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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 214, कुल 788 में से

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पृष्ठ 214

अराजकतावाद : तीन
पिछले दो लेखों में हमने अराजकतावाद के सम्बन्ध में सर्वसाधारण तथ्य लिखे थे।
ऐसे महत्त्वपूर्ण विषय पर जोकि दुनिया के पुराने विचारों एवं परम्पराओं के विरुद्ध
नया-नया ही सामने आये, इतने छोटे लेख से पाठकों की जिज्ञासा को शान्त नहीं
किया जा सकता। इस प्रकार अनेक शंकाएँ जन्म लेती हैं। फिर भी हम उनके
मोटे-मोटे सिद्धान्त पाठकों के सामने रख रहे हैं जिनसे कि वे इनकी मोटी-मोटी
बातें समझ चुके होंगे। अब हम इसी तरह साम्यवाद, समाजवाद और नाशवाद जैसे
सिद्धान्तों पर लिखेंगे, ताकि हिन्दुस्तान भी समझ सके कि विदेशों में कौन-कौन-सी
विचारधाराएँ चलन में हैं। मगर किसी अन्य विषय पर लिखने से पूर्व अराजकतावाद
के सम्बन्ध में बहुत-सी महत्त्वपूर्ण एवं रोचक बातें लिखने का विचार है जिसमें
नाशवाद का इतिहास भी है, अर्थात अराजकतावादियों ने अब तक क्या किया? वे
किस प्रकार बदनाम किये गये?
ऊपर हमने उनके विचार बताये हैं। अब हम यह बताना चाहते हैं कि उन्होंने
इन विचारों को अमलीजामा पहनाने के लिए क्या किया और किस प्रकार वह
बल-प्रयोग से बहुत मज़बूत सरकारों से भिड़ जाते थे और उन मुठभेड़ों में जान की
बाज़ी तक लगा देते थे।
दरअसल जब दमन और शोषण सीमा से अधिक हो जाये, जब शान्तिमय और
खुले काम को कुचल दिया जाये, तब कुछ करने वाले हमेशा गुप्त रूप से काम करना
शुरू कर देते हैं और दमन देखते ही प्रतिशोध के लिए तैयार हो जाते हैं। यूरोप में जब
ग़रीब मज़दूरों का भारी दमन हो रहा था, उनके हर तरह के कार्य को कुचल डाला
गया था या कुचला जा रहा था, उस समय रूस के सम्पन्न परिवार से माईकल
बैकुनिन को जो रूस के तोपख़ाने में एक बड़े अधिकारी थे, पोलैण्ड के विद्रोह से
निबटने के लिए भेजा गया था। वहाँ विद्रोहियों को जिस प्रकार जुल्म करके दबाया
जा रहा था, उसे देखकर उनका मन एकदम बदल गया और वे युगान्तकारी बन बैठे।
अन्त में उनके विचार अराजकतावाद की ओर झुक गये। उन्होंने सन् 1834 में नौकरी
त्याग दी। उसके पश्चात बर्लिन और स्विट्ज़रलैण्ड के रास्ते पेरिस पहुँचे। उस समय
आमतौर पर सरकारें इनके विचारों के कारण इनके विरुद्ध थीं। 1864 तक वह अपने
विचार पुख़्ता करते रहे और मज़दूरों में प्रचार करते रहे।
208 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़