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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

अराजकतावाद : तीन
पिछले दो लेखों में हमने अराजकतावाद के सम्बन्ध में सर्वसाधारण तथ्य लिखे थे।
ऐसे महत्त्वपूर्ण विषय पर जोकि दुनिया के पुराने विचारों एवं परम्पराओं के विरुद्ध
नया-नया ही सामने आये, इतने छोटे लेख से पाठकों की जिज्ञासा को शान्त नहीं
किया जा सकता। इस प्रकार अनेक शंकाएँ जन्म लेती हैं। फिर भी हम उनके
मोटे-मोटे सिद्धान्त पाठकों के सामने रख रहे हैं जिनसे कि वे इनकी मोटी-मोटी
बातें समझ चुके होंगे। अब हम इसी तरह साम्यवाद, समाजवाद और नाशवाद जैसे
सिद्धान्तों पर लिखेंगे, ताकि हिन्दुस्तान भी समझ सके कि विदेशों में कौन-कौन-सी
विचारधाराएँ चलन में हैं। मगर किसी अन्य विषय पर लिखने से पूर्व अराजकतावाद
के सम्बन्ध में बहुत-सी महत्त्वपूर्ण एवं रोचक बातें लिखने का विचार है जिसमें
नाशवाद का इतिहास भी है, अर्थात अराजकतावादियों ने अब तक क्या किया? वे
किस प्रकार बदनाम किये गये?
ऊपर हमने उनके विचार बताये हैं। अब हम यह बताना चाहते हैं कि उन्होंने
इन विचारों को अमलीजामा पहनाने के लिए क्या किया और किस प्रकार वह
बल-प्रयोग से बहुत मज़बूत सरकारों से भिड़ जाते थे और उन मुठभेड़ों में जान की
बाज़ी तक लगा देते थे।
दरअसल जब दमन और शोषण सीमा से अधिक हो जाये, जब शान्तिमय और
खुले काम को कुचल दिया जाये, तब कुछ करने वाले हमेशा गुप्त रूप से काम करना
शुरू कर देते हैं और दमन देखते ही प्रतिशोध के लिए तैयार हो जाते हैं। यूरोप में जब
ग़रीब मज़दूरों का भारी दमन हो रहा था, उनके हर तरह के कार्य को कुचल डाला
गया था या कुचला जा रहा था, उस समय रूस के सम्पन्न परिवार से माईकल
बैकुनिन को जो रूस के तोपख़ाने में एक बड़े अधिकारी थे, पोलैण्ड के विद्रोह से
निबटने के लिए भेजा गया था। वहाँ विद्रोहियों को जिस प्रकार जुल्म करके दबाया
जा रहा था, उसे देखकर उनका मन एकदम बदल गया और वे युगान्तकारी बन बैठे।
अन्त में उनके विचार अराजकतावाद की ओर झुक गये। उन्होंने सन् 1834 में नौकरी
त्याग दी। उसके पश्चात बर्लिन और स्विट्ज़रलैण्ड के रास्ते पेरिस पहुँचे। उस समय
आमतौर पर सरकारें इनके विचारों के कारण इनके विरुद्ध थीं। 1864 तक वह अपने
विचार पुख़्ता करते रहे और मज़दूरों में प्रचार करते रहे।
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बाद में उन्होंने राष्ट्रीय मज़दूर कांग्रेस पर क़ब्ज़ा कर लिया और 1860 से
1870 तक आप अपने दल को संगठित करते रहे। 4 सितम्बर, 1870 में पेरिस में
तीसरा पंचायती राज क़ायम करने की घोषणा की गयी। फ्रांस में कई स्थानों पर
पूँजीपति सरकार के विरुद्ध लड़ाइयाँ व विद्रोह हुए। लियोन शहर में विद्रोह भड़का।
उसमें बैकुनिन शामिल हुए। इनका पलड़ा ही भारी रहा। कुछ ही दिनों बाद वहाँ
उनकी हार हो गयी और वे वहाँ से लौट आये।
1873 में हसपानिया में बग़ावत खड़ी हो गयी। उसमें शामिल होकर ये लड़े।
कुछ दिन तक तो मामला खूब गरम रहा लेकिन अन्त में वहाँ भी हार हो गयी।
वहाँ से लौटे तो इटली में बग़ावत जारी थी। वहाँ जाकर इन्होंने युद्ध की बागडोर
हाथ में ले ली। गैरीबाल्डी भी कुछ विरोध के बाद उनके साथ मिल गये थे। कुछ
दिनों के दंगों के बाद वहाँ भी हार हो गयी। इस तरह उनका सारा जीवन
लड़ने-भिड़ने में गुज़र गया। अन्त में जब वह बूढ़े हो गये तो उन्होंने अपने साथियों
को ख़त लिखे कि अब मैं अपने हाथों से नेतृत्व की बागडोर छोड़ता हूँ ताकि काम
में रुकावट न पड़े। अन्त में जुलाई, 1876 में बीमारी की हालत में उनका निधन
हो गया।
बाद में बहुत ताक़तवर चार व्यक्ति इस कार्य के लिए कमर कसकर तैयार
हुए। वे थे कारलो केफियर्स, इटली के रहने वाले, काफ़ी सम्पन्न परिवार से थे।
दूसरे, माला टेम्टा। आप बड़े विद्वान डॉक्टर थे। लेकिन आप सभी कुछ छोड़कर
युगान्तकारी बन गये। तीसरे, पाल ब्रसी भी बड़े मशहूर डॉक्टर थे। आप भी इसी
कार्य में लग गये। चौथे थे पीटर क्रोपोटकिन। आप रूसी परिवार से थे। कई बार
मज़ाक़ में कहा जाता था कि असल में आपको ही ज़ार बनना था। आप सभी
बैकुनिन के अनुयायी थे। आपने कहा कि हम ज़बान से बहुत प्रचार कर चुके
लेकिन कोई असर नहीं होता। नयी-नयी विचारधाराएँ सुनाकर थक गये हैं। जनता
पर कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ता। इसलिए अब व्यावहारिक प्रचार आरम्भ किया जाये।
क्रोपोटकिन ने कहा –
"A single deed makes more propaganda in a few days than a thou-
sand pamphlets. The Government defends itself. It rages pitilessly, but
by this it only caused further deeds to be committed by one or more
persons and drives the insurgents to heroism. One deed bringsforth an-
other, opponents join the mutiny, the Govt. splits into factions, harsh-
ness intesifies the conflict, concessions come too late, the revolution
breaks out."
अर्थात एक ही व्यावहारिक काम हज़ारों किताबों और पत्रिकाओं से अधिक
प्रचार कर देता है। सरकार स्वयं अपनी रक्षा करती है। उसे गुस्सा आता है। जलन
होती है और वह दमन करती है। कई लोग थककर प्रतिशोध के लिए तैयार हो जाते
अन्तरराष्ट्रीय क्रान्तिकारी आन्दोलन का अध्ययन / 209

