भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 249, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंआतंक के असली अर्थ
अपने समय की विचारधारात्मक बहस में हिस्सा लेते हुए भगतसिंह और उनके
साथियों ने 'आतंक' शब्द के अर्थ समझने की कोशिश की। मई, 1928 के 'किरती'
में यह लेख इसी विषय पर छपा जो बम्बई के अख़बार 'श्रद्धानन्द' से अनूदित था
तथा भगतसिंह और उनके साथियों के उस समय के विचारों का प्रतिनिधित्व करता
है। – स.
पिछले सात-आठ सालों में जिन कुछ शब्दों ने हमारे राजनीतिक जीवन में तूफ़ान
खड़ा किया है और जिनके बारे में बहुत लोगों को ग़लतफ़हमी रही है उनमें सबसे
ज़रूरी शब्द 'आतंक' है। अब तक किसी ने भी गहन विचार कर इस शब्द के अर्थ
समझने के यत्न नहीं किये। इसीलिए आज तक इस शब्द का ग़लत इस्तेमाल होता
रहा है। पूरी क़ौम अपने लक्ष्य को ठीक न समझ पाने के कारण दिन को रात और
रात को दिन समझती हुई ठोकरें खा रही है।
आतंक पर बोलते ही अनुभव होने लगता है कि वह त्याज्य और बुरा शब्द है।
सुनते ही यह विचार पैदा होता है कि वह दुख देने वाला, अत्याचारी,
ज़ोर-ज़बरदस्ती और अन्यायपूर्ण है। जिस काम के साथ 'आतंक' शब्द लग जाये
वही काम पलीत, हानिकर और त्याज्य लगने लगता है। इस हालत में कोई शरीफ़
और नेकदिल इन्सान इससे हमेशा के लिए परे रहने का यत्न करे तो यह एक
स्वाभाविक बात है। आतंक और जुल्म से आशय ताक़त का अयोग्य ढंग से प्रयोग
है। इन दोनों शब्दों से ताक़त के इस्तेमाल की बू तो आती है, लेकिन ताक़त के
इस्तेमाल की एक सीमा है। उसी सीमा का ख़याल न रखते हुए कुछ हंगामाबाज़
लोगों ने 'आतंक' नाम दे दिया है और हिन्दी भाषा में इसकी तुलना में 'अहिंसा'
शब्द ठोंक दिया गया है। इसी कारण आज एक बड़ी ख़तरनाक ग़लतफ़हमी फैली
हुई है।
आतंक में ताक़त का इस्तेमाल भी होता है। इसलिए कुछ घटिया दिमाग़ वालों
ने ताक़त के इस्तेमाल को ही आतंक का नाम दे डाला। किसी आदमी को बुरे काम
से रोकने के लिए यही कह देना काफ़ी होता है कि वह काम बहुत बुरा और घृणित
है। ऐसे ही शब्दों में आतंक भी एक है। कांग्रेस के आदेशानुसार हज़ारों इन्सान बिना
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 243