भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
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शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 250, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंकिसी न-नकार के शान्ति की क़समें उठाते चले गये। बात तो ठीक थी। आतंक
का अर्थ ज़ुल्म और ज़बरदस्ती करना है। ऐसा बुरा काम न करने की क़सम खाने
में किसी को क्या उज़्र हो सकता है, लेकिन असली बात यह है कि ज़ुल्म को
नहीं, बल्कि ताक़त के इस्तेमाल को ही आतंक का नाम देकर लोगों में ग़लतफ़हमी
फैला दी गयी है। बहुत-से लोग जोकि ताक़त के इस्तेमाल के हक़ में थे, वे आतंक
का पक्ष लेने की हिम्मत न दिखा सके और उन्होंने भी चुपचाप शान्तिपूर्ण
(आन्दोलन) के पक्ष में होने की क़सम उठा ली। इसीलिए अहिंसा (Non-
violence) जैसे शब्दों ने बहुत गड़बड़ी मचा दी। हज़ारों ही काम जो आज तक न
सिर्फ़ जायज़, बल्कि अच्छे माने जाते थे, वह पलक झपकने में ही घृणित माने जाने
लगे। वीरता, हिम्मत, शहादत, बलिदान, सैनिक-कर्तव्य, शस्त्र चलाने की योग्यता,
दिलेरी और अत्याचारियों का सर कुचलने वाली बहादुरी आदि गुण बल-प्रयोग पर
निर्भर थे। अब ये गुण अयोग्यता और नीचता समझे जाने लगे! आतंक शब्द के इन
भ्रामक अर्थों ने क़ौम की समझ पर पानी फेर दिया। नौबत यहाँ तक पहुँची कि
हथौड़े से पत्थर का बुत तोड़ना भी आतंक के दायरे में मान लिया गया और लाठी
पकड़ने तक को आतंक माना गया। तो क्या बुत को हाथों से तोड़ा जाये?
किसी भी शब्द के सुनते ही हर इन्सान के दिल में एक विचित्र ढंग की
भावनाएँ पैदा हो जाती हैं और उसके बाद झटपट एक प्रकार के अर्थ समझ
चुकने के कारण इन्सान उसकी तह तक जाने के लिए अधिक दिमाग़ नहीं
लड़ाता। किसी अजनबी इन्सान के आते ही यदि यह कह दिया जाये कि वह
बड़ा पापी है, लुच्चा है, तो सुनने वाले के दिल में उसके ख़िलाफ़ स्वभावतः
ही एक तरह के घृणित ख़याल उत्पन्न हो जाते हैं। उस आदमी के सम्बन्ध में
अधिक जाँच किये बग़ैर ही राय बना ली जाती है। इसी तरह शब्दों के प्रयोग
सम्बन्धी मामले में कहा जा सकता है। वेदों और पुराणों में इस बात पर ज़ोर दिया
गया है कि जो भी शब्द बोले जायें, उनका सही प्रयोग होना चाहिए, क्योंकि
शाब्दिक भ्रम से देवताओं तक में बड़े-बड़े दंगे हो गये थे और बड़ा भारी
नुक़सान हो गया था। ठीक वही दशा पिछले सात साल से हमारी हो रही है।
ताक़त के योग्य और अयोग्य इस्तेमाल को बिना किसी जाँच-विचार के फ़ौरन
आतंक का फतवा देकर घृणित होने की घोषणा कर दी गयी है।
यदि कोई डाकू कुल्हाड़ी लेकर किसी के घर में आ घुसे तो उसे आतंक (की
कार्यवाही) कहा गया, लेकिन यदि घरवालों ने छुरी का इस्तेमाल कर डाकू को
मार डाला तो उसे भी आतंक (का काम) माना गया। अर्थात जब अपने और अपने
परिवार की रक्षा के लिए ताक़त का योग्य और नेक इरादों से इस्तेमाल किया गया
तब भी उसे आतंक ही कहा गया। रावण ज़ोर-ज़बरदस्ती सीता को उठा ले गया
तो वह आतंक। और सीता को छुड़ाने गये राम ने रावण का सिर काट दिया तो वह
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