हैं। फिर कभी ठीक उसी तरह के काम होते हैं तो उन्हें शहीद कर दिया जाता है।
विरोधी भी आकर शामिल हो जाते हैं। सरकार तड़पती है। आपस में उनकी
नोक-झोंक होने लगती है। जनता की शर्तें स्वीकारने में बेवजह देर की जाती है
और इन्क़लाब की जंग शुरू हो जाती है। यह विचारों का दृश्य आपके सामने रखा
गया है। पीटर क्रोपोटकिन रूसी युगान्तकारियों में से थे। पकड़े जाने के बाद पीटर
पाल नामक क़िले में बन्दी बनाये गये थे। उस सख़्त जेल में से ये भाग गये और
यूरोप में जाकर अपने विचारों का प्रचार करने लगे। उपरोक्त बातों से पता चलता
है कि उस समय उनकी मनःस्थिति क्या थी।
सबसे पहले उन्होंने बर्न नामक शहर में (फ़्रांस में) मज़दूरों के शासन की
स्थापना वाले दिन की बरसी मनायी। यह बात 18 मार्च, 1876 की है। उस दिन
उन्होंने मज़दूरों का जुलूस निकाला और बाज़ार में पुलिस से हाथापाई भी कर बैठे।
जब सिपाहियों ने उनके लाल झण्डे को उखाड़ने का प्रयास किया, तब बहुत तगड़ा
फ़साद खड़ा हो गया। अनेक सिपाही बुरी तरह घायल हुए। अन्त में ये सभी पकड़े
गये और 10 से 40 दिनों तक क़ैद की सज़ा हुई।
उधर अप्रैल माह में इटली में किसानों को उकसाकर अनेक स्थानों पर बग़ावतें
खड़ी कर दीं। वहाँ भी इनके साथी पकड़े गये, जिनमें से काफ़ी बरी हो गये। उनका
विचार अब इसी तरह से प्रचार का था। इसलिए वे कहा करते थे – Neither
money nor organizations nor literature was needed any longer for (for their
propaganda work). One human being in revolt with torch or dynamite was
off to instruct the world. अर्थात प्रचार-कार्य के लिए न तो धन की आवश्यकता
है, न बड़े पोथों की और न बड़े भारी संगठन की। कोई भी एक आदमी – जिसने
हाथ में मशाल पकड़ी हुई हो, जिससे वह आग लगा सके या डाइनामाइट हो जिससे
वह एक बार मकानों और ऐसे इन्सानों को उड़ा सके – सारी दुनिया को अपनी
इच्छानुसार शिक्षा दे सकता है।
अगले बरस, 1878 से बस ऐसे कामों ने ज़ोर पकड़ लिया। बर्लिन में इटली
का बादशाह हम्बर्ट जब अपनी बेटी के साथ मोटरकार में जा रहा था, तब उसे
मारने का प्रयास किया गया। शहंशाह विलियम को एक साधारण नवयुवक ने गोली
मार दी। तीन हफ़्ते बाद डॉक्टर कार्ल नौर्वालिंग ने एक बार खिड़की में से शहंशाह
पर गोली चला दी। जर्मनी में उस समय ग़रीब मज़दूरों के भाषणों को निर्मम ढंग
से कुचला जा रहा था। उसके बाद एक दिन गोष्ठी करके फ़ैसला लिया गया था
कि जिस प्रकार भी सम्भव हो, इस भ्रष्ट पूँजीवादी वर्ग और उसकी मददगार
सरकार एवं पुलिस आदि को भयभीत किया जाये।
15 दिसम्बर, 1883 को विलीरिड फ्लोडसोर्फ में उलुबैक नाम के कुख्यात
पुलिस अफ़सर को मार डाला गया। 23 जून, 1884 को रुजेट को इसी अपराध
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में फाँसी दे दी गयी। अगले ही दिन इसके बदले में ब्लेटिक, पुलिस अधिकारी
की हत्या कर दी गयी। आस्ट्रिया की सरकार गुस्से में आ गयी और वियना में
पुलिस ने ज़बरदस्त घेराबन्दी करके अनेक व्यक्ति गिरफ़्तार कर लिये और दो को
फाँसी पर टाँग दिया।
उधर लियुन में हड़तालें हुईं। एक हड़ताली फुरनियर ने अपने पूँजीपति मालिक
को गोली मार दी। उसके अभिनन्दन समारोह में एक पिस्तौल उपहार-स्वरूप दी
गयी। 1888 में वहाँ बहुत गड़बड़ी मची हुई थी और रेशम के मज़दूर भूखों मर रहे
थे। पूँजीपतियों के समाचारपत्र मालिक और उनके दूसरे धनी मित्र एक जगह ऐश
उड़ाने में मसरूफ़ थे। वहीं एक बम फेंक दिया गया। अमीर लोग काँप उठे। 60
अराजकतावादी पकड़े गये। उनमें से केवल तीन ही बरी किये गये। लेकिन फिर
भी असली बम फेंकने वाले की बहुत तलाश की जाती रही। अन्त में वह पकड़ा
गया और फाँसी पर लटका दिया गया। बस इस तरह ही उनके विचारों की लाइन
पर काम चल पड़ा। फिर तो जहाँ भी हड़ताल होती, वहीं क़त्ल भी हो जाता। इन
बातों का ज़िम्मेदार भी अराजकतावादियों को ही ठहराया जाता, इसलिए इस नाम
से ही लोग थर-थर काँपने लगे।
उधर एक जर्मन अराजकतावादी जहानमोस्ट, जो पहले दफ़्तरी का काम करता
था, 1882 में अमेरिका जा पहुँचा। उसने भी यह विचार जनता के समक्ष रखने आरम्भ
किये। वह भाषण बड़ा सुन्दर देता था और उसका अमेरिका में बहुत प्रभाव पड़ा।
1886 में शिकागो आदि में बहुत-सी हड़तालें हो रही थीं। एक काग़ज़-कारखाने के
मज़दूरों में एक अराजकतावादी स्पाईज उपदेश दे रहा था। कारख़ाना-मालिकों ने इसे
बन्द करने की कोशिश की। वहाँ लड़ाई हो गयी। पुलिस बुलायी गयी, जिसने आते
ही गोली चला दी। छह आदमी मारे गये और कई ज़ख़्मी हो गये। स्पाईज को गुस्सा
आया। उसने स्वयं जाकर एक नोटिस कम्पोज करके मुद्रित कर दिया कि मज़दूरों को
मिलकर अपने निरपराध भाइयों के ख़ून का बदला लेना चाहिए। अगले दिन 4 मई,
1886 को 'हे मार्केट' में जलसा था। शहर का अध्यक्ष इसे देखने आया था। उसने
देखा कि वहाँ कोई आपत्तिजनक बातें नहीं हो रही हैं। वह चला गया। बाद में पुलिस
ने आकर बिना आगा-पीछा देखे मारपीट करनी शुरू कर दी और कहा कि जलसा
बन्द करो। तभी एक बम पुलिसवालों पर फेंका गया जिसके साथ ही बहुत से
पुलिसवाले मारे गये। कई व्यक्तियों को पकड़कर फाँसी की सज़ा दे दी गयी।
जाते-जाते उनमें से एक शख़्स कहने लगा – “मैं फिर कहता हूँ, मैं वर्तमान व्यवस्था
का कट्टर दुश्मन हूँ। मैं चाहता हूँ कि हम इस राजसत्ता को मिटा दें और खुद राजसत्ता
का इस्तेमाल करें। आप शायद हँसें कि मैं तो अब बम नहीं फेंक सकूँगा लेकिन मैं
बताता हूँ कि तुम्हारे जुल्मों ने सभी मज़दूरों को बम सँभालने और चलाने पर मजबूर
कर दिया है। यह जान लो कि मैं सच कह रहा हूँ कि मेरे फाँसी लगने पर और भी
अन्तरराष्ट्रीय क्रान्तिकारी आन्दोलन का अध्ययन / 211

