भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 228, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंचाहे सिगरेट पियें या पढ़ें या खेलें, जो चाहे करें, उन्हें पूरी छूट रहती है।
दिन में चार बार उन्हें कसरत के लिए बाहर निकाला जाता है। कसरत भी बन्द
अहातों में बन्दूकों के पहरे में नहीं, बल्कि बाहर के खेल के मैदानों में बिना किसी
ख़ास पहरे के। यह देखकर मेरी हैरानी की हद न रही।
पता चला कि शरीफ़ क़ैदियों को सप्ताह में एक दिन जेल से छुट्टी दी जाती
है, तब वे अपने घर जा सकते हैं और घरवालों के साथ पूरा दिन बिता सकते हैं
या सैर कर सकते हैं। मैंने पूछा - इस तरह क़ैदी भागते नहीं? उन्होंने कहा कि
ऐसा अवसर कम ही आता है। कभी कोई क़ैदी इस तरह नहीं भागा। गर्मियों में
शरीफ़ क़ैदियों को पन्द्रह दिन की छुट्टी मिल जाती है। तब वे जहाँ चाहे जा सकते
हैं। इन छुट्टियों में भी क़ैदी भागते नहीं, समय पूरा होने पर लौट आते हैं।
कई क़ैदी हमारे साथ चल पड़े। एक क़ैदी थोड़ी-सी अंग्रेज़ी सीख गया था।
उससे मैंने बात की। वह कहने लगा, जेल बड़ी अच्छी जगह है। क़ैदी आठ घण्टे
काम करते हैं। खुराक बहुत अच्छी मिलती है। कोई सख़्ती और ज़ुल्म नहीं होता।
उनकी अपनी अध्ययन-सभा, लाइब्रेरी, संगीत-पार्टी आदि बने हुए हैं, जिनका
प्रबन्ध उन्हीं की एक समिति करती है। सारी जेल देखकर कोई उसे जेल नहीं कह
सकता। वह तो एक सभा या क्लब लगता है।
इमारत जेल की ही लगती थी और अन्य सामान भी जेल का ही नज़र आता
था, लेकिन स्थिति बहुत-से परिश्रम करने वाले स्वतन्त्र लोगों से अच्छी थी। वहाँ
सप्ताह में तीन बार सिनेमा और थियेटर भी दिखाये जाते हैं।
क़ैदियों के कपड़े देख बहुत हैरानी हुई। क़रीब चालीस क़ैदी, जेल-दारोग़ा व
कुछ वार्डर खड़े थे। मजिस्ट्रेट साहिब आये। बातचीत में अंग्रेज़ी जेलों पर बात चल
पड़ी। सभी लोग, क्या क़ैदी और क्या अधिकारी, एक समान हिस्सा ले रहे थे।
यदि कोई अनजान आदमी वहाँ आ जाता तो बिल्कुल न पहचान पाता कि कौन
क़ैदी है और कौन दारोग़ा और कौन मजिस्ट्रेट।
क़ैदियों की अपनी दुकानें हैं। वे स्वयं ही उन्हें चलाते हैं। वहाँ वे तम्बाकू,
सिगरेट, मिठाई व ब्रुश आदि हज़ारों आवश्यक चीजें खरीद सकते हैं और जो मुनाफ़ा
हो वह रिहा होने पर क़ैदियों में बाँट दिया जाता है। सवाल उठेगा कि बिना पैसे
क़ैदी चीजें ख़रीदते कैसे हैं? लेकिन रूस में प्रत्येक क़ैदी को महीना परिश्रम करने
के बाद वेतन मिलता है। वे जैसे चाहें, उस रकम को ख़र्च कर सकते हैं। क़ैदियों
के अपराध अधिकारियों के पास नहीं जाते। क़ैदियों की समिति स्वयं ही सारी
समस्याएँ हल करती है।
क़ैदियों की अपनी एक समिति बनी हुई है ताकि जो तकलीफ़ हो, वह दूर
की जा सके। यह समिति अधिकारियों द्वारा मान्य है, वे फ़ौरन दारोग़ा को अपनी
सब तकलीफें बता देते हैं। और यदि कोई फ़ैसला न हो पाये तो स्वयं मजिस्ट्रेट
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