भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 236, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंआजकल जो लोग अंग्रेज़ी अख़बार पढ़ते हैं उन्हें पता है कि इस बिल का
किस तरह अंग्रेज़ी श्रमिक प्रेस में विरोध हो रहा है। इस बिल को वर्ग-क़ानून कहा
जाता है। मज़दूर समझते हैं कि बाल्डविन की सरकार ने उनके बुनियादी अधिकारों
पर धावा बोल दिया है। इस बिल से उनके संगठन के बिखर जाने का भारी ख़तरा
है। मज़दूरों का अपना दैनिक अख़बार 'डेली हेराल्ड' (Daily Herald) लिखता है
कि यह बिल मज़दूरों को मानसिक रोगी समझता है और सख़्त अपराधियों के लिए
इसने सज़ा भी नियत कर दी है। एक और मज़दूर नेता ने इसे मुसोलिनी जैसा क़ानून
कहा है।
बड़ी हड़ताल के समय से ही एक जगह खड़े (अनुदार) गुट के लोग यह
माँग कर रहे थे कि सरकार कोई बिल संसद में पेश करे, जिससे कि सबके सब
मज़दूर हड़ताल ही न कर सकें। और यदि एक यूनियन के मज़दूर किसी दूसरी
यूनियन की हमदर्दी में हड़ताल कर दें तो वह हड़ताल गैर-क़ानूनी मानी जाये। इस
समय यदि कोई यूनियन हड़ताल करती है तो वे मज़दूर जो हड़ताल में शामिल नहीं
होंगे, उन्हें यह समझाया नहीं जा सकेगा कि वे भी इसमें शामिल हों, क्योंकि यदि
मज़दूर पिकेटिंग आदि के जरिये ऐसा करेंगे तो उन्हें सज़ा दी जा सकेगी। इस बिल
से सिविल सर्विस के कर्मचारियों के लिए किसी पार्टी में शामिल होना मना हो
गया है और सबसे बड़ी चोट मज़दूरों की राजनीतिक पार्टी पर की गयी है। वह
यह है कि कोई मज़दूर राजनीतिक कामों के लिए तब तक चन्दा नहीं दे सकता,
जब तक कि वह लिखकर न दे कि वह राजनीतिक कामों के लिए चन्दा इकट्ठा
कर सकते हैं, लेकिन जो लोग चन्दा नहीं देना चाहते, वे लिखकर दें कि वे चन्दा
नहीं देना चाहते। अब स्थिति उलटी हो गयी है।
इस आख़िरी अंक से श्रमिकों के संगठन को बड़ी भारी चोट पड़ेगी और इस
ज़माने में जबकि कोई पार्टी रुपयों के बग़ैर चल ही नहीं सकती तो यह स्पष्ट है
कि श्रमिक पार्टी का रुपयों के बग़ैर गला दबाने के लिए यह चाल चली गयी है।
अन्य पार्टियों की तरह लेबर पार्टी को भी संसद में अपने उम्मीदवार खड़े करने
और उन्हें सफल बनाने के लिए रुपयों की ज़रूरत है। जब दूसरी पार्टियाँ जैसे चाहे
रुपये इकट्ठा कर सकती हैं और उन्हें कभी पूछा तक नहीं गया है तो कोई वजह
नहीं कि मज़दूरों की पार्टी के भीतर कामों में ख़ामख़ाह टाँग अड़ायी जाये।
इस समय तक मज़दूरों की राजनीतिक पार्टी अपने फण्ड ट्रेड यूनियनों से
इकट्ठा करती रही है। अनुदारवादी गुट का यह विचार है कि इस तरह यदि मज़दूर
पार्टी के फण्ड ही बन्द कर दिये गये तो मज़दूरों का संगठन स्वयं ही दोफाड़ हो
जायेगा और इनके घरों में घी के दिये जल जायेंगे। इस तरह श्रमिक संगठन के टूट
जाने से यह सदा ही इंग्लिस्तान के राज पर क़ब्ज़ा जमाये रखेंगे। पर कौन-सी पार्टी
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