भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 220, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंरूसी युगान्तकारी प्रिन्स क्रोपोटकिन ने 1861 में ऊपर लिखे शब्दों में
नाशवादिता का ज़िक्र किया है, जिसका अर्थ है कि नाशवाद उस समय केवल एक
दर्शन था जोकि धार्मिक अन्धविश्वास, सामाजिक अन्याय, संकीर्णता और सरकार
की अन्धेरगर्दी के सन्दर्भ में था और इन चीज़ों के लिए जो अन्धविश्वास पैदा हो
गया था उसके विरुद्ध प्रचार करता था। असल में उस समय की स्थितियों से तंग
आकर वे नवयुवक मैदान में कूद पड़े थे। उनका कहना था कि हमें पिछली सभी
बातों का पूरी तरह नाश कर देना है। आगे क्या होना चाहिए या क्या होगा, इसका
ठीक-ठीक उत्तर न देते हुए भी वे विश्वास करते थे कि एक बड़ी सुन्दर दुनिया
का निर्माण करेंगे। 'Nihilism was destructive because it wanted a wholesale
destruction but with a pleasure of building up.' अर्थात् नाशवाद विनाशकारी या
ध्वंसात्मक विचार थे, क्योंकि वे पिछली या पुरानी बातों के विरोधी और उनका
नाश चाहने वाले थे। परन्तु फिर भी उस विनाश के बाद बड़ी सुन्दर चीज़ों के
निर्माण होने की आशा थी।
धीरे-धीरे इन बातों का प्रचार बढ़ता गया और आम नवयुवकों में भी यह
विचार घर करने लगे। वे चाहते थे – 'To liberate the people from the chains
of tradition and autocracy of the Czar.' अर्थात् जनता को पुरानी चली आ रही
रस्मों और ज़ारशाही से मुक्त कराया जाये।
उन दिनों उनका कार्यक्रम इन बातों का प्रचार ही था। स्थितियाँ परिवर्तित हो
गयीं। उन्हीं दिनों अभी गुलाम आज़ाद किये ही गये थे लेकिन उनमें से अधिकांश
को ज़मीनें नहीं दी गयी थीं जिस पर कि वे मेहनत करके कुछ लाभ उठा सकते
या कम से कम भुखमरी से बच सकते।
जो थोड़ी-बहुत ज़मीन उन्हें मिली थी उसी पर टैक्स इतना अधिक लग गया
कि लोग भूखों मरने लगे और 1867 में बहुत भयानक अकाल पड़ा। उस समय
सरकार का इन्तज़ाम अत्यधिक बुरा था। इतना दमन होता था कि जनता तंग आ
गयी थी। सरकारी ज़ुल्म से तंग आकर बड़े-बड़े सरकारी अधिकारी युगान्तकारी बन
गये। ऐसिंस्की और किआटकोवस्की, जिन्हें 1880 में फाँसी दी गयी थी, पहले
सरकारी कर्मचारी थे। इस तरह दूसरे अनेक जाने-माने अधिकारी, यहाँ तक कि
न्यायाधीश भी तंग आकर युगान्तकारी बन गये।
इधर इन पर भी ज़ुल्म की हद हो गयी। लड़कों में अच्छी-अच्छी बातों का
प्रचार नहीं होने दिया जाता था। कुछ ऐसी सभाएँ बनी हुई थीं जोकि सभी
अच्छी-अच्छी किताबें प्रकाशकों से लेकर मुफ़्त बाँट देते या केवल लागत मूल्य
पर बेच देते। ये सभी किताबें सरकारी सदस्य से स्वीकृत होती थीं। लेकिन जब
सरकार ने देखा कि यह तो प्रचार के लिए इस्तेमाल होती हैं तो उन्होंने उन किताबों
के प्रकाशक और वितरक को तबाह करने का निश्चय किया और उन पर हर तरह
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