह बिल पास हो गया तो मज़दूर फिर उन्हीं ज़ंजीरों में जकड़े जायेंगे
जिनमें से कि यत्न से अभी वे निकले ही थे। फिर उन ज़ंजीरों को तोड़ना आसान
नहीं होगा। इसलिए श्रमिकों को अब वक़्त सँभालना चाहिए और ऐसा ज़ोरदार
आन्दोलन करना चाहिए कि इस पूँजीपति गुट को, जो अभी मज़दूरों को गुलामी से
छूटने नहीं देना चाहता, नानी याद आ जाये। पर यह नानी भी तभी याद आ सकती
है, यदि आने वाली संसद में इनकी ऐसी हार हो कि याद कर-कर आँखें मला
करें। इस समय संसद में इन पूँजीपतियों का बहुमत है। इस बहुमत के अभियान
में ही ये लोग अकड़े फिर रहे हैं और मज़दूरों को नज़रों में भी नहीं लाते।
हम चाहते हैं कि मज़दूर नाम मात्र स्वतन्त्र (उदार) गुट में भी प्रचार करें और
उनमें से बहुत-से सदस्यों को अपनी ओर कर लें, ताकि यह बिल पास ही न हो
सके। और न सिर्फ़ यह बिल ही असफल करा दें वरन इस मौजूदा सरकार को
भी उलट दें। इसने यह क़ानून पेश कर राज करने के सभी अधिकार गवाँ दिये
हैं।
इस समय ज़रूरत है कि मज़दूरों के अपने घर में भी किसी तरह की फूट न
हो और मज़दूरों के नरम और गरम गुटों के सब लोग एकजुट हो जायें ताकि साझे
ज़ोर से इस मौजूदा सरकार का डटकर मुक़ाबला किया जा सके और इसे ऐसे चने
चबाये जायें कि सारी उम्र ही इस वक़्त को याद कर-कर हाथ मला करें।
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ग़दर आन्दोलन की कुछ व्यथा
सितम्बर, 1927 के ‘किरती’ में एक बहुत महत्त्वपूर्ण लेख ‘ग़दर लहर की कुछ
व्यथा’ छपा था। यह एक अख़बार से लेकर छापा गया था। लेखन-शैली और विचारों
से यह लेख शहीद भगवतीचरण वोहरा का हो सकता है। – स.
पहले मैं यह बता दूँ कि विप्लववाद का क्या अर्थ है। फिर मैं आगे चलूँगा। हर
गिरी हुई क़ौम हमेशा गिरी नहीं रहती और उस क़ौम के वीर उसकी उन्नति का
यत्न करते हैं और कुर्बानियाँ देते हैं, और अब यह सोचना है कि कुर्बानियाँ कई
तरह से दी जाती हैं। क़ौमों को उठाने का यत्न भी कई-कई तरीक़ों और हिम्मत
से किया जाता है। एक तो देश में शिक्षा का प्रचार करना। यह भी कोई छोटी-सी
बात नहीं। दूसरे, लोगों को उनके हक़ बताने और उन्हें हासिल करने के लिए
सरकार के आगे प्रार्थना करना। उसे (ऐसे दल को) हम माडरेट कहते हैं। यह
शब्द उस समय इस्तेमाल होता है, जब देश उस स्थिति से कुछ ऊपर उठ जाता
है। दूसरा दर्जा होता है गर्म दल का, जिस तरह 1907 में लोकमान्य तिलक जी
की पार्टी थी या आजकल महात्मा गाँधीजी का प्रचार कहा जा सकता है। लेकिन
जिस समय इन दोनों रास्तों पर चलने से भी सफलता नहीं मिलती तो तेज़
नौजवानों का एक दल कुछ और आगे बढ़ता है। वह हाथोहाथ काम करना चाहता
है, मरना और मारना चाहता है और इस ढंग से ही जीत प्राप्त करना चाहता है।
उसे (ऐसे लोगों को) अंग्रेज़ी भाषा में रिवल्यूशनरीज़ (Revolutionaries) कहते
हैं। इस रूप में वे गुप्त काम करते हैं और बाद में बदलकर खुल्लमखुल्ला
लड़ाई करने को तैयार हो जाते हैं, जिस तरह कि आयरलैण्ड वाले अब तक
लड़ते रहे हैं। यह काम जब तक गुप्त रहता है, तब तक उसे दबाने का यत्न
किया जाता है। इस स्थिति में उन्हें हिन्दुस्तानी भाषा में विप्लववादी कहते हैं,
उर्दू में इन्क़लाबी कहा जाता है। यह शब्द इज़्ज़त और निन्दा, दोनों के लिए
इस्तेमाल हो सकता है, अर्थात जब तक देश कमज़ोर है, तब तक वहाँ खुशामदी
अधिक होते हैं, तब तक वहाँ उन्हें सभी लोग बुरा कहते हैं और शासक तो उनके
दुश्मन होते ही हैं, लेकिन बाद में उन्हें ही देशभक्त कहा जाता है।
हम किसी डर के कारण चाहे उन्हें बुरा कहें, लेकिन वास्तव में वे किसी से
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भी कम ‘देशभक्त’ नहीं होते, बल्कि हम यह कह सकते हैं कि वे दूसरे शोर मचाने
वालों से देश का अधिक दर्द रखने वाले होते हैं। उनकी कोई सहायता नहीं करता।
अपने-पराये सभी बुरा-भला कहते हैं और शासक तो जो करते हैं उसका पूछना
ही क्या है। वे वीर फिर भी डटे रहते हैं और ज़रा भी घबराते नहीं। तो क्या वे किसी
से कम देशभक्त होते हैं? मैं तो कहूँगा कि दुनिया में 'End Justifies the means'
अर्थात परिणाम से ही पता चल जाता है कि उनके द्वारा इस्तेमाल किये तरीक़े अच्छे
थे या बुरे? यदि परिणाम अच्छा हो तो झूठ बोला हुआ, हत्या किया गया भी ठीक
हो जाता है, और यदि असफलता हो तो शान्ति से होने वाला काम भी बुरा ही कहा
जाता है।
क्या वाशिंगटन को उस समय बागी कहकर दबाने की कोशिश नहीं की गयी
थी? क्या यदि वह उस समय दुश्मनों के हाथ आ जाता तो उसे फाँसी न मिलती?
