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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 222, कुल 788 में से

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पृष्ठ 222

and love from him; and to obtain them it was necessary to live their life.'
अर्थात उस समय तक रूसी किसान किसी भी ऐसे आदमी को, जिसने
ढीले-ढाले कपड़े पहने हों और जिन्हें न तो हल चलाना आता हो और न कुल्हाड़ा,
जिनके हाथों में हथौड़ा चलाने से कभी छाले न पड़े हों, और जिसने कभी फ़सल
उगाई व काटी न हो, उसे अपना दुश्मन समझते थे। लेकिन हमें उनकी सहानुभूति
और विश्वास चाहिए था। इसलिए उनके पास रहने की ज़रूरत थी। उनके साथ श्रम
करने और रहने की आवश्यकता थी।
आहा! आज हम हिन्दुस्तान को स्वतन्त्र कराने की बहुत लम्बी-चौड़ी बातें
करते हैं, लेकिन कितने आदमी इस तरह कुर्बानी करने को तैयार हैं? कितने अपने
शहरों को छोड़कर गाँवों में किसानों की तरह गन्दे-गन्दे रहने के लिए तैयार होंगे?
वहाँ तो अजीब स्थिति बन गयी थी।
Youngmen left their classrooms, their regiments and their desks,
learned the smith's trade or the cashier's; or the ploughman's and went
to work among the villages. Highborn and wealthy ladies also took them-
selves to the factories, worked fifteen and sixteen hours a day at the
machine, slept in doghols with peasants, went barefoot as our working
women go, bringing water from the river for the house.
युवक अपने कॉलेज, अपने स्कूल, अपनी प्लाटून और कुर्सियों को छोड़ आये
और किसान-लोहार के काम सीखकर गाँवों की ओर चल पड़े। यह कितना बड़ा
त्याग है। बड़े-बड़े समृद्ध परिवारों की पली बहुत नाजुक युवतियाँ कारखानों में
मज़दूरी करने के लिए चल पड़ीं। अन्य मज़दूरों की भाँति अँधेरी कोठरियों में सोतीं,
सोलह-सोलह घण्टे मशीन पर काम करतीं, नंगे पैर नदी से घर के लिए पानी लातीं।
बस, एक ही लगन। एक ही धुन में मस्त। उन ग़रीब मज़दूरों को उनके बुरे
हालात का ज्ञान कराना और इसका इलाज बताना है। यह कितना बड़ा बलिदान है।
युवतियों ने तो हद दर्जे का काम किया। रूसी युगान्तकारियों की दादी अम्मा
कहलाने वाली श्रीमती कैथराईन एक समृद्ध और सुन्दर महिला थीं। वह भी उनमें
शामिल हो गयीं। पहले अपनी ख़ूबसूरती को तेज़ाब डालकर जला डाला और
दागदार चेहरा बनाकर बदसूरत बन गयीं ताकि बाह्य सौन्दर्य जनता में काम के दौरान
कोई रुकावट न बने। ओह! आज ऐसा बलिदान कर सकने का साहस करने वाले
कितने व्यक्ति हिन्दुस्तान में मौजूद हैं। रूस में नौजवान युवक-युवतियाँ घरों से भाग
जाते और इन्हीं कार्यों में ज़िन्दगी बिता देते थे। लेकिन आज हिन्दुस्तान में कितने
नौजवान हैं जो देश को स्वतन्त्र कराने के उद्देश्य से पागल हुए फिर रहे हों? चारों
ओर काफ़ी समझदार आदमी नज़र आते हैं, लेकिन प्रत्येक को अपना जीवन
सुखपूर्वक गुज़ारने की चिन्ता हो रही है। तब हम अपने हालात, देश के हालात
सुधारने की क्या उम्मीद रखें? पिछली सदी का अन्तिम भाग रूसी नौजवानों ने इस
216 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़