कई आदमी पैदा हो जायेंगे। मैं तुम्हें घृणित दृष्टि से देखता हूँ और तुम्हारी राजसत्ता को
मटियामेट कर देना चाहता हूँ। मुझे फाँसी चढ़ा दो।” खैर, इस तरह बहुत-सी घटनाएँ
होती रहीं। लेकिन एक-दो प्रसिद्ध घटनाएँ और हुईं। अमेरिका के अध्यक्ष मैकनिल पर
गोली चलायी गयी और फिर स्टील कम्पनी में हड़ताल हुई। यहाँ मज़दूरों पर जुल्म
ढाये जा रहे थे। उसके मालिक हैनरी-सी फ्रिक को अलेक्ज़ेण्डर नामक
अराजकतावादी ने गोली मारकर ज़ख़्मी कर दिया, जिसे आजीवन कैद हो गयी। खैर,
इसी तरह अमेरिका में भी अराजकतावादियों के इस विचार का प्रचार और उस पर
अमल होने लगा।
इधर यूरोप में भी अन्धेर चल रहा था। पुलिस और सरकार के साथ इन
अराजकतावादियों का झगड़ा बढ़ गया। अन्त में एक दिन वैलेण्ट नाम के एक
नवयुवक ने असेम्बली में बम फेंक दिया, लेकिन एक औरत ने उसका हाथ
पकड़कर उसे बाधा दी, परिणामस्वरूप कुछ डिप्टियों के घायल होने के अलावा
कुछ और विशेष न हुआ। उसने बड़ी बुलन्द आवाज़ में स्पष्टीकरण देते हुए कहा
– "It takes a loud voice to make the deaf hear." यानी बहरों को सुनाने के लिए
बड़ी बुलन्द आवाज़ की ज़रूरत है। अब तुम मुझे सज़ा दोगे, पर मुझे इसका कोई
भय नहीं क्योंकि मैंने तुम्हारे दिल को चोट पहुँचायी है। तुम जोकि ग़रीबों के साथ
अत्याचार करते हो और मेहनत करने वाले भूखे मरते हैं और तुम उनका ख़ून
चूस-चूसकर ऐश कर रहे हो। मैंने तुम्हें चोट मारी है। अब तुम्हारी बारी है।
उसके लिए बहुत-सी अपीलें की गयीं। सबसे ज़्यादा ज़ख़्मी हुए असेम्बली के
सदस्य ने भी जूरी से कहा कि इस पर दया की जाये, लेकिन कार्नेट नामक अध्यक्ष
की जूरी ने उनकी बातों को अस्वीकारते हुए उसे फाँसी की सज़ा दे दी। बाद में
एक इटैलियन लड़के ने एक छुरी कार्नेट के पार कर दी, जिस पर वैलेण्ट का नाम
लिखा हुआ था।
इसी तरह हद दर्जे के अत्याचारों से तंग आकर स्पेन में भी बम चले और
अन्ततः एक इटैलियन ने वजीर को मार डाला। इसी तरह यूनान के बादशाह,
आस्ट्रिया की मलिका पर भी हमले किये गये। 1900 में गैटाने ब्रैसी ने इटली के
बादशाह हर्बर्ट को मार डाला। इसी प्रकार वे लोग ग़रीबों की ख़ातिर अपनी
ज़िन्दगियों से खेलते रहे और हँसते-हँसते फाँसी पर चढ़ते रहे...इसलिए उनके
विरोधी भी उनके विरुद्ध कुछ नहीं कर सकते। उनके अन्तिम शहीदों साको और
वैल्जेटी को अभी पिछले साल फाँसी हुई। वे जिस दिलेरी से फाँसी पर लटके,
सब जानते हैं। बस यही संक्षिप्त इतिहास है – अराजकतावाद और उसके कार्यों
का। अगली बार साम्यवाद के बारे में लेख लिखेंगे।
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रूस के युगान्तकारी नाशवादी
(निहिलिस्ट)
रूस में एक बहुत बड़े नाशवादी हुए हैं इवान तुर्गनेव। उन्होंने 1862 में एक उपन्यास
लिखा ‘पिता और पुत्र’। इस उपन्यास के प्रकाशन पर बहुत शोर-शराबा हुआ,
क्योंकि उसमें नवयुवकों के आधुनिक विचारों का चित्रण किया गया था।
पहले-पहल तुर्गनेव ने ही नाशवाद शब्द इस्तेमाल किया था। नाशवाद का अर्थ है
कुछ भी न मानने वाला (निहिल – कुछ भी नहीं); शाब्दिक अर्थ है – जो कुछ
भी न माने। लेकिन वास्तव में ये लोग जनता के पुराने रस्मो-रिवाज़ और कुरीतियों
के विरोधी थे। ये लोग देश की मानसिक गुलामी से थक गये थे, इसलिए उन्होंने
इसके विरुद्ध विद्रोह किया। इन्होंने सिर्फ कहा ही नहीं बल्कि व्यवहार में कर भी
दिखाया। तुर्गनेव कहते हैं कि मेरे उपन्यास का नायक कोई काल्पनिक जीव नहीं
है, वरन वह वास्तव में ही ऐसे विचारों का था और ऐसे विचारों का प्रचार
साधारणतया होने लगा था। वे कहते हैं कि एक दिन धूप सेंकते हुए मुझे इस
उपन्यास का विचार सूझा। और उसको थोड़ा-सा विस्तार देकर किताब लिख दी।
उसका नायक बजारोव है। वह नास्तिक-सा है। पुरानी बातों का बहुत विरोधी है।
उसे मुँह-जुबानी बहुत लम्बी-चौड़ी जी-हज़ूरी नहीं आती। बहुत मुँहफट है। और
जो कहता है वह करता है। वह हर बात मुँह पर तुरन्त और स्पष्ट कह देता है।
इसलिए कई बार वह बड़ा अक्खड़-सा लगता है। वह कविता का विरोधी है।
संगीत तक को पसन्द नहीं करता। लेकिन वह स्वतन्त्रता-प्रेमी है। आम लोगों की
स्वतन्त्रता का बड़ा समर्थक है। वह जो उन दिनों में इन्सानी फ़ितरत बनी हुई थी,
उसके विरुद्ध लड़ने का यत्न करता है।
असली नाशवादी इस तस्वीर से थोड़ा भिन्न है, अर्थात उनमें थोड़ा-सा अन्तर
है, क्योंकि उपन्यास का नायक थोड़ी-सी वास्तविकता के साथ काल्पनिकता से
बनाया गया है। वास्तविक नाशवादी का चित्र कुछ और तरह का बनता है।
"The Nihilism of 1861—a philosophical system especially dealing
with what Mr. Herbert Spencer would call religious, governmental and
social fetishism.
अन्तरराष्ट्रीय क्रान्तिकारी आन्दोलन का अध्ययन / 213

रूसी युगान्तकारी प्रिन्स क्रोपोटकिन ने 1861 में ऊपर लिखे शब्दों में
नाशवादिता का ज़िक्र किया है, जिसका अर्थ है कि नाशवाद उस समय केवल एक
दर्शन था जोकि धार्मिक अन्धविश्वास, सामाजिक अन्याय, संकीर्णता और सरकार
की अन्धेरगर्दी के सन्दर्भ में था और इन चीज़ों के लिए जो अन्धविश्वास पैदा हो
गया था उसके विरुद्ध प्रचार करता था। असल में उस समय की स्थितियों से तंग
आकर वे नवयुवक मैदान में कूद पड़े थे। उनका कहना था कि हमें पिछली सभी
बातों का पूरी तरह नाश कर देना है। आगे क्या होना चाहिए या क्या होगा, इसका
ठीक-ठीक उत्तर न देते हुए भी वे विश्वास करते थे कि एक बड़ी सुन्दर दुनिया
का निर्माण करेंगे। 'Nihilism was destructive because it wanted a wholesale
destruction but with a pleasure of building up.' अर्थात् नाशवाद विनाशकारी या
ध्वंसात्मक विचार थे, क्योंकि वे पिछली या पुरानी बातों के विरोधी और उनका
नाश चाहने वाले थे। परन्तु फिर भी उस विनाश के बाद बड़ी सुन्दर चीज़ों के
निर्माण होने की आशा थी।
धीरे-धीरे इन बातों का प्रचार बढ़ता गया और आम नवयुवकों में भी यह
विचार घर करने लगे। वे चाहते थे – 'To liberate the people from the chains
of tradition and autocracy of the Czar.' अर्थात् जनता को पुरानी चली आ रही
रस्मों और ज़ारशाही से मुक्त कराया जाये।
उन दिनों उनका कार्यक्रम इन बातों का प्रचार ही था। स्थितियाँ परिवर्तित हो
गयीं। उन्हीं दिनों अभी गुलाम आज़ाद किये ही गये थे लेकिन उनमें से अधिकांश
को ज़मीनें नहीं दी गयी थीं जिस पर कि वे मेहनत करके कुछ लाभ उठा सकते
या कम से कम भुखमरी से बच सकते।
जो थोड़ी-बहुत ज़मीन उन्हें मिली थी उसी पर टैक्स इतना अधिक लग गया
कि लोग भूखों मरने लगे और 1867 में बहुत भयानक अकाल पड़ा। उस समय
सरकार का इन्तज़ाम अत्यधिक बुरा था। इतना दमन होता था कि जनता तंग आ
गयी थी। सरकारी ज़ुल्म से तंग आकर बड़े-बड़े सरकारी अधिकारी युगान्तकारी बन
गये। ऐसिंस्की और किआटकोवस्की, जिन्हें 1880 में फाँसी दी गयी थी, पहले
सरकारी कर्मचारी थे। इस तरह दूसरे अनेक जाने-माने अधिकारी, यहाँ तक कि
न्यायाधीश भी तंग आकर युगान्तकारी बन गये।
इधर इन पर भी ज़ुल्म की हद हो गयी। लड़कों में अच्छी-अच्छी बातों का
प्रचार नहीं होने दिया जाता था। कुछ ऐसी सभाएँ बनी हुई थीं जोकि सभी
अच्छी-अच्छी किताबें प्रकाशकों से लेकर मुफ़्त बाँट देते या केवल लागत मूल्य
पर बेच देते। ये सभी किताबें सरकारी सदस्य से स्वीकृत होती थीं। लेकिन जब
सरकार ने देखा कि यह तो प्रचार के लिए इस्तेमाल होती हैं तो उन्होंने उन किताबों
के प्रकाशक और वितरक को तबाह करने का निश्चय किया और उन पर हर तरह
214 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