क्या स्काटलैण्ड का वीर वालीस सच्चा देशभक्त नहीं था? क्या उसे फाँसी नहीं
दी गयी? इस देश में काम ऐसे ही होता है। इटली की हालत देख लो, मैजिनी
जैसों ने भी तो गुप्त सोसायटियाँ बनायीं, उनके परिश्रम का ही यह फल हुआ कि
गैरीबाल्डी जैसे वीर ने दो-दो हाथ कर दिखाये। दूर क्या जाना है, अभी कल की
बात है कि रूस उठा है। कितने आदमी फाँसी पर चढ़े और बाग़ी ठहराये गये। क्या
ये सच्चे देशभक्त नहीं थे? इस बात का जवाब आज रूसवालों से पूछिये तो। इन
बेचारों को ‘निहिलिस्ट’ और ‘अनार्किस्ट’ अर्थात दुनिया में ‘अराजकता फैलाने
वाले’ और ‘खून-ख़राबा करने वाले’ कहा जाता था। उनके परिश्रम के फलस्वरूप
ही आज वहाँ पंचायती सरकार बनी हुई है।
हाँ, ये लोग जो निराश होने से ख़ून-ख़राबे पर उतारू हो जाते हैं वे पहले गुप्त
सोसायटियाँ बना लेते हैं। उन्हें अंग्रेज़ी में Revolutionaries और हिन्दी में
‘विप्लववादी’ कहा जाता है।
यदि संसार में देखा जाये तो यह बात कि ज़ोरावर की सात कौड़ी सौ हुआ
करती हैं, ठीक लगती है, क्योंकि जितनी देर एक पक्ष का ज़ोर रहा उतनी देर तो
कमज़ोर बागी, अनार्किस्ट, निहिलिस्ट, विप्लववादी, इन्क़लाब-पसन्द कहलाते हैं,
लेकिन जब दूसरा पक्ष ताक़तवर हो जाता है तो वे सच्चे देशभक्त, क़ौम के परवाने
हो जाते हैं और दूसरे ज़ालिम, अत्याचारी, लालची आदि बन जाते हैं।
शिवाजी मराठा यदि राज क़ायम न कर पाता और ज़ालिम औरंगज़ेब के दाँत
खट्टे न कर पाता तो वह डाकू ही कहलाता, लेकिन आज हम भी उसे महापुरुष
कहते हैं। खैर!
यह ख़याल कि कोई इन्क़लाब करे और ख़ून-ख़राबे से न डरे, झटपट नहीं
आ जाता। धीरे-धीरे शासक लोग जुल्म करते हैं और लोग दरख्वास्तें देते हैं, लेकिन
अहंकारी शासक उस तरफ़ ध्यान नहीं देते। फिर लोग कुछ हल्ला करते हैं, लेकिन
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कुछ नहीं बनता। उस समय फिर आगे बढ़े हुए नौजवान इस काम को सँभालते हैं।
यदि किसी देश में शान्ति हो और लोग सुख-चैन से बैठे हों तो वहाँ उतनी देर इन
विचारों का प्रचार नहीं हो सकता, जब तक कि उन्हें कोई ऐसा बड़ा भारी नया
विचार न दिया जाये, जिस पर कि वे परवानों की तरह कुर्बान हो जायें। या 'ज़ुल्म'
इस बात के लिए लोगों को तैयार करते हैं।
यदि हम अपने देश की ओर ध्यान दें तो इस बात का स्पष्ट पता चल जाता
है।
सबसे पहले यह विचार महाराष्ट्र अर्थात मराठों में किसी महापुरुष को सूझा,
लेकिन इसका प्रचार नहीं हो सका। फिर बंगाल में यह विचार आया। वीर वीरेन्द्रयश
सबसे पहले इस बात का प्रचार करने लगा। यह बात 1903 की है। लेकिन लोग
पूरे आराम में रहते थे तो ख़ामख़ाह कोई दुख में पड़े, किसी ने भी उनकी बात न
मानी। वे अपना ज़ोर लगाकर असफल होकर बैठ गये। यह पूरा विवरण रोल्ट कमेटी
की रिपोर्ट में दिया है।
फिर 1905 में बंगभंग हो गया। लोगों ने दरख्वास्तें दीं, लेकिन लॉर्ड कर्जन
ने कहा, 'सूरज पश्चिम से उग जाये लेकिन मैं बंगाल का विभाजन ऐसे ही
रखूँगा।' फिर स्वदेशी का प्रचार हुआ। कई बेचारे निर्दोष ही जेलों में ठूँस दिये
गये। कर्जन ने अपनी 'टें' नहीं छोड़ी। बताओ उस समय जब लोग दुखी बैठे हों,
तब उनमें इन बातों का प्रचार झटपट हो जाना ही हुआ कि नहीं? बस बम बनने
लगे। ख़ैर, 1908 में अलीपुर षड्यन्त्र केस चला। फिर तो काम और भी ज़ोरों पर
हो गया और 1916 तक होता रहा। फिर लोगों को डकैतियाँ डालनी पड़ीं। कुछ
दिन पहले एक बंगाली सज्जन ने भाषण दिया था कि लोग उन्हें डाकू कहते हैं।
लेकिन आप यह तो बताओ कि तुम उन्हें एक पैसा भी देते हो। वे बेचारे अपना
तो सबकुछ छोड़ बैठे हैं और आप उनकी सहायता नहीं करते तो आप सोचो कि
वे क्या करें, क्या अपना काम रोक दें? मैं बहुतों से मिला हूँ, वे सच्चे संन्यासी
हैं, देशभक्त हैं। ख़ैर, अब हम अपने प्रदेश की ओर आते हैं। पहले-पहले यह
हल्ला सरदार अजीत सिंह जी के समय हुआ था। सन् 1907 की बात है। दो
क़ानूनों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठायी गयी। जोश बढ़ता देखकर सरकार ने उनकी
बात झटपट मान ली और शोर-शराबा रुक गया। वह ज़माना चला गया। कहा
जाता है कि 1909 में सरकार को चिन्ता हुई कि बंगाल की बीमारी कहीं पंजाब
में भी न आ फैले। उन्होंने सरदार अजीत सिंह को पकड़ने की कोशिश की,
लेकिन वे बचकर निकल गये। उसके बाद पंजाब में सिवाय दिल्लीवाले बम
केस के और कोई शिगूफ़ा नहीं दीखता। वहाँ वह विचार भी बंगाल ने ही दिया
था। लेकिन उन्होंने कितने लोगों को अपने साथ मिलाया था? कुल दस-बारह
आदमी होंगे। साधारण लोग जलती आग में क्यों जाने लगे। चार को फाँसी मिली,
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कुछ को क़ैद कर दिया और बात ख़त्म हुई।
लेकिन झटपट अगले ही बरस 1915 में फिर पंजाब में ग़दर की तैयारियाँ
नज़र आती थीं। तब दो बातें थीं – एक तो लड़ाई छिड़ गयी (प्रथम महायुद्ध –
अनु.); दूसरे, सरकार ने कामागाटामारूवालों पर अत्याचार किया। वे भी अमेरिका
से, बेचारे विचार ही लेकर आये थे। लेकिन पंजाब में रहने वाले कितने लोगों ने
उनका साथ दिया? सिवाय 1907 के कुछ आदमियों के कितने लोग थे उनके
साथ? ख़ैर, मैंने अपनी बुद्धि के अनुसार संक्षेप में क्रान्तिकारी विचारों के विकास
व प्रचार का कुछ वर्णन करने का यत्न किया है और यदि मुझे समय मिला तो
एक लम्बा लेख लिखकर अन्य देशों के विस्तृत हाल समेत इसका वर्णन करने का
यत्न करूँगा।
(एक अख़बार से)
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तख़्तापलट गुप्त षड्यन्त्र
जनवरी, 1928 में जब शहीद भगतसिंह के दो लेख 'किरती' में छपे तो उनके
साथ एक लेख 'तख़्तापलट गुप्त षड्यन्त्र' नाम से भी छपा। इसके लेखक का नाम
नहीं दिया गया, लेकिन अंग्रेज़ सरकार किस तरह के तरीक़े इस्तेमाल कर क्रान्तिकारी
आन्दोलन के ख़िलाफ़ प्रचार करती थी, यह लेख इस सम्बन्ध में अच्छी जानकारी
देता है। – स.
