भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 240, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंकुछ नहीं बनता। उस समय फिर आगे बढ़े हुए नौजवान इस काम को सँभालते हैं।
यदि किसी देश में शान्ति हो और लोग सुख-चैन से बैठे हों तो वहाँ उतनी देर इन
विचारों का प्रचार नहीं हो सकता, जब तक कि उन्हें कोई ऐसा बड़ा भारी नया
विचार न दिया जाये, जिस पर कि वे परवानों की तरह कुर्बान हो जायें। या 'ज़ुल्म'
इस बात के लिए लोगों को तैयार करते हैं।
यदि हम अपने देश की ओर ध्यान दें तो इस बात का स्पष्ट पता चल जाता
है।
सबसे पहले यह विचार महाराष्ट्र अर्थात मराठों में किसी महापुरुष को सूझा,
लेकिन इसका प्रचार नहीं हो सका। फिर बंगाल में यह विचार आया। वीर वीरेन्द्रयश
सबसे पहले इस बात का प्रचार करने लगा। यह बात 1903 की है। लेकिन लोग
पूरे आराम में रहते थे तो ख़ामख़ाह कोई दुख में पड़े, किसी ने भी उनकी बात न
मानी। वे अपना ज़ोर लगाकर असफल होकर बैठ गये। यह पूरा विवरण रोल्ट कमेटी
की रिपोर्ट में दिया है।
फिर 1905 में बंगभंग हो गया। लोगों ने दरख्वास्तें दीं, लेकिन लॉर्ड कर्जन
ने कहा, 'सूरज पश्चिम से उग जाये लेकिन मैं बंगाल का विभाजन ऐसे ही
रखूँगा।' फिर स्वदेशी का प्रचार हुआ। कई बेचारे निर्दोष ही जेलों में ठूँस दिये
गये। कर्जन ने अपनी 'टें' नहीं छोड़ी। बताओ उस समय जब लोग दुखी बैठे हों,
तब उनमें इन बातों का प्रचार झटपट हो जाना ही हुआ कि नहीं? बस बम बनने
लगे। ख़ैर, 1908 में अलीपुर षड्यन्त्र केस चला। फिर तो काम और भी ज़ोरों पर
हो गया और 1916 तक होता रहा। फिर लोगों को डकैतियाँ डालनी पड़ीं। कुछ
दिन पहले एक बंगाली सज्जन ने भाषण दिया था कि लोग उन्हें डाकू कहते हैं।
लेकिन आप यह तो बताओ कि तुम उन्हें एक पैसा भी देते हो। वे बेचारे अपना
तो सबकुछ छोड़ बैठे हैं और आप उनकी सहायता नहीं करते तो आप सोचो कि
वे क्या करें, क्या अपना काम रोक दें? मैं बहुतों से मिला हूँ, वे सच्चे संन्यासी
हैं, देशभक्त हैं। ख़ैर, अब हम अपने प्रदेश की ओर आते हैं। पहले-पहले यह
हल्ला सरदार अजीत सिंह जी के समय हुआ था। सन् 1907 की बात है। दो
क़ानूनों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठायी गयी। जोश बढ़ता देखकर सरकार ने उनकी
बात झटपट मान ली और शोर-शराबा रुक गया। वह ज़माना चला गया। कहा
जाता है कि 1909 में सरकार को चिन्ता हुई कि बंगाल की बीमारी कहीं पंजाब
में भी न आ फैले। उन्होंने सरदार अजीत सिंह को पकड़ने की कोशिश की,
लेकिन वे बचकर निकल गये। उसके बाद पंजाब में सिवाय दिल्लीवाले बम
केस के और कोई शिगूफ़ा नहीं दीखता। वहाँ वह विचार भी बंगाल ने ही दिया
था। लेकिन उन्होंने कितने लोगों को अपने साथ मिलाया था? कुल दस-बारह
आदमी होंगे। साधारण लोग जलती आग में क्यों जाने लगे। चार को फाँसी मिली,
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