के जुल्म करने शुरू कर दिये। 1861 से 1870 तक हरसम्भव और जायज़ ढंग से
जनता की स्थिति सुधारने और सरकार को सही रास्ते पर लाने की कोशिश की
गयी, लेकिन कुछ भी प्रभाव न पड़ा।
ऐसी स्थिति में काफ़ी व्यक्ति तो हाथ पर हाथ धरे किसी ऐसे समय की
प्रतीक्षा में बैठ गये कि स्वयं ही हालात सुधरेंगे। कैसे सुधरेंगे? यह कोई नहीं जानता
था। वे ईश्वर का ही भरोसा रखकर बैठ गये। लेकिन नवयुवकों के दिलों में आग
भड़क उठी। उनके दिलों में ईश्वर का भरोसा शेष नहीं बचा था। चुपचाप, बिना
कुछ किये खाली बैठना उन्हें मुश्किल हो गया।
प्रिन्स क्रोपोटकिन अपने एक लेख में लिखते हैं -
'There are periods when some generations are penetrated with the
noblest feelings of altruism and self sacrifice, when life becomes utterly
impossible—morally and physically impossible—for the man or woman
who feels that he is not doing duty; and so it was with the youth in
Russia.'
अर्थात कभी-कभी ऐसा वक़्त आ जाता है जब आम जनता में जनसेवा का
भाव ज़ोर पकड़ता है, तब उन नर-नारियों के लिए जीना दूभर हो जाता है जो यह
समझने लगते हैं कि वे अपना कर्तव्य पूरा नहीं कर रहे हैं। यह स्थिति उस समय
रूस की हो गयी थी। वृद्ध व्यक्ति तो हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे लेकिन नवयुवकों
के दिलों में आग भड़क उठी।
1871 में बहुत-से युवक-युवतियाँ पश्चिमी यूरोप में भाग गये थे। वहाँ वे पढ़ते
थे। ज़्यादातर स्विट्ज़रलैण्ड में थे। उन्हें स्वदेश आने की इजाज़त मिल गयी थी। वे
लोग नये साम्यवाद या एकसुरता के विचार लेकर आये थे। उन्होंने आते ही जो प्रचार
शुरू किया, तो ज़ार ने तुरन्त सबको पकड़ लिया और वे अन्धाधुन्ध साइबेरिया में
जलावतन कर दिये गये। काम ने खुफ़िया रूप धारण कर लिया।
उस समय तीन पार्टियाँ काम कर रही थीं। इनके नेता चेर्नीशेवस्की, हशुटिन
(हर्जन - स.) और नेचाइफ थे। पहले आवाज़ सुनायी देती थी कि जनता के साथ
होना चाहिए अर्थात जनता से सहानुभूति करनी चाहिए और उन्हें ऊपर उठाने का
यत्न करना चाहिए। लेकिन अब नयी आवाज़ उठी कि स्वयं ही जनता बन जाओ।
अर्थात जनता के साथ शामिल हो जाओ। इस आवाज़ के उठते ही बलिदान के
ऐसे-ऐसे उदाहरण मिलते हैं कि अभी तक दुनिया के तख़्ते से उनकी कोई मिसाल
नहीं मिलेगी।
लेकिन पहले यह बता देना आवश्यक है कि यह आवाज़ आखिर क्यों उठी?
प्रिन्स क्रोपोटकिन ने लिखा है - 'Until of late—however the peasant has
always regarded the man who wears broad cloth and neither ploughs hews
nor hammers nor digs side by side with him as an enemy. We wanted faith
अन्तरराष्ट्रीय क्रान्तिकारी आन्दोलन का अध्ययन / 215

and love from him; and to obtain them it was necessary to live their life.'
अर्थात उस समय तक रूसी किसान किसी भी ऐसे आदमी को, जिसने
ढीले-ढाले कपड़े पहने हों और जिन्हें न तो हल चलाना आता हो और न कुल्हाड़ा,
जिनके हाथों में हथौड़ा चलाने से कभी छाले न पड़े हों, और जिसने कभी फ़सल
उगाई व काटी न हो, उसे अपना दुश्मन समझते थे। लेकिन हमें उनकी सहानुभूति
और विश्वास चाहिए था। इसलिए उनके पास रहने की ज़रूरत थी। उनके साथ श्रम
करने और रहने की आवश्यकता थी।
आहा! आज हम हिन्दुस्तान को स्वतन्त्र कराने की बहुत लम्बी-चौड़ी बातें
करते हैं, लेकिन कितने आदमी इस तरह कुर्बानी करने को तैयार हैं? कितने अपने
शहरों को छोड़कर गाँवों में किसानों की तरह गन्दे-गन्दे रहने के लिए तैयार होंगे?
वहाँ तो अजीब स्थिति बन गयी थी।
Youngmen left their classrooms, their regiments and their desks,
learned the smith's trade or the cashier's; or the ploughman's and went
to work among the villages. Highborn and wealthy ladies also took them-
selves to the factories, worked fifteen and sixteen hours a day at the
machine, slept in doghols with peasants, went barefoot as our working
women go, bringing water from the river for the house.
युवक अपने कॉलेज, अपने स्कूल, अपनी प्लाटून और कुर्सियों को छोड़ आये
और किसान-लोहार के काम सीखकर गाँवों की ओर चल पड़े। यह कितना बड़ा
त्याग है। बड़े-बड़े समृद्ध परिवारों की पली बहुत नाजुक युवतियाँ कारखानों में
मज़दूरी करने के लिए चल पड़ीं। अन्य मज़दूरों की भाँति अँधेरी कोठरियों में सोतीं,
सोलह-सोलह घण्टे मशीन पर काम करतीं, नंगे पैर नदी से घर के लिए पानी लातीं।
बस, एक ही लगन। एक ही धुन में मस्त। उन ग़रीब मज़दूरों को उनके बुरे
हालात का ज्ञान कराना और इसका इलाज बताना है। यह कितना बड़ा बलिदान है।
युवतियों ने तो हद दर्जे का काम किया। रूसी युगान्तकारियों की दादी अम्मा
कहलाने वाली श्रीमती कैथराईन एक समृद्ध और सुन्दर महिला थीं। वह भी उनमें
शामिल हो गयीं। पहले अपनी ख़ूबसूरती को तेज़ाब डालकर जला डाला और
दागदार चेहरा बनाकर बदसूरत बन गयीं ताकि बाह्य सौन्दर्य जनता में काम के दौरान
कोई रुकावट न बने। ओह! आज ऐसा बलिदान कर सकने का साहस करने वाले
कितने व्यक्ति हिन्दुस्तान में मौजूद हैं। रूस में नौजवान युवक-युवतियाँ घरों से भाग
जाते और इन्हीं कार्यों में ज़िन्दगी बिता देते थे। लेकिन आज हिन्दुस्तान में कितने
नौजवान हैं जो देश को स्वतन्त्र कराने के उद्देश्य से पागल हुए फिर रहे हों? चारों
ओर काफ़ी समझदार आदमी नज़र आते हैं, लेकिन प्रत्येक को अपना जीवन
सुखपूर्वक गुज़ारने की चिन्ता हो रही है। तब हम अपने हालात, देश के हालात
सुधारने की क्या उम्मीद रखें? पिछली सदी का अन्तिम भाग रूसी नौजवानों ने इस
216 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

