सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 251, कुल 788 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 251

भी आतंक! इटली, अमेरिका, आयरलैण्ड आदि देशों पर कई प्रकार के जुल्म करने
वाले अत्याचारी भी आतंक फैलाने वाले समझे गये और नंगी तलवार पकड़े इन
विदेशी डकैतों का छिपी हुई शमशीर से इलाज करने वालों को भी आतंक (फैलाने
वाले) की उपाधि दी जाती है। गैरीबाल्डी, वाशिंगटन, एमट और डी वलेरा आदि
सभी इसी सूची में डाल दिये गये। क्या इसे इन्साफ़ कहा जा सकता है? आभूषण
चुराने के लिए मासूम बच्चे की गरदन काट देने वाला चोर भी घृणित और उस
पत्थर-दिल चोर को फाँसी पर लटका देने वाला न्यायकारी सम्राट भी आतंकवादी
और घृणित! कृष्ण भी उतना ही पापी, जितना कंस! शूरवीर भीम भी उतना ही
गुनहगार, जितना कि उसकी धर्मात्मा पत्नी का अपमान करने वाला दुःशासन! आह!
कितनी ग़लतफ़हमी है। कितना बड़ा अन्याय है। इसीलिए कुछ सीधे-सादे लोगों ने
अच्छे कामों को भी केवल बल-प्रयोग के कारण अयोग्य और आतंकवादी कह
दिया। साँप डसता है, आदमी उसे मार डालता है। पर दोनों बराबर-बराबर नहीं।
डसना तो साँप की आदत थी और वह इस आदत से मजबूर था, लेकिन इन्सान
ने यह काम जानबूझकर किया, इसलिए उसे अधिक नीच समझा जाना चाहिए!
नौबत यहाँ तक पहुँची कि देश और क़ौम के लिए सशस्त्र हो मैदाने-जंग में शहीद
हो जाने वाले बहादुर भी पापी समझे जाने लगे। शिवाजी, राणा प्रताप और रणजीत
सिंह जी को आतंक फैलाने वाले कहा गया और वे पूजनीय व्यक्तित्व भी घृणा
का शिकार हो गये।
उधर दुनिया के सारे देश शस्त्रधारी हैं। प्रत्येक अपने हथियारों की ताक़त को
बढ़ाता चला जा रहा है। इधर हमारा यह भारतवर्ष है, जिसमें रहने वालों का शस्त्र
पकड़ना पाप समझा जाता है। 'लाठी मत पकड़ो' – यह शिक्षा देने वाले लाठी
देखते ही डरपोक और कायर लोगों की पीठ ठोंकने लगे। देश को गिरी हुई अवस्था
से उठाकर उन्नति के रास्ते पर खड़ा करने वाली शूर-वीरता मटियामेट होने लगी
और ताक़त से डरने वाले दुश्मन राजी-ख़ुशी दिखायी देने लगे। कुछ बिरले ही लोग
थे जो यह दुखद स्थिति न देख सके और उन्होंने इसका खण्डन करना शुरू कर
दिया। लेकिन हैरानी की बात तो यह है कि वे स्वयं भी इस गड़बड़ी का शिकार
हो गये और ठोस तर्कों से विरोध प्रकट करना उनके लिए कठिन हो गया। बस
इसी से युग पलटने वाले लोगों ने चिढ़कर यह कहना शुरू कर दिया – हाँ, हाँ,
हम आतंक फैलायेंगे, हम Violence ही करेंगे! जैसे कोई शरीफ़ आदमी अपने अच्छे
काम को गुनाह ठहराये जाते देखकर और फिर तर्कसम्मत उत्तर न दे पाने के कारण
हड़बड़ाकर यही कहना शुरू कर दे – हाँ, हाँ, मैं गुनाह ही करूँगा। ठीक यही
स्थिति इन बेचारे युग पलटने वालों की हो रही है। मद्रास कांग्रेस के अध्यक्ष तक
ने यह कह दिया कि आज यदि हम शान्तिपूर्ण (तरीक़े) के पक्षधर हैं तो इसका
यह अर्थ नहीं है कि हम हमेशा ऐसे ही रहेंगे। हो सकता है कि हमें कल ही आतंक
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 245