अख़बार पढ़ने-सुनने वाले लोग इस बात से परिचित हैं कि ऐसी ख़बरें अक्सर
छपती ही रहती हैं कि हिन्द में आज फ़लाँ जगह अंग्रेज़ी सरकार के ख़िलाफ़
षड्यन्त्र का पता पुलिस ने लगाया है। और फ़लाँ स्थान पर षड्यन्त्र का मुक़दमा
चलाया गया है। आज फ़लाँ जगह षड्यन्त्रकारियों को फाँसी दी गयी है। अभी ही
एक ख़बर छपी है कि एक ऐसे षड्यन्त्र का मुक़दमा चलने वाला है जिसमें चारों
उत्तरी प्रान्त लपेटे जायेंगे। ऐसी ख़बरें पढ़कर आम भोले-भाले लोग इन षड्यन्त्रों
सम्बन्धी अपने दिल में बड़े बुरे विचार रखने लगते हैं। वास्तव में उन्हें इन षड्यन्त्रों
से सम्बन्धी कोई जानकारी नहीं होती, जिससे इस विषय पर प्रकाश डालना ज़रूरी
है। जिस तरह रात के बाद दिन और दिन के बाद रात आने की वास्तविकता से
कोई इन्कार नहीं कर सकता, उसी तरह की वास्तविकता इस कथन में है कि
हिन्दुस्तान इस गुलामी को उतारकर आज़ाद हो जायेगा। यह बात अलग है कि इस
मनोरथ को पूरा करने में समय कम या ज़्यादा लगे, और मूल्य भी महँगा ही देना
पड़े। यही वास्तविकता मज़दूर वर्ग सम्बन्धी है कि आज वह भी पूँजीपतियों की
गुलामी का जुआ उतारकर ही रहेगा।
आज़ादी के आन्दोलन दुनिया में न कभी रुके हैं और न रुक सकते हैं, लेकिन
इन्हें रोकने के लिए क़ौमों और मज़दूर वर्ग के आन्दोलन के विरोधियों ने जो-जो
हथियार इस्तेमाल किये हैं, वे साक्षात रूप में इतिहास में मौजूद हैं और इन्हें अच्छी
तरह समझने के लिए हिन्दुस्तान का मौजूदा इतिहास ही काफ़ी है।
जब आज़ादी का कोई आन्दोलन सफल तरीक़ों पर चलता दिखायी दे तो इसे
असफल करने के लिए इसके सेवकों पर सबसे बड़े आरोप जो लगाये जाते हैं, वे
यह होते हैं – 1. कि ये षड्यन्त्र कर रहे हैं, और 2. ये धर्म-विरोधी हैं। इस लेख
236 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
में इन दोनों विषयों पर विचार करने का यत्न करना है ताकि आम जनता को इनकी
तह तक पहुँचने का अवसर मिले और यह पता चल सके कि सही मायनों में
षड्यन्त्र करने वाला और धर्मों का विरोधी कौन होता है और किस तरह दुनिया का
भला करने वालों को षड्यन्त्रकारी और अधर्मी कहा जाता है। वास्तव में
षड्यन्त्रकारी और अधर्मी तो ये स्वयं होते हैं।
गुप्त तख़्तापलट आन्दोलन
वर्तमान सरकार यह हल्ला करती नहीं थकती कि हिन्दुस्तान में गुप्त तख़्तापलट
आन्दोलन क़ायम है। इस आन्दोलन के अस्तित्व को प्रकट करने के लिए कहीं न
कहीं से टूटे-फूटे पिस्तौल और बम आदि अपने खुशामदियों के माध्यम से पकड़ने
का ढोंग रच लेती है और कहीं किसी अधिकारी पर कोई खाली जाने वाला हमला
ही करवाया जाता है और कभी रेलपटरी के पेंच ढीले किये जाते हैं, जबकि लाट
साहिब आदि को गुज़रना हो। यह सब ऐसी बातें हैं, जिन्हें गुप्त तख़्तापलट षड्यन्त्र
या आन्दोलन आमतौर पर इस्तेमाल करते हैं। लेकिन इस समय यह सबकुछ पुलिस
की ओर से हो रहा है, जिसका सबूत इस बात से मिलता है कि बताये गये तख़्ता
पलटने वालों की इस कार्रवाई से नुक़सान कहाँ तक होता है? बंगाल को इस समय
सरकार इस आन्दोलन का घर बता रही है। पिछले कुछ सालों में चाहे बंगाल पुलिस
ने कितनी ही जगहों से टूटे-फूटे हथियार आदि पकड़े और कई बार सरकारी
अधिकारियों पर हमलों की साज़िश का अस्तित्व भी बताया, लेकिन आज तक वहाँ
किसी भी सरकारी अधिकारी की या कोई राजनीतिक मृत्यु नहीं हुई, जिससे यह
सिद्ध होता है कि यह सबकुछ पुलिस के आदमी ही करते हैं। यदि तख़्ता पलटने
वाले किसी सरकारी अधिकारी की जान लेने के लिए तैयार हो जायें तो क्या वे
उसे सूखा जाने देंगे? यदि तख़्ता पलटने वाले हथियार आदि रखें तो क्या इस तरह
के टूटे-फूटे ही रखें, जिनके बारे में बंगाल पुलिस भी अपनी गवाहियों में बता चुकी
है कि ये हथियार चलाने वालों के लिए ही ज़्यादा ख़तरनाक हैं और जिस पर चलाये
जाते हैं उसके लिए कम! यदि तख़्ता पलटने वाले गाड़ियाँ उलटने का यत्न करें
तो क्या इसमें सफल न हों? ये सब ऐसी बातें हैं जो सिद्ध करती हैं कि यह सबकुछ
आज़ादी के उपासकों को कुचलने के लिए पुलिस-कर्मचारियों की ओर से किया
जाता है।
हमें इस बात से इन्कार नहीं कि हिन्दुस्तान में तख़्ता पलटने का आन्दोलन है,
लेकिन हमारा कहना है कि इस समय जो हो रहा है वह पुलिस की ओर से है
और इतिहास बताता है कि जब भी कोई तख़्ता पलटने का काम शुरू करते हैं,
वे अपने वार कम ही खाली जाने देते हैं। और सरकार को भी यह निश्चय रखना
चाहिए कि ऐसे लोगों को (जिनका धर्म-ईमान ही देश की आज़ादी हो और जो
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बाक़ी सब तरीक़ों से निराश होकर आज़ादी के लिए इस तरीक़े पर भरोसा रखने