तरह प्रचार कार्य में बिताया। युवतियों को घरों से निकाल लाने के अनेक बहुत
सुन्दर क़िस्से मौजूद हैं।
सोनिया एक पादरी की लड़की थी। उसके स्कूल में युगान्तकारी महिलाएँ
पढ़ाने वालों में अभी शामिल हुई थीं। उनके उपदेश सुनकर सोनिया के दिल में
भी देशसेवा के भाव ने ज़ोर पकड़ा। एक दिन वह घर से भाग गयी। लेकिन कुछ
दिनों बाद पिता ने आकर पकड़ लिया। तब पादरी के घर से उसे मुक्ति दिलाने
का बन्दोबस्त किया गया। एक नौजवान उसका प्रेमी बनकर उसके घर गया और
उसके पिता को मनाकर उससे शादी कर ली। कहानी बहुत रोचक है और 'रूस
के नायक और नायिकाएँ' किताब में प्रकाशित हैं। कभी अवसर मिला तो वह
कहानी भी पाठकों के समक्ष रखेंगे। ख़ैर, फ़िलहाल पाठक संक्षेप में ही समझ लें
कि किस प्रकार रूस में कार्य चल रहे थे।
पहले तो काम खुले रूप में आरम्भ किया गया, लेकिन फिर सरकार ने जुल्म
ढाकर धर-पकड़ करके हज़ारों की संख्या में लोग साइबेरिया में भेज दिये। बिना
वारण्ट हज़ारों व्यक्तियों को पकड़ लिया। चार-पाँच बरस तक वे अँधेरी कोठरियों
में बन्द रखे गये। बाद में लगभग सौ व्यक्तियों पर मुक़दमा चलाया गया जिनमें से
कुछ को सज़ा दी गयी। हज़ारों मुक़दमों में से एक 'ट्रायल ऑफ़ दि हण्ड्रेड नाइण्टी
थ्री' नाम से प्रसिद्ध है। संक्षेप में, सरकारी संख्या के अनुसार हज़ारों लोग पकड़े
गये और उन्हें जेलों की तंग अँधेरी सीलनभरी कोठरियों में चार-चार पाँच-पाँच
साल बन्द करके रखा गया। इनमें से तीन सौ व्यक्तियों को तो बहुत दिनों तक बन्दी
रखा गया। इसी प्रकार अन्य अनेकों ने भी मरने की कोशिश की। 193 पर मुक़दमा
चला। अत्यन्त अन्यायकारी न्यायालय ने सामान्य सबूत के आधार पर ही दस-दस
वर्षों की सज़ा सिर्फ़ इस बात के लिए दी कि वे प्रचारक थे। उनमें से नब्बे को
बरी कर दिया और शेष को सात से दस साल तक की सख़्त सज़ाएँ हुईं तथा बाद
में उम्रभर के लिए साइबेरिया की जलावतनी। एक अन्य मुक़दमे में एक महिला
को नौ-दस वर्ष की सख़्त सज़ा मात्र इस आरोप में हुई कि उसने एक मज़दूर को
साम्यवादी विचारधारा का एक परचा दिया था।
इस तरह जुल्म होता देखकर काम पहले से भी अधिक गुप्त और सोच-
समझकर होने लगा। साथ ही प्रतिशोध की भावना भी सक्रिय हो उठी। साधारणतया
एक-आध कमीना खुफ़िया अधिकारी जिसे भी चाहता, पकड़ता और जलावतन
कर देता। इससे उसे तो इनाम मिल जाता लेकिन नौजवानों का जीवन ख़तरे में पड़
जाता।
कहा तो यह जाता है कि 16 अप्रैल, 1899 में जिस काराकोज्फ ने ज़ार पर
गोली चलायी थी, वह भी नाशवादियों का ही काम था। और एक पोलिश नौजवान
बेरेजोज्वस्की भी जिसने अगले वर्ष ज़ार पर पेरिस में गोली चलायी थी, उस पार्टी
अन्तरराष्ट्रीय क्रान्तिकारी आन्दोलन का अध्ययन / 217

का सदस्य था। लेकिन वर्तमान स्थिति पर क्रोपोटकिन ने लिखा है कि हमारे
शुरू-शुरू के काम में ज़ार जितना सुरक्षित था उतना कभी नहीं रहा होगा। यह तो
हारकर अन्त में शक्ति के इस्तेमाल के क्षेत्र में उतरे। उन्होंने पहले हमेशा ज़ार को
बचाने की कोशिशें कीं। एक बार जब कोई नौजवान ज़ार को मारने सेण्ट पीटर्सबर्ग
पहुँचा तो इस पार्टी वालों ने इसे इस काम से रोक दिया।
लेकिन बाद में तो काम ज़ोरों से चल पड़ा। 1879 में मुलज़िम बन्दियों में से
एक को, जिन पर अभी मुक़दमा चलना था, बेंत लगाये गये क्योंकि उसने उठकर
पुलिस अधिकारी को सलाम नहीं किया था और शेष बन्दियों को जिन्होंने उसकी
हिमायत की, जनरल ट्रेपोफ के आदेशानुसार बुरी तरह पीटा गया। इस पर एक
बहादुर युवती वीरा जसुलिच ने जनरल ट्रेसोफ पर गोली चला दी। वह मरा तो नहीं
लेकिन युवती पर मुक़दमा चला। वह बरी कर दी गयी। पुलिस ने फिर उसे
पकड़ना चाहा लेकिन जनता उसे छीनकर ले गयी।
जब से रूसी क्रान्तिकारियों ने देखा कि उनकी कोई मदद नहीं करता, उनकी
रक्षा के लिए कोई क़ानून नहीं है, तब से उन्होंने स्वयं ही अपनी रक्षा करनी आरम्भ
कर दी। पुलिस सुबह-सुबह लोगों के घर घेर लेती, महिलाओं तक के कपड़े
उतारकर सिपाही उनकी तलाशी लेते। लोग बहुत तंग आ गये। कुछ यह भी कहने
लगे कि अन्य देशों में तो ऐसा नहीं हो सकता। हम भी यह नहीं होने देंगे। सबसे
पहले ओडेसा में कोवल्सकी ने यह काम किया। उसने पुलिस के साथ टक्कर ली।
दमन और भी बढ़ा। लेकिन फिर क्या था, प्रतिरोध का काम चल पड़ा। सुरक्षा के
लिए शक्ति का इस्तेमाल उचित समझा जाने लगा। पहले पाँच, फिर तीन खुफ़िया
अधिकारी क़त्ल किये गये, जिनके बदले में सत्रह नौजवानों को फाँसी दी गयी।
फिर तो बस प्रतिशोध लेने, फाँसियाँ देने का यही क्रम चल पड़ा।
1879 में तो पुनः नाशवाद का अर्थ बम और पिस्तौल चलाना ही हो गया। तंग
आकर ज़ार ने भी उन्हें ठिकाने लगाने का निर्णय कर लिया।
बस फिर क्या था, सभी इस काम में लग गये। 14 अप्रैल, 1879 को
शोलोवियूफ ने ज़ार पर गोली चला दी, लेकिन ज़ार बच गया। उसी बरस ज़ार के
विण्टरप्लेस अर्थात शरद महल को डाइनामाइट से उड़ा दिया गया, लेकिन तब भी
ज़ार बच गया। अगले बरस जब ज़ार पीटर्सबर्ग से मास्को जा रहा था, उसकी गाड़ी
उड़ा दी गयी। गाड़ी के कई डिब्बे उड़ गये, लेकिन ज़ार तब भी बच गया। 13
मार्च, 1881 को ज़ार अपनी विशेष पलटन और घोड़ों की परेड देखकर वापस आ
रहा था कि उस पर एक बम फेंका गया। बम से गाड़ी टूट गयी और ज़ार उतरकर
नौकर के पास उसे देखने के लिए झुककर कहने लगा, “ईश्वर की कृपा से मैं
बच गया।” तुरन्त एक अन्य नौजवान क्रान्तिकारी ने आगे बढ़कर दूसरा बम फेंकते
हुए कहा, “ज़ार, इतनी जल्दी खुदा का शुक्रिया अदा न कर।” तभी बम फटा और
218 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

