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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 247, कुल 788 में से

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पृष्ठ 247

से स्वराज मिलेगा तो लेंगे, अन्यथा हम अंग्रेज़ी राज में ही रहना पसन्द करेंगे? 'हाँ'
कहने वाले अन्धे आदर्शवादी लोगों के साथ हम बात नहीं करना चाहते। जिस
स्वराज के बारे में दुनिया का सबकुछ कुर्बान किया जा सकता है, उसके बारे में
ऐसी बेकार बातों की क्या ज़रूरत है?
हाँ, तीसरा सवाल उठा है कि क्या विद्रोह करके, लड़ाई करके हम
स्वराज ले सकते हैं? आज तो एक ही जवाब मिल सकता है कि नहीं। आज
हम इतने संगठित, सशस्त्र और ताक़तवर नहीं हैं, इसीलिए यह तरीक़ा अभी
असम्भव है। फिर झगड़ा किस बात का? सवाल यह है कि क्या हर क़ौम को
कभी भी बल-प्रयोग का अधिकार है या नहीं? डॉक्टर सत्यपाल जी के शब्दों
में – Have we not a right to employ all possible means to attain our
goal. उसके जवाब में 'ट्रिब्यून' कहता है कि नहीं। (Not a right can either
be legal or moral right) बहुत अच्छा जी! क़ानूनी अधिकार तो नहीं हो
सकता, क्योंकि क़ानून परायों के हाथ में है। पर क्यों जी, सिविल नाफ़रमानी–
सिविल नाफ़रमानी करके आसमान सर पर उठा लेने वाले सज्जन यह नहीं
जानते कि सिविल नाफ़रमानी भी कोई क़ानूनी तौर पर जायज़ (legal right)
नहीं कहला सकती। वह भी स्पष्टतः समय के क़ानून (law) को तोड़ना और
उसका विरोध करना है। किसी भी राज (State) के ख़िलाफ़ किसी तरह की
आवाज़ उठानी कभी भी legal right नहीं कहला सकती। यहाँ नैतिक
अधिकार (Moral right) होता है। यदि सम्भव होने और अत्यन्त ज़रूरी होने
पर भी बल-प्रयोग को Moral right नहीं समझा जाता तो अमेरिका के वीर
वाशिंगटन और पैट्रिक हेनरी, इटली के मैजिनी और गैरीबाल्डी, रूस के लेनिन
आदि आज़ादी दिलाने वालों और अपने सभी बुजुर्गों श्री रामचन्द्र, श्री कृष्ण,
श्री शिवाजी, श्री प्रताप और गुरु गोविन्द सिंह जी ने कुकर्म किये और वे
सम्माननीय न हुए! यह फ़िलासफ़ी भी कमाल है! सवाल सिर्फ़ यह उठता है
कि जब आज विद्रोह करना भी नहीं और है भी असम्भव तब All possible
means पास करने की ज़रूरत क्यों पड़ गयी? लेकिन जब आज पूर्ण स्वतन्त्रता
का प्रस्ताव पास करते हैं तो क्या आज ही स्वतन्त्रता ले लेते हैं? यह सिर्फ़
ऊँचा आदर्श सामने रखा गया है। इस तरह 'हर सम्भव तरीक़े से' पास करने
से लोगों की तंगदिली दूर कर दी गयी और उनके सामने बड़ा भारी आदर्श
रख दिया गया है।
साथ ही एक और बात भी है। आज कई साल हो गये हैं, जब से कितने ही
वीर 'पूर्ण स्वतन्त्रता, पूर्ण स्वतन्त्रता' की रट लगाये फाँसी पर लटक गये। आज
हमारे समझदार नेताओं को पूर्ण स्वतन्त्रता की घोषणा करने की ज़रूरत पड़ी और
वे सबसे गर्म नेता कहाने लगे। और हम किसी भी नौजवान को ताक़त में विश्वास
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 241