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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 235, कुल 788 में से

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पृष्ठ 235

ट्रेड यूनियन बिल

1927 में पूँजीवादी विश्व आर्थिक मन्दी की चपेट में आ रहा था, और मज़दूर
वर्ग के जनवादी अधिकारों पर हमले शुरू हो गये थे। इंग्लैण्ड में जब ट्रेड यूनियन
बिल पास हो रहा था तो ‘किरती’ ने (मई, 1927 में) एक लेख इस सम्बन्ध में
प्रकाशित किया। लेख के लेखक के सम्बन्ध में जानकारी हासिल नहीं है, लेकिन
यह उस समय क्रान्तिकारियों की सोच के बारे में बताता है। 1929 में जब ट्रेड
डिस्प्यूट्स बिल भारत में लागू करने की कोशिश की गयी थी तो भगतसिंह और
बी.के. दत्त ने असेम्बली हॉल, दिल्ली में बम फेंका था। – स.
इंग्लिस्तान के एक जगह टिके (Conservative) गुट के लोग कब से इस बात की
ताक में थे कि कैसे मज़दूरों में बढ़ती हुई ताक़त को रोका जाये। उनको यह बात
स्पष्ट नज़र आती थी कि यदि मज़दूरों की बढ़त को अभी न रोका गया तो मज़दूर
देखते ही देखते राज के मालिक बन जायेंगे और इस तरह उन्हें राज की बागडोर
छोड़नी पड़ेगी। उन्हें यह स्पष्ट पता था कि नाम मात्र स्वतन्त्र (Liberal) गुट तो
किसी काम का नहीं है और न ही अभी जल्दी उनके ताक़त में आने की उम्मीद
है। इसलिए यदि उन्हें ख़तरा था तो मज़दूरों से ही था और मज़दूरों की मुश्कें बाँधना
ही उन्होंने सबसे पहले ठीक समझा।
इस काम के लिए उन्होंने ट्रेड यूनियन बिल का आविष्कार किया, जिसके
सम्बन्ध में पिछले अंक में बताया गया था। वे मज़दूरों के सब करे-धरे को यह
बिल पास कर कुएँ में डालना चाहते हैं।
मज़दूरों ने इस बिल के ख़िलाफ़ बड़ी ज़ोरदार आवाज़ बुलन्द की है। उन्होंने
कहा है कि यह बिल एक वर्ग के द्वारा दूसरे वर्ग को मटियामेट करने के लिए
लाया गया वर्ग-बिल है। मि. रामजे मैकडानल्ड जैसे मज़दूर भी इस बिल को
वर्ग-युद्ध की घोषणा समझते हैं और श्रमिक-संसार में सब जगह इस बिल से तूफ़ान
मच गया है। मज़दूर फिर एक दिन के लिए बड़ी आम हड़ताल करने की सोच
रहे हैं। वे विरोध में मीटिंग कर रहे हैं। ख़याल किया जाता है कि संसद में इस
बिल पर घमासान बहस होगी, और मज़दूर-नेता यदि ख़रीद न लिये गये तो
जी-तोड़कर लड़ेंगे।
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि / 229