लगें) दबाने में वह कभी भी सफल नहीं हो सकती, चाहे वह कितनी ही सख़्तियाँ
करे और कितनी ही चालें चले और न ही आज तक कोई सरकार इसमें सफल
हुई है। इन आन्दोलनों को समाप्त करने का सही तरीक़ा तो यही है कि उन लोगों
की माँग पूरी की जाये, ताकि वे शान्त हों।
ऊपर जो बताया गया है यह केवल हमारा अपना ही ख़याल नहीं, बल्कि
इसकी पुष्टि बंगाल आर्डिनेंस सम्बन्धी कई ज़िम्मेदार सज्जनों के भाषणों और उनके
बयानों से होती है। इन्हीं सज्जनों के सवालों का उत्तर सरकार की ओर से सिवाय
चुप के कुछ नहीं मिला। नीचे हम अपने विचारों की पुष्टि के लिए कुछ उद्धरण
दे रहे हैं जिनसे स्पष्ट सिद्ध हो जायेगा कि सरकार कैसे हिन्दुस्तान को गुलाम रखने
के लिए कमीनी चालें चल रही है।
श्रीयुत सुभाषचन्द्र बोस को, जोकि कलकत्ता नगर सभा के चीफ़ एग्ज़्यूक्टिव
ऑफ़िसर थे और जिन्हें तख़्ता पलट करने का अपराधी कहकर बंगाल आर्डिनेंस
के अनुसार जेल में बन्द किया गया था, अब ख़राब सेहत के कारण रिहा किया
गया है। आपने बंगाल आर्डिनेंस के सम्बन्ध में अभी एक बयान प्रकाशित करवाया
है, जिसमें आप लिखते हैं –
“बंगाली राजनीतिक नज़रबन्दों को और देर तक जेलों में बन्द रखने की कोई
सन्तोषजनक वजह न होने के कारण पुलिस ने अब बम और टूटे हुए पिस्तौल
पकड़ने शुरू कर दिये हैं, ताकि सिद्ध किया जा सके कि तख़्तापलट आन्दोलन
अभी तक मौजूद है। वास्तव में पिछले कुछ सालों में जब भी कभी बंगाली
राजबन्दियों की रिहाई की चर्चा चली है और जब भी कभी असेम्बली या बंगाल
कौंसिल में नज़रबन्दों के सवाल पर विचार करने के लिए बैठक हुई है तो पुलिस
के हाथों में खेलने वाले कुछ लोग अपने पास से हथियार लेकर झट गिरफ़्तारी के
लिए पुलिस के आगे पेश हो जाते रहे हैं और फ़ौरन ही कथित बम-कारख़ानों का
पता पुलिस को लग जाता है। इन कारख़ानों में आमतौर पर कुछ मसाला होता है,
जो हर जगह मिल सकता है। फिर टूटे हुए पिस्तौल, जोकि जिस पर निशाना साधा
जाये उससे ज़्यादा ख़तरनाक उसे चलाने वालों के लिए हो सकते हैं, जैसाकि
दक्षिणेश्वर बम केस में पुलिस के गवाहों ने अपने मुँह से माना कि ये दोनों चीजें
चाहे इस्तेमाल में किसी काम की न हों, लेकिन किसी को अपराधी ठहराने के
लिए काफ़ी होती हैं।
तख़्तापलट षड्यन्त्र साबित करने के लिए शस्त्र क़ानून के अन्तर्गत चलाये गये
साधारण मुक़दमों को पुलिस और एंग्लो-इण्डियन अख़बारों की ओर से
पोलिटिकल मुक़दमे सिद्ध किया जाता है। अभी एक ऐसे पोलिटिकल मुक़दमे में
जो वायदा माफ़ गवाह बना, वह एक पुराना पुलिस एजेण्ट है।
238 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
पिछले कुछ सालों में निःसन्देह पुलिस की ओर से मनगढ़न्त तख्तापलट
आन्दोलन बनाने के लिए दलाल (Agent Provocateuors) रखे जाते हैं ताकि
खुफ़िया पुलिस के ख़ास हिस्से (Intelligence Branch) को क़ायम रखने की
ज़रूरत सिद्ध की जा सके, जिन्हें कुछ साल पहले बंगाल की सरकारी ख़र्च कम
करने वाली समिति (Bengal Retrenchment Committee) ने हटाने की सिफ़ारिश
की थी। मैं यह बयान अपनी ज़िम्मेदारी को पूरी तरह अनुभव कर लिख रहा हूँ
और जो आरोप मैं पुलिस पर लगा रहा हूँ, इनकी जाँच के लिए यदि कोई निष्पक्ष
समिति बनायी जाये और नज़रबन्दों और पब्लिक को यदि इसके सामने गवाहियाँ
देने में कोई बाधा न दी जाये और पूरी छूट हो तो इसके प्रमाण देने को भी मैं
प्रस्तुत हूँ...।
स्वर्गवासी श्रीयुत देशबन्धुदास जी ने भी बंगाल कौंसिल में भाषण देते हुए 23
जनवरी, 1924 को साफ़-साफ़ बताया कि कैसे ऊल-जलूल (सबूत) इकट्ठा कर
बंगाली देशभक्तों को जेल में डाल दिया गया है और किस प्रकार के निराधार आरोप
लगाये गये हैं। आपने यह भी ज़ाहिर किया कि इस तरह के आन्दोलन दमनकारी
तरीक़ों से दबाये नहीं जा सकते। नीचे आपके द्वारा कौंसिल में दिया गया भाषण
पूरे का पूरा दर्ज है –
“हमें यह शिकायत नहीं है कि सरकार ने इन व्यक्तियों को बग़ैर कोई सूचना
एकत्र किये ही गिरफ़्तार कर लिया है, लेकिन हमारी शिकायत यह है कि इन
सूचनाओं की अच्छी तरह जाँच नहीं की गयी और हमारी इस शिकायत के उत्तर
में एक शब्द भी नहीं कहा। हमें यह बताया गया है कि इस सम्बन्ध में कई
आदमियों ने बयान दिये हैं और यह भी बताया गया है कि जो रिपोर्टें मिली हैं,
सरकार ने उन पर विचार किया है। लेकिन जो कुछ मैं पूछना चाहता हूँ वह यह
है कि कोई सरकारी अधिकारी चाहे कितना भी योग्य क्यों न हो, किसी बयान के
ठीक होने का अनुमान कैसे कर सकता है, जब तक कि बयान देने वाले को सामने
बुलाकर उससे सवाल न किये जायें?
