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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 246, कुल 788 में से

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पृष्ठ 246

हर सम्भव तरीक़े से पूर्ण स्वतन्त्रता
अमृतसर कॉन्फ्रेंस में जिन बातों का बहुत झगड़ा हुआ और बहस हुई, उनमें से एक
सबसे अधिक ज़रूरी और महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि कांग्रेस का उद्देश्य हर सम्भव
तरीक़े से 'अंग्रेज़ी राज से बाहर पूर्ण स्वतन्त्रता' प्राप्त करना हो।
प्रस्ताव पास हो गया और बड़े-बड़े नेताओं ने कांग्रेस से इस्तीफ़े दे दिये और
धमकियाँ देनी शुरू कर दीं और प्रस्ताव पास करने वालों को षड्यन्त्रकारी, नेतागिरी
के भूखे लोग कहा गया। पंजाबभर के अख़बारों ने आसमान सर पर उठा लिया और
हाय-तौबा मचा दी। हमें समझ नहीं आ रहा कि क्या कहर टूट पड़ा।
मद्रास कांग्रेस ने पूर्ण स्वतन्त्रता (Complete Independence) का प्रस्ताव पास
कर दिया था। यहाँ उसने स्पष्ट कर दिया कि आज़ादी, पूर्ण आज़ादी अंग्रेज़ी राज
से बाहर ही हो सकती है। हाँ, यह बात साफ़ है कि मद्रास के प्रस्ताव को (अब)
ज़्यादा ज़ोरदार और निश्चित बना दिया गया है। उस प्रस्ताव पर तो किसी को कोई
ख़ास शिकायत हुई नज़र नहीं आयी थी। झगड़ा सिर्फ़ 'हर सम्भव तरीक़े से' (By
all possible means) (आज़ादी) प्राप्त करने का है। अब तो कांग्रेस कोड में लिखा
हुआ था कि – By all peaceful and legitimate means – सभी शान्तिपूर्ण और
न्यायिक तरीक़ों से स्वराज लिया जाये।
पूरा देश तैयार था। नौजवानों ने गाँव-गाँव में सिविल नाफ़रमानी की तैयारी कर
दी थी। चौरा-चौरी में एक-दो भाड़े के टट्टुओं ने अत्याचार कर दिया या यों कहो
कि कुछ लोगों से करवा दिया। बस पूर्ण शान्ति वाली बात ख़त्म। फिर क्या था,
पूरे देश का बेड़ा गर्क कर दिया। क्या ख़ूब फ़िलासफ़ी है कि शान्तिपूर्ण शब्द का
बहाना लेकर हरामख़ोर ज़मींदारों और ताल्लुकेदारों का पक्ष लिया गया। और
बारदौली रैदलीफ़न में साफ़ कह दिया गया कि हे किसानो, तुम अपने मालिकों
को लगान दे दो।
बस शान्तिपूर्ण के बहाने देश का बेड़ा गर्क कर दिया गया। यातनाओं के झूठे
आरोपों में फँसाये गये लोगों का पक्ष लेने की हिम्मत तक हमें न हुई और कई ग़रीब
वहाँ फाँसी पर चढ़ गये। यह तो अत्याचार हुआ न? इस पूर्वाग्रह को मिटाना बहुत
ज़रूरी था। इस प्रस्ताव के पास होने से लोगों के देखने का दायरा कुछ बढ़ गया है।
दूसरी बात यह है कि क्या हमने क़सम खा रखी है कि यदि शान्तिपूर्ण तरीक़े
240 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़