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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 221, कुल 788 में से

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पृष्ठ 221

के जुल्म करने शुरू कर दिये। 1861 से 1870 तक हरसम्भव और जायज़ ढंग से
जनता की स्थिति सुधारने और सरकार को सही रास्ते पर लाने की कोशिश की
गयी, लेकिन कुछ भी प्रभाव न पड़ा।
ऐसी स्थिति में काफ़ी व्यक्ति तो हाथ पर हाथ धरे किसी ऐसे समय की
प्रतीक्षा में बैठ गये कि स्वयं ही हालात सुधरेंगे। कैसे सुधरेंगे? यह कोई नहीं जानता
था। वे ईश्वर का ही भरोसा रखकर बैठ गये। लेकिन नवयुवकों के दिलों में आग
भड़क उठी। उनके दिलों में ईश्वर का भरोसा शेष नहीं बचा था। चुपचाप, बिना
कुछ किये खाली बैठना उन्हें मुश्किल हो गया।
प्रिन्स क्रोपोटकिन अपने एक लेख में लिखते हैं -
'There are periods when some generations are penetrated with the
noblest feelings of altruism and self sacrifice, when life becomes utterly
impossible—morally and physically impossible—for the man or woman
who feels that he is not doing duty; and so it was with the youth in
Russia.'
अर्थात कभी-कभी ऐसा वक़्त आ जाता है जब आम जनता में जनसेवा का
भाव ज़ोर पकड़ता है, तब उन नर-नारियों के लिए जीना दूभर हो जाता है जो यह
समझने लगते हैं कि वे अपना कर्तव्य पूरा नहीं कर रहे हैं। यह स्थिति उस समय
रूस की हो गयी थी। वृद्ध व्यक्ति तो हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे लेकिन नवयुवकों
के दिलों में आग भड़क उठी।
1871 में बहुत-से युवक-युवतियाँ पश्चिमी यूरोप में भाग गये थे। वहाँ वे पढ़ते
थे। ज़्यादातर स्विट्ज़रलैण्ड में थे। उन्हें स्वदेश आने की इजाज़त मिल गयी थी। वे
लोग नये साम्यवाद या एकसुरता के विचार लेकर आये थे। उन्होंने आते ही जो प्रचार
शुरू किया, तो ज़ार ने तुरन्त सबको पकड़ लिया और वे अन्धाधुन्ध साइबेरिया में
जलावतन कर दिये गये। काम ने खुफ़िया रूप धारण कर लिया।
उस समय तीन पार्टियाँ काम कर रही थीं। इनके नेता चेर्नीशेवस्की, हशुटिन
(हर्जन - स.) और नेचाइफ थे। पहले आवाज़ सुनायी देती थी कि जनता के साथ
होना चाहिए अर्थात जनता से सहानुभूति करनी चाहिए और उन्हें ऊपर उठाने का
यत्न करना चाहिए। लेकिन अब नयी आवाज़ उठी कि स्वयं ही जनता बन जाओ।
अर्थात जनता के साथ शामिल हो जाओ। इस आवाज़ के उठते ही बलिदान के
ऐसे-ऐसे उदाहरण मिलते हैं कि अभी तक दुनिया के तख़्ते से उनकी कोई मिसाल
नहीं मिलेगी।
लेकिन पहले यह बता देना आवश्यक है कि यह आवाज़ आखिर क्यों उठी?
प्रिन्स क्रोपोटकिन ने लिखा है - 'Until of late—however the peasant has
always regarded the man who wears broad cloth and neither ploughs hews
nor hammers nor digs side by side with him as an enemy. We wanted faith
अन्तरराष्ट्रीय क्रान्तिकारी आन्दोलन का अध्ययन / 215