(जब भगतसिंह और उनके साथ भारतीय और अन्तरराष्ट्रीय क्रान्तिकारी
आन्दोलन की समीक्षा करते हुए लोगों से उसे सांझा कर रहे थे तो भारत की
स्वतन्त्रता-प्राप्ति के ढंग और स्वतन्त्रता-आन्दोलन के दरपेश पैदा रुकावटों के बारे
में चर्चा भी पूरे ज़ोर से चल रही थी। मई, 1928 से सितम्बर, 1928 तक जब
भगतसिंह पूरी तरह ‘किरती’ अख़बार चलाने में व्यस्त थे, उस समय के ये लेख
यहाँ दिये जा रहे हैं। चाहे इनके लेखकों के नामों का पता नहीं, लेकिन ये लेख
शहीद भगतसिंह और उनके साथियों के तत्कालीन विचारों का प्रतिनिधित्व करते
हैं। इसीलिए इन्हें यहाँ दिया जा रहा है। शहीद भगवतीचरण वोहरा ‘किरती’ अख़बार
से गहरे रूप से जुड़े हुए थे। – स.)
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 239
हर सम्भव तरीक़े से पूर्ण स्वतन्त्रता
अमृतसर कॉन्फ्रेंस में जिन बातों का बहुत झगड़ा हुआ और बहस हुई, उनमें से एक
सबसे अधिक ज़रूरी और महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि कांग्रेस का उद्देश्य हर सम्भव
तरीक़े से 'अंग्रेज़ी राज से बाहर पूर्ण स्वतन्त्रता' प्राप्त करना हो।
प्रस्ताव पास हो गया और बड़े-बड़े नेताओं ने कांग्रेस से इस्तीफ़े दे दिये और
धमकियाँ देनी शुरू कर दीं और प्रस्ताव पास करने वालों को षड्यन्त्रकारी, नेतागिरी
के भूखे लोग कहा गया। पंजाबभर के अख़बारों ने आसमान सर पर उठा लिया और
हाय-तौबा मचा दी। हमें समझ नहीं आ रहा कि क्या कहर टूट पड़ा।
मद्रास कांग्रेस ने पूर्ण स्वतन्त्रता (Complete Independence) का प्रस्ताव पास
कर दिया था। यहाँ उसने स्पष्ट कर दिया कि आज़ादी, पूर्ण आज़ादी अंग्रेज़ी राज
से बाहर ही हो सकती है। हाँ, यह बात साफ़ है कि मद्रास के प्रस्ताव को (अब)
ज़्यादा ज़ोरदार और निश्चित बना दिया गया है। उस प्रस्ताव पर तो किसी को कोई
ख़ास शिकायत हुई नज़र नहीं आयी थी। झगड़ा सिर्फ़ 'हर सम्भव तरीक़े से' (By
all possible means) (आज़ादी) प्राप्त करने का है। अब तो कांग्रेस कोड में लिखा
हुआ था कि – By all peaceful and legitimate means – सभी शान्तिपूर्ण और
न्यायिक तरीक़ों से स्वराज लिया जाये।
पूरा देश तैयार था। नौजवानों ने गाँव-गाँव में सिविल नाफ़रमानी की तैयारी कर
दी थी। चौरा-चौरी में एक-दो भाड़े के टट्टुओं ने अत्याचार कर दिया या यों कहो
कि कुछ लोगों से करवा दिया। बस पूर्ण शान्ति वाली बात ख़त्म। फिर क्या था,
पूरे देश का बेड़ा गर्क कर दिया। क्या ख़ूब फ़िलासफ़ी है कि शान्तिपूर्ण शब्द का
बहाना लेकर हरामख़ोर ज़मींदारों और ताल्लुकेदारों का पक्ष लिया गया। और
बारदौली रैदलीफ़न में साफ़ कह दिया गया कि हे किसानो, तुम अपने मालिकों
को लगान दे दो।
बस शान्तिपूर्ण के बहाने देश का बेड़ा गर्क कर दिया गया। यातनाओं के झूठे
आरोपों में फँसाये गये लोगों का पक्ष लेने की हिम्मत तक हमें न हुई और कई ग़रीब
वहाँ फाँसी पर चढ़ गये। यह तो अत्याचार हुआ न? इस पूर्वाग्रह को मिटाना बहुत
ज़रूरी था। इस प्रस्ताव के पास होने से लोगों के देखने का दायरा कुछ बढ़ गया है।
दूसरी बात यह है कि क्या हमने क़सम खा रखी है कि यदि शान्तिपूर्ण तरीक़े
240 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
से स्वराज मिलेगा तो लेंगे, अन्यथा हम अंग्रेज़ी राज में ही रहना पसन्द करेंगे? 'हाँ'
कहने वाले अन्धे आदर्शवादी लोगों के साथ हम बात नहीं करना चाहते। जिस
स्वराज के बारे में दुनिया का सबकुछ कुर्बान किया जा सकता है, उसके बारे में
ऐसी बेकार बातों की क्या ज़रूरत है?
