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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 227, कुल 788 में से

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पृष्ठ 227

मैं रूस गया। बड़ी-बड़ी चीजें देखकर हैरान रह गया। सबसे ज़्यादा हैरानी हुई
वहाँ की जेलें देखकर। मेरी इच्छा थी कि देखूँ यहाँ जेलों की क्या हालत है।
‘जार्जिया’ की जेल देखने का मौक़ा मिला। वहाँ पहुँचने पर पता चला कि जेलर
को मुझे जेल देखने की अनुमति मिलने की सूचना नहीं थी। इससे पहले थोड़ी
मुश्किल हुई। लेकिन फिर यह निर्णय हुआ कि मैं उसके साथ जाऊँ व घूमकर सब
देख लूँ। ख़ैर! मैं, जेलर व एक-दो और आदमी जेलयात्रा को निकले। सबसे पहले
मुझे जेल के लंगर (खाद्य-भण्डार) का वार्डर मिला। वह आदमी ज़ार के समय
भी जेल में नौकरी करता था और क्रेंसकी की अस्थायी पूँजीपति सरकार के अधीन
भी जेल कर्मचारी रहा। वह दोनों सरकारों की बड़ी निन्दा करता था। वह कहता
था कि उन दोनों सरकारों के अधीन क़ैदियों और वार्डरों को पशुओं की खुराक
दी जाती थी और बेचारे क़ैदियों पर बेहद अत्याचार होते थे। लेकिन सुनता कौन
था। ज़ार के बाद अस्थायी सरकार भी कुछ अच्छी नहीं थी। हाँ, तब ज़ार की
सरकार से एक बात अच्छी थी कि व्यक्ति अपनी तकलीफ़ों की शिकायत कर
सकता था। पर इससे कोई व्यावहारिक लाभ नहीं होता था, क्योंकि कोई शिकायत
दूर करने की कोशिश नहीं करता था। और सबसे अधिक क्रोध उसे इस बात पर
था कि अस्थायी सरकार ने उनका तीन महीने का वेतन नहीं दिया। इस बात का
अब तक बहुत प्रभाव है।
उससे पूछा कि अब क्या स्थिति है? तो उसने कहा, अब तो कमाल हो गया,
अब तो ख़ूब मजे हैं। अब क़ैदियों और वार्डरों को बहुत अच्छा भोजन मिलता है।
सबको सही समय पर वेतन मिलता है। बहुत खुशी से कहता था, “अब तो मैं भी
आदमी बन गया हूँ, भले ही अभी तक जेल का वार्डर हूँ।”
जेल में घुसते ही मैंने एक कमरा देखा, जिसमें बहुत-से आदमी क़ैदियों से
मिल रहे थे। वहाँ क़ैदियों और दूसरे आदमियों के बीच सिर्फ़ एक लोहे का डण्डा
था। वे बड़ी खुली तरह बातचीत कर सकते, हाथ मिला सकते और अपने प्रियजनों
को चूम सकते थे। मैंने उस समय एक आदमी को अपने बच्चे को चूमते देखा,
जिसे उसकी पत्नी साथ ले आयी थी। पता चला कि सप्ताह में तीन बार प्रत्येक
क़ैदी के दोस्त, रिश्तेदार मुलाक़ात करने आ सकते थे और मुलाक़ात आधे घण्टे
तक चल सकती है। मिलने वालों की संख्या पर भी कुछ ख़ास पाबन्दी नहीं, जितने
लोग चाहें, मिलने आ जायें। यह देखकर मैं बहुत हैरान हुआ।
फिर यह जानकर बहुत हैरानी हुई कि अब अकेली कोठरी में क़ैदियों को बन्द
नहीं रखा जाता। बड़ी-बड़ी बैरकें बनी हुई थीं, जिनमें 20-20 आदमी रहते हैं। उन
बैरकों को न रात में और न दिन में ही ताला लगाया जाता है। हाँ, रात को निचली
छत और ऊपरी छत के बीच की सीढ़ियों को ताला लगा दिन जाता है। दिन में
उसे भी खोल दिया जाता है। प्रत्येक क़ैदी किसी भी कमरे में जा सकता है। वे
अन्तरराष्ट्रीय क्रान्तिकारी आन्दोलन का अध्ययन / 221