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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 219, कुल 788 में से

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पृष्ठ 219

रूस के युगान्तकारी नाशवादी
(निहिलिस्ट)
रूस में एक बहुत बड़े नाशवादी हुए हैं इवान तुर्गनेव। उन्होंने 1862 में एक उपन्यास
लिखा ‘पिता और पुत्र’। इस उपन्यास के प्रकाशन पर बहुत शोर-शराबा हुआ,
क्योंकि उसमें नवयुवकों के आधुनिक विचारों का चित्रण किया गया था।
पहले-पहल तुर्गनेव ने ही नाशवाद शब्द इस्तेमाल किया था। नाशवाद का अर्थ है
कुछ भी न मानने वाला (निहिल – कुछ भी नहीं); शाब्दिक अर्थ है – जो कुछ
भी न माने। लेकिन वास्तव में ये लोग जनता के पुराने रस्मो-रिवाज़ और कुरीतियों
के विरोधी थे। ये लोग देश की मानसिक गुलामी से थक गये थे, इसलिए उन्होंने
इसके विरुद्ध विद्रोह किया। इन्होंने सिर्फ कहा ही नहीं बल्कि व्यवहार में कर भी
दिखाया। तुर्गनेव कहते हैं कि मेरे उपन्यास का नायक कोई काल्पनिक जीव नहीं
है, वरन वह वास्तव में ही ऐसे विचारों का था और ऐसे विचारों का प्रचार
साधारणतया होने लगा था। वे कहते हैं कि एक दिन धूप सेंकते हुए मुझे इस
उपन्यास का विचार सूझा। और उसको थोड़ा-सा विस्तार देकर किताब लिख दी।
उसका नायक बजारोव है। वह नास्तिक-सा है। पुरानी बातों का बहुत विरोधी है।
उसे मुँह-जुबानी बहुत लम्बी-चौड़ी जी-हज़ूरी नहीं आती। बहुत मुँहफट है। और
जो कहता है वह करता है। वह हर बात मुँह पर तुरन्त और स्पष्ट कह देता है।
इसलिए कई बार वह बड़ा अक्खड़-सा लगता है। वह कविता का विरोधी है।
संगीत तक को पसन्द नहीं करता। लेकिन वह स्वतन्त्रता-प्रेमी है। आम लोगों की
स्वतन्त्रता का बड़ा समर्थक है। वह जो उन दिनों में इन्सानी फ़ितरत बनी हुई थी,
उसके विरुद्ध लड़ने का यत्न करता है।
असली नाशवादी इस तस्वीर से थोड़ा भिन्न है, अर्थात उनमें थोड़ा-सा अन्तर
है, क्योंकि उपन्यास का नायक थोड़ी-सी वास्तविकता के साथ काल्पनिकता से
बनाया गया है। वास्तविक नाशवादी का चित्र कुछ और तरह का बनता है।
"The Nihilism of 1861—a philosophical system especially dealing
with what Mr. Herbert Spencer would call religious, governmental and
social fetishism.
अन्तरराष्ट्रीय क्रान्तिकारी आन्दोलन का अध्ययन / 213