हाँ, तीसरा सवाल उठा है कि क्या विद्रोह करके, लड़ाई करके हम
स्वराज ले सकते हैं? आज तो एक ही जवाब मिल सकता है कि नहीं। आज
हम इतने संगठित, सशस्त्र और ताक़तवर नहीं हैं, इसीलिए यह तरीक़ा अभी
असम्भव है। फिर झगड़ा किस बात का? सवाल यह है कि क्या हर क़ौम को
कभी भी बल-प्रयोग का अधिकार है या नहीं? डॉक्टर सत्यपाल जी के शब्दों
में – Have we not a right to employ all possible means to attain our
goal. उसके जवाब में 'ट्रिब्यून' कहता है कि नहीं। (Not a right can either
be legal or moral right) बहुत अच्छा जी! क़ानूनी अधिकार तो नहीं हो
सकता, क्योंकि क़ानून परायों के हाथ में है। पर क्यों जी, सिविल नाफ़रमानी–
सिविल नाफ़रमानी करके आसमान सर पर उठा लेने वाले सज्जन यह नहीं
जानते कि सिविल नाफ़रमानी भी कोई क़ानूनी तौर पर जायज़ (legal right)
नहीं कहला सकती। वह भी स्पष्टतः समय के क़ानून (law) को तोड़ना और
उसका विरोध करना है। किसी भी राज (State) के ख़िलाफ़ किसी तरह की
आवाज़ उठानी कभी भी legal right नहीं कहला सकती। यहाँ नैतिक
अधिकार (Moral right) होता है। यदि सम्भव होने और अत्यन्त ज़रूरी होने
पर भी बल-प्रयोग को Moral right नहीं समझा जाता तो अमेरिका के वीर
वाशिंगटन और पैट्रिक हेनरी, इटली के मैजिनी और गैरीबाल्डी, रूस के लेनिन
आदि आज़ादी दिलाने वालों और अपने सभी बुजुर्गों श्री रामचन्द्र, श्री कृष्ण,
श्री शिवाजी, श्री प्रताप और गुरु गोविन्द सिंह जी ने कुकर्म किये और वे
सम्माननीय न हुए! यह फ़िलासफ़ी भी कमाल है! सवाल सिर्फ़ यह उठता है
कि जब आज विद्रोह करना भी नहीं और है भी असम्भव तब All possible
means पास करने की ज़रूरत क्यों पड़ गयी? लेकिन जब आज पूर्ण स्वतन्त्रता
का प्रस्ताव पास करते हैं तो क्या आज ही स्वतन्त्रता ले लेते हैं? यह सिर्फ़
ऊँचा आदर्श सामने रखा गया है। इस तरह 'हर सम्भव तरीक़े से' पास करने
से लोगों की तंगदिली दूर कर दी गयी और उनके सामने बड़ा भारी आदर्श
रख दिया गया है।
साथ ही एक और बात भी है। आज कई साल हो गये हैं, जब से कितने ही
वीर 'पूर्ण स्वतन्त्रता, पूर्ण स्वतन्त्रता' की रट लगाये फाँसी पर लटक गये। आज
हमारे समझदार नेताओं को पूर्ण स्वतन्त्रता की घोषणा करने की ज़रूरत पड़ी और
वे सबसे गर्म नेता कहाने लगे। और हम किसी भी नौजवान को ताक़त में विश्वास
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 241
रखने पर दुत्कारना शुरू कर देते हैं और उन बेचारे देशभक्तों पर कहर बरपा करते
हैं और कोई परवाह नहीं करते। 1914-15 के मुक़दमों में जो अन्धेरगर्दी हुई, क्या
वे साथी अपनी ही लापरवाही का परिणाम नहीं थे? तब गला फाड़-फाड़कर
काँव-काँव। ये बड़े ख़तरनाक हैं, खूँखार हैं। और जब उन बेचारों का फाँसी लग
जाना, तब भीतर घुस-घुस बातें करना। वे सच्चे देशभक्त थे। 1908 से लोग फाँसी
पर चढ़ते रहे, पर सब अक्लमन्द लोग उन्हें गालियाँ देते रहे। 1925 में विपिनचन्द्र
पाल ने एक लेख लिखा कि It were political assasins who passed their way
to Minto Morely scheme. यानी राजनीतिक हत्यारों की कृपा से ही मिण्टो-मारले
स्कीम मिली थी। और आज काकोरी वाले शहीदों के घरवालों से सहानुभूति प्रकट
करने पर बिगड़ जाने वाला Modern Review भी विपिनचन्द्र पाल की उपरोक्त बात
की ताईद करता हुआ एक बड़े माडरेट एस.आर. दास के एक पत्र में लिखता है
कि इंगलिस्तान को जगाने के लिए और यह बताने के लिए कि हिन्दुस्तान की
स्थिति अच्छी नहीं है, एक बम की ज़रूरत थी – 'A bomb was necessary to
awaken England from Iber sweet dream that all was well with India.'
यदि उन ग़रीबों की ओर, जोकि शान्ति में विश्वास नहीं करते, लेकिन आज़ादी
के लिए हम लोगों से अधिक बलिदान कर सकते हैं, समय पर ध्यान दिया जाये
तो कम से कम उनके साथ अन्धेरगर्दी और जुल्म तो न हुआ करें और उनकी
मुसीबत में कुछ तो कमी हो जाया करे।
एक और भी बात है कि माडरेटों को सदस्य बनाने के लिए खद्दर की शर्त
लगाने पर ज़ोर देने वाले सज्जन यह तो बतायें कि क्या माडरेटों से अधिक बलिदान
करने वाले नौजवानों के लिए कांग्रेस का दर खोलना पाप है? उनको आगे नहीं आने
देना? यह तो हम जानते हैं कि आज़ादी की जंग में इस्तेमाल के लिए हमारे पास
केवल एक ही हथियार है 'सिविल नाफ़रमानी' और वैसा आन्दोलन अधिक
शान्तिपूर्ण होगा ही, लेकिन 'सम्भव' शब्द के आ जाने से किसी को भी कोई
शिकायत नहीं रह जानी चाहिए।
और यदि शब्द कहने से डरते हो कि सरकार आ गला पकड़ेगी तो सुन लो
– "Freedom has to be won inch by inch and whether peaceful or other
methods are employed, the Government of the day will not spare any pains
to crush the movement of independence." यानी सरकार तो शान्तिपूर्ण या
अशान्तिपूर्ण, सभी आन्दोलनों को दबाने की कोशिश करेगी। इसलिए हमें उस
प्रस्ताव से डरना नहीं चाहिए जिसने हमारे काम के दायरे को ज़्यादा खुला कर दिया
और हमारी तंगनज़र को खोल दिया है, बल्कि उसका तो स्वागत करना चाहिए।
किरती/मई, 1928
242 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
आतंक के असली अर्थ
अपने समय की विचारधारात्मक बहस में हिस्सा लेते हुए भगतसिंह और उनके
साथियों ने 'आतंक' शब्द के अर्थ समझने की कोशिश की। मई, 1928 के 'किरती'
में यह लेख इसी विषय पर छपा जो बम्बई के अख़बार 'श्रद्धानन्द' से अनूदित था
तथा भगतसिंह और उनके साथियों के उस समय के विचारों का प्रतिनिधित्व करता
है। – स.
