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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 239, कुल 788 में से

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पृष्ठ 239

भी कम ‘देशभक्त’ नहीं होते, बल्कि हम यह कह सकते हैं कि वे दूसरे शोर मचाने
वालों से देश का अधिक दर्द रखने वाले होते हैं। उनकी कोई सहायता नहीं करता।
अपने-पराये सभी बुरा-भला कहते हैं और शासक तो जो करते हैं उसका पूछना
ही क्या है। वे वीर फिर भी डटे रहते हैं और ज़रा भी घबराते नहीं। तो क्या वे किसी
से कम देशभक्त होते हैं? मैं तो कहूँगा कि दुनिया में 'End Justifies the means'
अर्थात परिणाम से ही पता चल जाता है कि उनके द्वारा इस्तेमाल किये तरीक़े अच्छे
थे या बुरे? यदि परिणाम अच्छा हो तो झूठ बोला हुआ, हत्या किया गया भी ठीक
हो जाता है, और यदि असफलता हो तो शान्ति से होने वाला काम भी बुरा ही कहा
जाता है।
क्या वाशिंगटन को उस समय बागी कहकर दबाने की कोशिश नहीं की गयी
थी? क्या यदि वह उस समय दुश्मनों के हाथ आ जाता तो उसे फाँसी न मिलती?
क्या स्काटलैण्ड का वीर वालीस सच्चा देशभक्त नहीं था? क्या उसे फाँसी नहीं
दी गयी? इस देश में काम ऐसे ही होता है। इटली की हालत देख लो, मैजिनी
जैसों ने भी तो गुप्त सोसायटियाँ बनायीं, उनके परिश्रम का ही यह फल हुआ कि
गैरीबाल्डी जैसे वीर ने दो-दो हाथ कर दिखाये। दूर क्या जाना है, अभी कल की
बात है कि रूस उठा है। कितने आदमी फाँसी पर चढ़े और बाग़ी ठहराये गये। क्या
ये सच्चे देशभक्त नहीं थे? इस बात का जवाब आज रूसवालों से पूछिये तो। इन
बेचारों को ‘निहिलिस्ट’ और ‘अनार्किस्ट’ अर्थात दुनिया में ‘अराजकता फैलाने
वाले’ और ‘खून-ख़राबा करने वाले’ कहा जाता था। उनके परिश्रम के फलस्वरूप
ही आज वहाँ पंचायती सरकार बनी हुई है।
हाँ, ये लोग जो निराश होने से ख़ून-ख़राबे पर उतारू हो जाते हैं वे पहले गुप्त
सोसायटियाँ बना लेते हैं। उन्हें अंग्रेज़ी में Revolutionaries और हिन्दी में
‘विप्लववादी’ कहा जाता है।
यदि संसार में देखा जाये तो यह बात कि ज़ोरावर की सात कौड़ी सौ हुआ
करती हैं, ठीक लगती है, क्योंकि जितनी देर एक पक्ष का ज़ोर रहा उतनी देर तो
कमज़ोर बागी, अनार्किस्ट, निहिलिस्ट, विप्लववादी, इन्क़लाब-पसन्द कहलाते हैं,
लेकिन जब दूसरा पक्ष ताक़तवर हो जाता है तो वे सच्चे देशभक्त, क़ौम के परवाने
हो जाते हैं और दूसरे ज़ालिम, अत्याचारी, लालची आदि बन जाते हैं।
शिवाजी मराठा यदि राज क़ायम न कर पाता और ज़ालिम औरंगज़ेब के दाँत
खट्टे न कर पाता तो वह डाकू ही कहलाता, लेकिन आज हम भी उसे महापुरुष
कहते हैं। खैर!
यह ख़याल कि कोई इन्क़लाब करे और ख़ून-ख़राबे से न डरे, झटपट नहीं
आ जाता। धीरे-धीरे शासक लोग जुल्म करते हैं और लोग दरख्वास्तें देते हैं, लेकिन
अहंकारी शासक उस तरफ़ ध्यान नहीं देते। फिर लोग कुछ हल्ला करते हैं, लेकिन
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 233