भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 244, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंबाक़ी सब तरीक़ों से निराश होकर आज़ादी के लिए इस तरीक़े पर भरोसा रखने
लगें) दबाने में वह कभी भी सफल नहीं हो सकती, चाहे वह कितनी ही सख़्तियाँ
करे और कितनी ही चालें चले और न ही आज तक कोई सरकार इसमें सफल
हुई है। इन आन्दोलनों को समाप्त करने का सही तरीक़ा तो यही है कि उन लोगों
की माँग पूरी की जाये, ताकि वे शान्त हों।
ऊपर जो बताया गया है यह केवल हमारा अपना ही ख़याल नहीं, बल्कि
इसकी पुष्टि बंगाल आर्डिनेंस सम्बन्धी कई ज़िम्मेदार सज्जनों के भाषणों और उनके
बयानों से होती है। इन्हीं सज्जनों के सवालों का उत्तर सरकार की ओर से सिवाय
चुप के कुछ नहीं मिला। नीचे हम अपने विचारों की पुष्टि के लिए कुछ उद्धरण
दे रहे हैं जिनसे स्पष्ट सिद्ध हो जायेगा कि सरकार कैसे हिन्दुस्तान को गुलाम रखने
के लिए कमीनी चालें चल रही है।
श्रीयुत सुभाषचन्द्र बोस को, जोकि कलकत्ता नगर सभा के चीफ़ एग्ज़्यूक्टिव
ऑफ़िसर थे और जिन्हें तख़्ता पलट करने का अपराधी कहकर बंगाल आर्डिनेंस
के अनुसार जेल में बन्द किया गया था, अब ख़राब सेहत के कारण रिहा किया
गया है। आपने बंगाल आर्डिनेंस के सम्बन्ध में अभी एक बयान प्रकाशित करवाया
है, जिसमें आप लिखते हैं –
“बंगाली राजनीतिक नज़रबन्दों को और देर तक जेलों में बन्द रखने की कोई
सन्तोषजनक वजह न होने के कारण पुलिस ने अब बम और टूटे हुए पिस्तौल
पकड़ने शुरू कर दिये हैं, ताकि सिद्ध किया जा सके कि तख़्तापलट आन्दोलन
अभी तक मौजूद है। वास्तव में पिछले कुछ सालों में जब भी कभी बंगाली
राजबन्दियों की रिहाई की चर्चा चली है और जब भी कभी असेम्बली या बंगाल
कौंसिल में नज़रबन्दों के सवाल पर विचार करने के लिए बैठक हुई है तो पुलिस
के हाथों में खेलने वाले कुछ लोग अपने पास से हथियार लेकर झट गिरफ़्तारी के
लिए पुलिस के आगे पेश हो जाते रहे हैं और फ़ौरन ही कथित बम-कारख़ानों का
पता पुलिस को लग जाता है। इन कारख़ानों में आमतौर पर कुछ मसाला होता है,
जो हर जगह मिल सकता है। फिर टूटे हुए पिस्तौल, जोकि जिस पर निशाना साधा
जाये उससे ज़्यादा ख़तरनाक उसे चलाने वालों के लिए हो सकते हैं, जैसाकि
दक्षिणेश्वर बम केस में पुलिस के गवाहों ने अपने मुँह से माना कि ये दोनों चीजें
चाहे इस्तेमाल में किसी काम की न हों, लेकिन किसी को अपराधी ठहराने के
लिए काफ़ी होती हैं।
तख़्तापलट षड्यन्त्र साबित करने के लिए शस्त्र क़ानून के अन्तर्गत चलाये गये
साधारण मुक़दमों को पुलिस और एंग्लो-इण्डियन अख़बारों की ओर से
पोलिटिकल मुक़दमे सिद्ध किया जाता है। अभी एक ऐसे पोलिटिकल मुक़दमे में
जो वायदा माफ़ गवाह बना, वह एक पुराना पुलिस एजेण्ट है।
238 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़