पिछले सात-आठ सालों में जिन कुछ शब्दों ने हमारे राजनीतिक जीवन में तूफ़ान
खड़ा किया है और जिनके बारे में बहुत लोगों को ग़लतफ़हमी रही है उनमें सबसे
ज़रूरी शब्द 'आतंक' है। अब तक किसी ने भी गहन विचार कर इस शब्द के अर्थ
समझने के यत्न नहीं किये। इसीलिए आज तक इस शब्द का ग़लत इस्तेमाल होता
रहा है। पूरी क़ौम अपने लक्ष्य को ठीक न समझ पाने के कारण दिन को रात और
रात को दिन समझती हुई ठोकरें खा रही है।
आतंक पर बोलते ही अनुभव होने लगता है कि वह त्याज्य और बुरा शब्द है।
सुनते ही यह विचार पैदा होता है कि वह दुख देने वाला, अत्याचारी,
ज़ोर-ज़बरदस्ती और अन्यायपूर्ण है। जिस काम के साथ 'आतंक' शब्द लग जाये
वही काम पलीत, हानिकर और त्याज्य लगने लगता है। इस हालत में कोई शरीफ़
और नेकदिल इन्सान इससे हमेशा के लिए परे रहने का यत्न करे तो यह एक
स्वाभाविक बात है। आतंक और जुल्म से आशय ताक़त का अयोग्य ढंग से प्रयोग
है। इन दोनों शब्दों से ताक़त के इस्तेमाल की बू तो आती है, लेकिन ताक़त के
इस्तेमाल की एक सीमा है। उसी सीमा का ख़याल न रखते हुए कुछ हंगामाबाज़
लोगों ने 'आतंक' नाम दे दिया है और हिन्दी भाषा में इसकी तुलना में 'अहिंसा'
शब्द ठोंक दिया गया है। इसी कारण आज एक बड़ी ख़तरनाक ग़लतफ़हमी फैली
हुई है।
आतंक में ताक़त का इस्तेमाल भी होता है। इसलिए कुछ घटिया दिमाग़ वालों
ने ताक़त के इस्तेमाल को ही आतंक का नाम दे डाला। किसी आदमी को बुरे काम
से रोकने के लिए यही कह देना काफ़ी होता है कि वह काम बहुत बुरा और घृणित
है। ऐसे ही शब्दों में आतंक भी एक है। कांग्रेस के आदेशानुसार हज़ारों इन्सान बिना
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 243
किसी न-नकार के शान्ति की क़समें उठाते चले गये। बात तो ठीक थी। आतंक
का अर्थ ज़ुल्म और ज़बरदस्ती करना है। ऐसा बुरा काम न करने की क़सम खाने
में किसी को क्या उज़्र हो सकता है, लेकिन असली बात यह है कि ज़ुल्म को
नहीं, बल्कि ताक़त के इस्तेमाल को ही आतंक का नाम देकर लोगों में ग़लतफ़हमी
फैला दी गयी है। बहुत-से लोग जोकि ताक़त के इस्तेमाल के हक़ में थे, वे आतंक
का पक्ष लेने की हिम्मत न दिखा सके और उन्होंने भी चुपचाप शान्तिपूर्ण
(आन्दोलन) के पक्ष में होने की क़सम उठा ली। इसीलिए अहिंसा (Non-
violence) जैसे शब्दों ने बहुत गड़बड़ी मचा दी। हज़ारों ही काम जो आज तक न
सिर्फ़ जायज़, बल्कि अच्छे माने जाते थे, वह पलक झपकने में ही घृणित माने जाने
लगे। वीरता, हिम्मत, शहादत, बलिदान, सैनिक-कर्तव्य, शस्त्र चलाने की योग्यता,
दिलेरी और अत्याचारियों का सर कुचलने वाली बहादुरी आदि गुण बल-प्रयोग पर
निर्भर थे। अब ये गुण अयोग्यता और नीचता समझे जाने लगे! आतंक शब्द के इन
भ्रामक अर्थों ने क़ौम की समझ पर पानी फेर दिया। नौबत यहाँ तक पहुँची कि
हथौड़े से पत्थर का बुत तोड़ना भी आतंक के दायरे में मान लिया गया और लाठी
पकड़ने तक को आतंक माना गया। तो क्या बुत को हाथों से तोड़ा जाये?
किसी भी शब्द के सुनते ही हर इन्सान के दिल में एक विचित्र ढंग की
भावनाएँ पैदा हो जाती हैं और उसके बाद झटपट एक प्रकार के अर्थ समझ
चुकने के कारण इन्सान उसकी तह तक जाने के लिए अधिक दिमाग़ नहीं
लड़ाता। किसी अजनबी इन्सान के आते ही यदि यह कह दिया जाये कि वह
बड़ा पापी है, लुच्चा है, तो सुनने वाले के दिल में उसके ख़िलाफ़ स्वभावतः
ही एक तरह के घृणित ख़याल उत्पन्न हो जाते हैं। उस आदमी के सम्बन्ध में
अधिक जाँच किये बग़ैर ही राय बना ली जाती है। इसी तरह शब्दों के प्रयोग
सम्बन्धी मामले में कहा जा सकता है। वेदों और पुराणों में इस बात पर ज़ोर दिया
गया है कि जो भी शब्द बोले जायें, उनका सही प्रयोग होना चाहिए, क्योंकि
शाब्दिक भ्रम से देवताओं तक में बड़े-बड़े दंगे हो गये थे और बड़ा भारी
नुक़सान हो गया था। ठीक वही दशा पिछले सात साल से हमारी हो रही है।
ताक़त के योग्य और अयोग्य इस्तेमाल को बिना किसी जाँच-विचार के फ़ौरन
आतंक का फतवा देकर घृणित होने की घोषणा कर दी गयी है।
यदि कोई डाकू कुल्हाड़ी लेकर किसी के घर में आ घुसे तो उसे आतंक (की
कार्यवाही) कहा गया, लेकिन यदि घरवालों ने छुरी का इस्तेमाल कर डाकू को
मार डाला तो उसे भी आतंक (का काम) माना गया। अर्थात जब अपने और अपने
परिवार की रक्षा के लिए ताक़त का योग्य और नेक इरादों से इस्तेमाल किया गया
तब भी उसे आतंक ही कहा गया। रावण ज़ोर-ज़बरदस्ती सीता को उठा ले गया
तो वह आतंक। और सीता को छुड़ाने गये राम ने रावण का सिर काट दिया तो वह
244 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
भी आतंक! इटली, अमेरिका, आयरलैण्ड आदि देशों पर कई प्रकार के जुल्म करने
वाले अत्याचारी भी आतंक फैलाने वाले समझे गये और नंगी तलवार पकड़े इन
विदेशी डकैतों का छिपी हुई शमशीर से इलाज करने वालों को भी आतंक (फैलाने
वाले) की उपाधि दी जाती है। गैरीबाल्डी, वाशिंगटन, एमट और डी वलेरा आदि
सभी इसी सूची में डाल दिये गये। क्या इसे इन्साफ़ कहा जा सकता है? आभूषण
चुराने के लिए मासूम बच्चे की गरदन काट देने वाला चोर भी घृणित और उस
पत्थर-दिल चोर को फाँसी पर लटका देने वाला न्यायकारी सम्राट भी आतंकवादी
और घृणित! कृष्ण भी उतना ही पापी, जितना कंस! शूरवीर भीम भी उतना ही
गुनहगार, जितना कि उसकी धर्मात्मा पत्नी का अपमान करने वाला दुःशासन! आह!