ज़ार मर गया। हज़ारों व्यक्तियों की गिरफ़्तारियाँ हुईं। अनेकों फाँसी चढ़ गये। पाँच
व्यक्तियों को विशेष रूप से जनता के समक्ष फाँसी दी गयी। इनमें सबसे अधिक
प्रसिद्ध एक महिला थी, जिसका नाम सोफिया प्रोवस्किया था।
उस समय पार्टी दब गयी। फिर कई अन्य पार्टियाँ उठीं। लेकिन नाशवादी पार्टी
का इतिहास इतना-सा है। नाशवादियों को लोगों ने ग़लत आँका और
अराजकतावादियों की तरह इन्हें भी बदनाम किया गया। एक अंग्रेज़ी समाचारपत्र ने
एक कार्टून बनाया जिसमें तबाह हुई चीज़ों में निहिलिस्ट बम और डाइनामाइट लिये
खड़े थे। एक पूछता है, “क्यों बन्धु, कुछ बाक़ी तो नहीं है?” दूसरा कहता है,
“दुनिया का गोला ही बाक़ी है।” पहला कहता है, “लगा देता हूँ डाइनामाइट तुम्हारे
उसमें भी!” यह बड़ा ग़लत बयान था। आस्कर वाइल्ड ने एक नाटक ‘वीरा दि
निहिलिस्ट’ लिखा था। उसमें नाशवादियों का अच्छा चित्र बनाने का प्रयास किया
गया। लेकिन उसमें बहुत अशुद्धियाँ हैं। एक अन्य किताब ‘कैरियर ऑफ़ ए
निहिलिस्ट’ भी प्रकाशित हुई थी। यह पठनीय है। इसमें नाशवादियों के बारे में ठीक
लिखा है। हिन्दी में ‘बोल्शेविक के कोम’ तथा ‘निहिलिस्ट-रहस्य’ प्रकाशित हो
चुके हैं। पहला काकोरी के शहीद श्री रामप्रसाद बिस्मिल का लिखा है। उसमें
उन्होंने निहिलिस्टों की बहुत दर्दनाक तस्वीर खींची है। मगर उन्हें मात्र विनाश चाहने
वाले ही दिखाया गया है, जोकि ठीक नहीं है। वे अच्छे जनसेवक थे। वे बहुत
बलिदानी और जनता से प्यार करने वाले थे। वे धन्य थे।
अन्यायी व्यवस्था
वे लोग जो महल बनाते और झोंपड़ियों में रहते हैं, वे लोग जो सुन्दर-सुन्दर
आरामदायक चीजें बनाते हैं, स्वयं पुरानी और गन्दी चटाइयों पर सोते हैं।
ऐसी स्थिति में क्या करना चाहिए? ऐसी स्थितियाँ यदि भूतकाल में रही हैं तो
भविष्य में क्यों नहीं बदलाव आना चाहिए? यदि हम चाहते हैं कि देश की जनता
की हालत आज से अच्छी हो तो ये स्थितियाँ बदलनी होंगी। हमें परिवर्तनकारी
होना होगा।
अगस्त, 1928
अन्तरराष्ट्रीय क्रान्तिकारी आन्दोलन का अध्ययन / 219

रूस की जेलें भी स्वर्ग हैं
डब्ल्यू.जे. ब्राउन लिखित यह लेख 'किरती' सितम्बर, 1928 में प्रकाशित हुआ
था, जिस पर एक सम्पादकीय टिप्पणी भी थी। यहाँ यह लेख 'किरती' के
सम्पादकीय नोट सहित दिया गया है। — स.
(रूसी क्रान्ति केवल राजनीतिक क्रान्ति ही नहीं थी, बल्कि उसने राष्ट्र के जीवन
के हर पहलू में क्रान्ति पैदा कर दी। जहाँ राजनीतिक सत्ता एक ज़ालिम बादशाह
ज़ार से छीनकर देश की आम जनता के हाथों में सौंप दी गयी वहाँ आर्थिक मैदान
में 'कमाये कोई, और मौज़ उड़ाये कोई' वाली बात भी समाप्त कर दी गयी। आज
वहाँ न तो लाखों और करोड़ों श्रमिक भूखे नज़र आते हैं और न ही चन्द हरामख़ोरी
करने वाले मोटे पेटवाले पूँजीपति ही नज़र आते हैं। सामाजिक जीवन में कोई
ऊँच-नीच बाक़ी नहीं रही। स्त्रियों के भी समान अधिकार हैं। आज रूस ही ऐसा
देश है जहाँ अधिक से अधिक लोग खुश व प्रसन्न हैं। उनकी क्रान्ति वाक़ई सच्ची
क्रान्ति है।
और तो और, उन्होंने जेलों सम्बन्धी भी एक बड़ी भारी क्रान्ति कर दी है।
पहले भी कई बार वहाँ की जेलों का हाल पढ़ चुके हैं। वहाँ की जेलें हमारे देश
से हज़ार दर्जा अच्छी हैं। और तो और, उनके क़ैदी हमारे आज़ाद आदमियों से हज़ार
दर्जा बेहतर हैं। यहाँ रोटी का सवाल इतना मुश्किल होता जा रहा है कि ख़ामख़ाह
दिल करता है कि यहाँ से तो रूस में जाकर जेलों में ही रहें। बड़ा शानदार
रहन-सहन, बहुत अच्छा खाना-पीना और साथ में पढ़ाई भी होती है। कौशल
सिखाये जाते हैं, काम करने का वेतन दिया जाता है। आज हम एक ताज़ा लेख
पाठकों की सेवा में भेंट कर रहे हैं ताकि वे देख लें कि रूस की और बातों के
साथ-साथ जेल-विभाग में भी क्या परिवर्तन हो गये हैं? यह ध्यान रहे कि
समाजवाद में अपराध रोकने के लिए दण्ड ही पर्याप्त नहीं माना जाता, बल्कि वे
अपराधियों को अच्छी शिक्षा देकर उन्हें हमेशा के लिए अपराध से रोकने की
कोशिश करते हैं। सज़ा के दिनों में वे क़ैदी को काम सिखाते हैं। बाहर आते ही
काम पर लगा देते हैं, ताकि बेकार रह भूखा मरता वह फिर अपराध न करने लगे।
यही अपराध को जड़ से मिटाने का ढंग है। — एडीटर)
220 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

मैं रूस गया। बड़ी-बड़ी चीजें देखकर हैरान रह गया। सबसे ज़्यादा हैरानी हुई
वहाँ की जेलें देखकर। मेरी इच्छा थी कि देखूँ यहाँ जेलों की क्या हालत है।
‘जार्जिया’ की जेल देखने का मौक़ा मिला। वहाँ पहुँचने पर पता चला कि जेलर
को मुझे जेल देखने की अनुमति मिलने की सूचना नहीं थी। इससे पहले थोड़ी
मुश्किल हुई। लेकिन फिर यह निर्णय हुआ कि मैं उसके साथ जाऊँ व घूमकर सब
देख लूँ। ख़ैर! मैं, जेलर व एक-दो और आदमी जेलयात्रा को निकले। सबसे पहले
मुझे जेल के लंगर (खाद्य-भण्डार) का वार्डर मिला। वह आदमी ज़ार के समय
भी जेल में नौकरी करता था और क्रेंसकी की अस्थायी पूँजीपति सरकार के अधीन
भी जेल कर्मचारी रहा। वह दोनों सरकारों की बड़ी निन्दा करता था। वह कहता
था कि उन दोनों सरकारों के अधीन क़ैदियों और वार्डरों को पशुओं की खुराक
दी जाती थी और बेचारे क़ैदियों पर बेहद अत्याचार होते थे। लेकिन सुनता कौन
था। ज़ार के बाद अस्थायी सरकार भी कुछ अच्छी नहीं थी। हाँ, तब ज़ार की
सरकार से एक बात अच्छी थी कि व्यक्ति अपनी तकलीफ़ों की शिकायत कर
सकता था। पर इससे कोई व्यावहारिक लाभ नहीं होता था, क्योंकि कोई शिकायत
दूर करने की कोशिश नहीं करता था। और सबसे अधिक क्रोध उसे इस बात पर
था कि अस्थायी सरकार ने उनका तीन महीने का वेतन नहीं दिया। इस बात का
अब तक बहुत प्रभाव है।
उससे पूछा कि अब क्या स्थिति है? तो उसने कहा, अब तो कमाल हो गया,
अब तो ख़ूब मजे हैं। अब क़ैदियों और वार्डरों को बहुत अच्छा भोजन मिलता है।
सबको सही समय पर वेतन मिलता है। बहुत खुशी से कहता था, “अब तो मैं भी
आदमी बन गया हूँ, भले ही अभी तक जेल का वार्डर हूँ।”
जेल में घुसते ही मैंने एक कमरा देखा, जिसमें बहुत-से आदमी क़ैदियों से
मिल रहे थे। वहाँ क़ैदियों और दूसरे आदमियों के बीच सिर्फ़ एक लोहे का डण्डा
था। वे बड़ी खुली तरह बातचीत कर सकते, हाथ मिला सकते और अपने प्रियजनों
को चूम सकते थे। मैंने उस समय एक आदमी को अपने बच्चे को चूमते देखा,
जिसे उसकी पत्नी साथ ले आयी थी। पता चला कि सप्ताह में तीन बार प्रत्येक
क़ैदी के दोस्त, रिश्तेदार मुलाक़ात करने आ सकते थे और मुलाक़ात आधे घण्टे
तक चल सकती है। मिलने वालों की संख्या पर भी कुछ ख़ास पाबन्दी नहीं, जितने
लोग चाहें, मिलने आ जायें। यह देखकर मैं बहुत हैरान हुआ।
फिर यह जानकर बहुत हैरानी हुई कि अब अकेली कोठरी में क़ैदियों को बन्द
नहीं रखा जाता। बड़ी-बड़ी बैरकें बनी हुई थीं, जिनमें 20-20 आदमी रहते हैं। उन
बैरकों को न रात में और न दिन में ही ताला लगाया जाता है। हाँ, रात को निचली
छत और ऊपरी छत के बीच की सीढ़ियों को ताला लगा दिन जाता है। दिन में
उसे भी खोल दिया जाता है। प्रत्येक क़ैदी किसी भी कमरे में जा सकता है। वे
अन्तरराष्ट्रीय क्रान्तिकारी आन्दोलन का अध्ययन / 221

