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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 245, कुल 788 में से

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पृष्ठ 245

पिछले कुछ सालों में निःसन्देह पुलिस की ओर से मनगढ़न्त तख्तापलट
आन्दोलन बनाने के लिए दलाल (Agent Provocateuors) रखे जाते हैं ताकि
खुफ़िया पुलिस के ख़ास हिस्से (Intelligence Branch) को क़ायम रखने की
ज़रूरत सिद्ध की जा सके, जिन्हें कुछ साल पहले बंगाल की सरकारी ख़र्च कम
करने वाली समिति (Bengal Retrenchment Committee) ने हटाने की सिफ़ारिश
की थी। मैं यह बयान अपनी ज़िम्मेदारी को पूरी तरह अनुभव कर लिख रहा हूँ
और जो आरोप मैं पुलिस पर लगा रहा हूँ, इनकी जाँच के लिए यदि कोई निष्पक्ष
समिति बनायी जाये और नज़रबन्दों और पब्लिक को यदि इसके सामने गवाहियाँ
देने में कोई बाधा न दी जाये और पूरी छूट हो तो इसके प्रमाण देने को भी मैं
प्रस्तुत हूँ...।
स्वर्गवासी श्रीयुत देशबन्धुदास जी ने भी बंगाल कौंसिल में भाषण देते हुए 23
जनवरी, 1924 को साफ़-साफ़ बताया कि कैसे ऊल-जलूल (सबूत) इकट्ठा कर
बंगाली देशभक्तों को जेल में डाल दिया गया है और किस प्रकार के निराधार आरोप
लगाये गये हैं। आपने यह भी ज़ाहिर किया कि इस तरह के आन्दोलन दमनकारी
तरीक़ों से दबाये नहीं जा सकते। नीचे आपके द्वारा कौंसिल में दिया गया भाषण
पूरे का पूरा दर्ज है –
“हमें यह शिकायत नहीं है कि सरकार ने इन व्यक्तियों को बग़ैर कोई सूचना
एकत्र किये ही गिरफ़्तार कर लिया है, लेकिन हमारी शिकायत यह है कि इन
सूचनाओं की अच्छी तरह जाँच नहीं की गयी और हमारी इस शिकायत के उत्तर
में एक शब्द भी नहीं कहा। हमें यह बताया गया है कि इस सम्बन्ध में कई
आदमियों ने बयान दिये हैं और यह भी बताया गया है कि जो रिपोर्टें मिली हैं,
सरकार ने उन पर विचार किया है। लेकिन जो कुछ मैं पूछना चाहता हूँ वह यह
है कि कोई सरकारी अधिकारी चाहे कितना भी योग्य क्यों न हो, किसी बयान के
ठीक होने का अनुमान कैसे कर सकता है, जब तक कि बयान देने वाले को सामने
बुलाकर उससे सवाल न किये जायें?
(जब भगतसिंह और उनके साथ भारतीय और अन्तरराष्ट्रीय क्रान्तिकारी
आन्दोलन की समीक्षा करते हुए लोगों से उसे सांझा कर रहे थे तो भारत की
स्वतन्त्रता-प्राप्ति के ढंग और स्वतन्त्रता-आन्दोलन के दरपेश पैदा रुकावटों के बारे
में चर्चा भी पूरे ज़ोर से चल रही थी। मई, 1928 से सितम्बर, 1928 तक जब
भगतसिंह पूरी तरह ‘किरती’ अख़बार चलाने में व्यस्त थे, उस समय के ये लेख
यहाँ दिये जा रहे हैं। चाहे इनके लेखकों के नामों का पता नहीं, लेकिन ये लेख
शहीद भगतसिंह और उनके साथियों के तत्कालीन विचारों का प्रतिनिधित्व करते
हैं। इसीलिए इन्हें यहाँ दिया जा रहा है। शहीद भगवतीचरण वोहरा ‘किरती’ अख़बार
से गहरे रूप से जुड़े हुए थे। – स.)
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 239