कितनी ग़लतफ़हमी है। कितना बड़ा अन्याय है। इसीलिए कुछ सीधे-सादे लोगों ने
अच्छे कामों को भी केवल बल-प्रयोग के कारण अयोग्य और आतंकवादी कह
दिया। साँप डसता है, आदमी उसे मार डालता है। पर दोनों बराबर-बराबर नहीं।
डसना तो साँप की आदत थी और वह इस आदत से मजबूर था, लेकिन इन्सान
ने यह काम जानबूझकर किया, इसलिए उसे अधिक नीच समझा जाना चाहिए!
नौबत यहाँ तक पहुँची कि देश और क़ौम के लिए सशस्त्र हो मैदाने-जंग में शहीद
हो जाने वाले बहादुर भी पापी समझे जाने लगे। शिवाजी, राणा प्रताप और रणजीत
सिंह जी को आतंक फैलाने वाले कहा गया और वे पूजनीय व्यक्तित्व भी घृणा
का शिकार हो गये।
उधर दुनिया के सारे देश शस्त्रधारी हैं। प्रत्येक अपने हथियारों की ताक़त को
बढ़ाता चला जा रहा है। इधर हमारा यह भारतवर्ष है, जिसमें रहने वालों का शस्त्र
पकड़ना पाप समझा जाता है। 'लाठी मत पकड़ो' – यह शिक्षा देने वाले लाठी
देखते ही डरपोक और कायर लोगों की पीठ ठोंकने लगे। देश को गिरी हुई अवस्था
से उठाकर उन्नति के रास्ते पर खड़ा करने वाली शूर-वीरता मटियामेट होने लगी
और ताक़त से डरने वाले दुश्मन राजी-ख़ुशी दिखायी देने लगे। कुछ बिरले ही लोग
थे जो यह दुखद स्थिति न देख सके और उन्होंने इसका खण्डन करना शुरू कर
दिया। लेकिन हैरानी की बात तो यह है कि वे स्वयं भी इस गड़बड़ी का शिकार
हो गये और ठोस तर्कों से विरोध प्रकट करना उनके लिए कठिन हो गया। बस
इसी से युग पलटने वाले लोगों ने चिढ़कर यह कहना शुरू कर दिया – हाँ, हाँ,
हम आतंक फैलायेंगे, हम Violence ही करेंगे! जैसे कोई शरीफ़ आदमी अपने अच्छे
काम को गुनाह ठहराये जाते देखकर और फिर तर्कसम्मत उत्तर न दे पाने के कारण
हड़बड़ाकर यही कहना शुरू कर दे – हाँ, हाँ, मैं गुनाह ही करूँगा। ठीक यही
स्थिति इन बेचारे युग पलटने वालों की हो रही है। मद्रास कांग्रेस के अध्यक्ष तक
ने यह कह दिया कि आज यदि हम शान्तिपूर्ण (तरीक़े) के पक्षधर हैं तो इसका
यह अर्थ नहीं है कि हम हमेशा ऐसे ही रहेंगे। हो सकता है कि हमें कल ही आतंक
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 245
(Violence) के लिए तैयार होना पड़े। दुख तो इस बात का है कि यह 'आतंक'
शब्द घृणित है। यह अपने गुणों व ठीक अर्थों में व्याख्यायित न होने के कारण दूसरों
को अपने पक्ष में नहीं कर सका – अर्थात वे लोग जोकि बल-प्रयोग के पक्ष में
भी हैं, वे भी ज़ालिम या आतंकवादी कहलवाना पसन्द नहीं कर सकते। इस एक
शब्द 'आतंक' के अर्थों के अनर्थ होने के कारण ही कितना भारी नुक़सान हो रहा
है।
पूरी ग़लतफ़हमी की जड़ तो इस एक शब्द 'आतंक' की ग़लत व्याख्या है;
क्योंकि आतंक व ज़ुल्म भी बल-प्रयोग से ही होते हैं, इसलिए बल-प्रयोग से बहुत
सारे अच्छे व बुरे काम होते हैं। ज़ुल्म इनमें से एक है। एक पुरुष चोरी से किसी
के घर में आग लगाता है, वह भी आग लगाने वाला है और दूसरी ओर रसोइया
भी आग जलाता है, लेकिन रसोइया अपराधी नहीं कहला सकता और न ही आग
लगाने का काम बुरा कहा जा सकता है। इसी तरह अपने देश की रक्षा के लिए
या देश की आज़ादी की प्राप्ति के लिए शस्त्र लेकर मैदान में उतरने वाला देशभक्त
जब ज़ालिम और बलशाली की गर्दन तलवार से उतार देता है या ज़ालिम से किसी
मज़लूम का बदला लेता हुआ फाँसी पर चढ़ जाता है, वह या कोई और शूरवीर,
जोकि अपने सगे-सम्बन्धियों, अपनी पत्नी या घर-बार की रक्षा के लिए हथियार
लेकर लुच्चे ज़ालिमों का मुक़ाबला करने के लिए निकलता है, वह बल-प्रयोग
तो ज़रूर करता है, लेकिन आतंक नहीं फैलाता, अर्थात इनके किये काम, आतंक
के कामों में नहीं गिने जा सकते, बल्कि वे अच्छे और नेक कहे जाते हैं।
वह बल-प्रयोग जिससे निर्दोषों को बिना किसी कारण से सताया जाये या
दूसरों को किसी नीच इच्छा से नुक़सान पहुँचाया जाये, केवल ऐसे ही बेहूदा कामों
के लिए (किये गये) बल-प्रयोग को आतंक कहा जा सकता है, लेकिन जब इसी
ताक़त को किसी ग़रीब अनाथ की मदद के लिए या ऐसे ही किसी और काम
के लिए इस्तेमाल किया जाये तो वह आतंक नहीं, बल्कि पुण्य और परोपकार
कहलाता है। या फिर इससे सिद्ध हुआ कि बल-प्रयोग करना कोई ज़ुल्म, अत्याचार
या आतंक नहीं, बल्कि यह बल-प्रयोग करने वाले की नीयत पर निर्भर रहता है।
यदि उसने किसी भले व नेक काम के लिए बल-प्रयोग किया है तो उसे आतंक
का दोषी नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन यदि उसने अपने व्यक्तिगत हित या
निर्दोषों को दुख देने की ख़ातिर अपने बल का ग़लत प्रयोग किया है तो उसे
निःसन्देह, निर्भय होकर 'आतंकवादी' कहा जा सकता है। आतंक हमेशा ही घृणा
योग्य है। आतंक ताक़त का ऐसा इस्तेमाल है, जिससे बिना अपराध के किसी को
दुख दिया जाये। लेकिन जहाँ ज़ालिमों और गुण्डों की गुण्डई रोकने के लिए
बल-प्रयोग किया जाये, वह आतंक नहीं बल्कि अच्छा व भला काम होता है,
क्योंकि दुनिया के अच्छे कामों की परख की एक ही कसौटी है – यह कि वे
246 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़