चाहे सिगरेट पियें या पढ़ें या खेलें, जो चाहे करें, उन्हें पूरी छूट रहती है।
दिन में चार बार उन्हें कसरत के लिए बाहर निकाला जाता है। कसरत भी बन्द
अहातों में बन्दूकों के पहरे में नहीं, बल्कि बाहर के खेल के मैदानों में बिना किसी
ख़ास पहरे के। यह देखकर मेरी हैरानी की हद न रही।
पता चला कि शरीफ़ क़ैदियों को सप्ताह में एक दिन जेल से छुट्टी दी जाती
है, तब वे अपने घर जा सकते हैं और घरवालों के साथ पूरा दिन बिता सकते हैं
या सैर कर सकते हैं। मैंने पूछा - इस तरह क़ैदी भागते नहीं? उन्होंने कहा कि
ऐसा अवसर कम ही आता है। कभी कोई क़ैदी इस तरह नहीं भागा। गर्मियों में
शरीफ़ क़ैदियों को पन्द्रह दिन की छुट्टी मिल जाती है। तब वे जहाँ चाहे जा सकते
हैं। इन छुट्टियों में भी क़ैदी भागते नहीं, समय पूरा होने पर लौट आते हैं।
कई क़ैदी हमारे साथ चल पड़े। एक क़ैदी थोड़ी-सी अंग्रेज़ी सीख गया था।
उससे मैंने बात की। वह कहने लगा, जेल बड़ी अच्छी जगह है। क़ैदी आठ घण्टे
काम करते हैं। खुराक बहुत अच्छी मिलती है। कोई सख़्ती और ज़ुल्म नहीं होता।
उनकी अपनी अध्ययन-सभा, लाइब्रेरी, संगीत-पार्टी आदि बने हुए हैं, जिनका
प्रबन्ध उन्हीं की एक समिति करती है। सारी जेल देखकर कोई उसे जेल नहीं कह
सकता। वह तो एक सभा या क्लब लगता है।
इमारत जेल की ही लगती थी और अन्य सामान भी जेल का ही नज़र आता
था, लेकिन स्थिति बहुत-से परिश्रम करने वाले स्वतन्त्र लोगों से अच्छी थी। वहाँ
सप्ताह में तीन बार सिनेमा और थियेटर भी दिखाये जाते हैं।
क़ैदियों के कपड़े देख बहुत हैरानी हुई। क़रीब चालीस क़ैदी, जेल-दारोग़ा व
कुछ वार्डर खड़े थे। मजिस्ट्रेट साहिब आये। बातचीत में अंग्रेज़ी जेलों पर बात चल
पड़ी। सभी लोग, क्या क़ैदी और क्या अधिकारी, एक समान हिस्सा ले रहे थे।
यदि कोई अनजान आदमी वहाँ आ जाता तो बिल्कुल न पहचान पाता कि कौन
क़ैदी है और कौन दारोग़ा और कौन मजिस्ट्रेट।
क़ैदियों की अपनी दुकानें हैं। वे स्वयं ही उन्हें चलाते हैं। वहाँ वे तम्बाकू,
सिगरेट, मिठाई व ब्रुश आदि हज़ारों आवश्यक चीजें खरीद सकते हैं और जो मुनाफ़ा
हो वह रिहा होने पर क़ैदियों में बाँट दिया जाता है। सवाल उठेगा कि बिना पैसे
क़ैदी चीजें ख़रीदते कैसे हैं? लेकिन रूस में प्रत्येक क़ैदी को महीना परिश्रम करने
के बाद वेतन मिलता है। वे जैसे चाहें, उस रकम को ख़र्च कर सकते हैं। क़ैदियों
के अपराध अधिकारियों के पास नहीं जाते। क़ैदियों की समिति स्वयं ही सारी
समस्याएँ हल करती है।
क़ैदियों की अपनी एक समिति बनी हुई है ताकि जो तकलीफ़ हो, वह दूर
की जा सके। यह समिति अधिकारियों द्वारा मान्य है, वे फ़ौरन दारोग़ा को अपनी
सब तकलीफें बता देते हैं। और यदि कोई फ़ैसला न हो पाये तो स्वयं मजिस्ट्रेट
222 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

के सामने अदालत में मामला पेश कर सकते हैं। इनका अपना अख़बार भी होता
है। हाथ से ही लिखा जाता है। लेखक का नाम नहीं दिया जाता, लेकिन उन्हें
जेल-व्यवस्था की आलोचना करने का पूरा अधिकार है। जेलर का एक बड़ा
मज़ेदार कार्टून बना हुआ मैंने स्वयं देखा था।
कई कमरों में मैंने देखा कि क़ैदी अलग-अलग काम सीख रहे हैं। कहीं कपड़े
सीने का काम, कहीं जूता सिलने का काम और कहीं बढ़ई का काम सिखाया जा
रहा था।
और कई कमरों में पढ़ाई हो रही थी। कई मास्टर बाहर से पढ़ाने आते थे और
कई क़ैदियों में से ही थे। क़ैदी अध्यापक को प्रत्येक दो दिन की क़ैद के बदले
एक दिन की क़ैद माफ़ की जाती है।
मैं एक क़ैदी को एकान्त में ले गया। अधिकारी बड़ी खुशी से अलग हो गये।
उसने भी यही कहा कि सभी क़ैदी खुश हैं और यह जगह बहुत अच्छी है। मुझसे
पूछा गया कि इंग्लैण्ड में क़ैदियों से कैसा व्यवहार किया जाता है? उन्हें यह
विश्वास ही नहीं होता था कि इंग्लैण्ड में क़ैदियों को अलग-अलग कोठरियों में
बन्द किया जाता है और बातचीत करने की भी अनुमति नहीं होती।
वे पूछने लगे, फिर क़ैदियों की समिति क्या करती है? वह यह शिकायत दूर
क्यों नहीं करती? मैंने उन्हें बताया कि वहाँ कोई समिति नहीं बनायी जा सकती,
नहीं तो जेलर क्रोध से ही मर जायें। वे हैरान रह गये। वे विश्वास नहीं करते थे
कि जेल में क़ैदियों की समिति के बग़ैर क़ैदियों की गुज़र होती होगी।
उन्होंने यही निष्कर्ष निकाला कि मुझे अंग्रेज़ों की जेलों सम्बन्धी कुछ भी
जानकारी नहीं है। वे मुझे अपने नहाने के कमरे में ले गये। ज़ार के समय ये अँधेरी
कोठरियाँ थीं। अब वहाँ फव्वारे लगा दिये गये हैं और नहाने की बहुत अच्छी
व्यवस्था की गयी थी।
आख़िर में मैं उनके साथ लंगर (मेस) में गया। खाना बहुत सादा, बहुत बढ़िया
व स्वादिष्ट था। ऐसा बढ़िया खाना हमारे बहुत-से परिश्रम कर खाने वाले स्वतन्त्र
मज़दूर भी नहीं पा सकते। मेरे जाने से उन्हें बहुत दुख हुआ। उन्होंने मुझसे इंग्लैण्ड
के क़ैदियों तक उनकी दुआ-सलाम पहुँचाने को कहा। मुझे उन्होंने अपने बग़ीचे
का गुलदस्ता भेंट किया और बड़े सम्मान के साथ विदा किया और कहा कि
उम्मीद है आप फिर आयेंगे।
अन्तरराष्ट्रीय क्रान्तिकारी आन्दोलन का अध्ययन / 223

मेरी रूस यात्रा

लेखक-भाई शौक़त उस्मानी। प्रताप कार्यालय, कानपुर से प्रकाशित। 144
पृष्ठ, मूल्य – ।।=
हिन्दुस्तान के वर्तमान जन-आन्दोलन में विदेशों की यात्रा का काफ़ी प्रभाव है।
पाठक जानते हैं कि 1914-15 के जन-आन्दोलन में अमेरिका से लौटे हुए भाइयों
ने ही अपने प्राणों की बाज़ी लगाकर एक बार हिन्दुस्तान की क़िस्मत को बदलने
का यत्न किया था।
1918 में जब ‘ख़िलाफ़त’ का मामला खड़ा हुआ तभी मुसलमान भाइयों में
हिज़रत की लहर चली – कि हमें अंग्रेज़ी मुल्क ही छोड़कर चले जाना है। इस
सिलसिले में सैकड़ों आदमी गये और बाहर जाकर उनकी आँखें खुलीं। धर्मान्ध
मुसलमानों ने देखा कि कोई भी उनका बोझ उठाने को तैयार नहीं। आख़िर बहुत-से
तो अनेक झंझट उठाकर उसी समय वापस लौट आये। कई आगे चले गये। रूस
जा पहुँचे। जिन मुसीबतों को उठाकर वे लोग गये थे वह क़िस्सा बहुत उत्साहवर्धक
है और दर्दनाक भी है। शौक़त उस्मानी उन्हीं व्यक्तियों में से हैं। तुर्किस्तान की
लड़ाइयों में से वे किस तरह जान बचाकर निकले और किस तरह रूस पहुँचे और
वहाँ की हालत देखकर अचम्भित हो उठे। ये सब बातें किताब पढ़ने से ही सम्बन्ध
रखती हैं। नौजवानों को इस किताब की ओर अवश्य ध्यान देना चाहिए और बाहर
जाकर दुनिया देखने का शौक़ पैदा करना चाहिए। रूस का बहुत अच्छा हाल लिखा
हुआ है। प्रत्येक हिन्दी पढ़े सज्जन को यह किताब मँगवाकर पढ़नी चाहिए।
224 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

आयरिश स्वतन्त्रता युद्ध
इस पुस्तक का अनुवाद भगतसिंह ने किया था। यह अनुवाद इसी संकलन के
तीसरे खण्ड में प्रकाशित है। – स.
‘आयरिश स्वतन्त्रता युद्ध’ : हिन्दी में। प्रताप कार्यालय, कानपुर से प्रकाशित।
100 पृष्ठ 100, मूल्य – ॥=
यह किताब आयरलैण्ड के बहादुर युगान्तकारी श्री डॉन बीन की अंग्रेज़ी पुस्तक
‘माई फ़ाइट फ़ार आयरिश फ़्रीडम’ का हिन्दी अनुवाद है। पाठक जानते होंगे कि
सौ बरसों से आयरलैण्ड अंग्रेज़ों के पंजे से रिहा होने की कोशिश करता रहा था।
पिछली सदी में 1848, '68, '98 की बग़ावतें प्रसिद्ध हैं। पिछले संघर्ष के दिनों
में 1916 में ईस्टर के दिनों में उन्होंने फिर विद्रोह कर दिया था। उसमें भी उनकी
हार ही हुई थी। अब तक वह ईस्टर विद्रोह के नाम से प्रसिद्ध है।
बाद में लड़ाई समाप्त हो जाने पर पार्लियामेण्ट के लिए सदस्यों का चुनाव
हुआ और आयरलैण्ड के ‘सिनफिनरा’ के सदस्य ही ज़्यादा चुने गये। उन्होंने अलग
ही आयरिश पार्लियामेण्ट स्थापित कर ली और दूसरी तरह युगान्तकारी गुरिल्ला
युद्ध, अर्थात लुकाछिपी वाली लड़ाई आरम्भ कर दी। सबसे पहले लड़ाई छेड़कर
देश, देशवासियों और सरकार की नींद भंग करने वाले लोगों में से डेनब्रिल थे।
पहले ही दिन सिपाहियों से लड़कर उनसे उनका बारूद छीनकर वे भाग गये थे।
बाद में उनके वारण्ट निकाले गये और पकड़वाने के लिए ईनाम की भी घोषणाएँ
हुईं। रात-दिन अपना सिर हथेली पर रखे वे जनता के बीच बब्बर अकालियों की
तरह दौड़ते-फिरते रहे।
उनसे कहा गया कि तुम अमेरिका चले जाओ, लेकिन उन्होंने इन्कार कर दिया
और कहा कि हमें तो आयरलैण्ड में ही लड़ते हुए मरना है। किस प्रकार लोग उन्हें
गालियाँ बकते और पास न फटकने देते और किस प्रकार वे बार-बार पुलिस के
पंजे में फँसते-फँसते बचते, ये सब बातें पढ़ने योग्य हैं। श्री डेनब्रिल का लिखने
का ढंग बहुत अद्भुत है और व्यंगात्मक भी है। इसलिए उन्होंने सारा क़िस्सा ऐसी
अन्तरराष्ट्रीय क्रान्तिकारी आन्दोलन का अध्ययन / 225

तरतीब से लिखा है कि पढ़ने में बहुत ही आनन्द आता है।
उन्होंने पहली लड़ाई में अपने घबराने की तथा बाद की लड़ाइयों में अपने धैर्य
की स्पष्ट और सच्ची कथा लिखी, जोकि बिल्कुल ही स्वाभाविक नज़र आती है।
साथियों के गिरफ़्तार किये जाने पर वह किस तरह तड़प उठे और उन्हें छुड़ाने के
लिए कोशिशें करने लगे, यह सब पढ़ने वाली कहानी है।
एक बहुत महत्त्वपूर्ण बात है श्री डेनब्रिल की। हमारे देश के नौजवान विवाह
कराने के लिए दौड़ते फिरते हैं। बाप ने कभी सवारी नहीं की होती लेकिन वर
बना बेटा तलवार बाँधकर मरियल घोड़ी पर चढ़कर निकल पड़ता है। उसकी उस
चाल को भी क़ाबू में रखने के लिए दो व्यक्ति आगे से उसे पकड़े रहते हैं। और
फिर जाकर कपड़ों की गाँठ की तरह बँधी लड़की के साथ (वर महोदय का)
गठबन्धन हो जाता है। सर्वत्र खुशियाँ मनायी जाती हैं। लड़का ब्याहा गया! लानत
है ऐसे विवाह पर और ऐसे वर पर।
डेनब्रिल के वारण्ट निकले हुए हैं। आदेश हुआ कि देखते ही गोली मारकर
ख़त्म कर दिया जाये। लड़ाई में वे ज़ख़्मी हो जाते हैं। तब एक युवती उनकी सेवा
करती है और अपनी जान हथेली पर रखकर उनकी हर प्रकार से मदद करती है।
आख़िरकार दोनों में प्रेम हो जाता है और बिल्कुल घमासान युद्ध के दिनों में एक
जगह फ़ौजें इकट्ठी करके यह शादी की जाती है। हर पल ख़तरा है कि दुश्मनों
ने हमला कर दिया तो ख़ैर नहीं। नौजवानो, यह असल विवाह है या मुरदों वाला
(वह) विवाह? नौजवान इस किताब को ज़रूर पढ़ें और ध्यान से पढ़ें।
अंग्रेज़ों के बेइन्तहा ज़ुल्मों की भी यह दर्दनाक कहानी है। साथ ही यह भी
रोचक ढंग से बताया गया है कि 'लातों के भूत बातों से नहीं मानते।'
226 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

V.
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न :
कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि