भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 223, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंतरह प्रचार कार्य में बिताया। युवतियों को घरों से निकाल लाने के अनेक बहुत
सुन्दर क़िस्से मौजूद हैं।
सोनिया एक पादरी की लड़की थी। उसके स्कूल में युगान्तकारी महिलाएँ
पढ़ाने वालों में अभी शामिल हुई थीं। उनके उपदेश सुनकर सोनिया के दिल में
भी देशसेवा के भाव ने ज़ोर पकड़ा। एक दिन वह घर से भाग गयी। लेकिन कुछ
दिनों बाद पिता ने आकर पकड़ लिया। तब पादरी के घर से उसे मुक्ति दिलाने
का बन्दोबस्त किया गया। एक नौजवान उसका प्रेमी बनकर उसके घर गया और
उसके पिता को मनाकर उससे शादी कर ली। कहानी बहुत रोचक है और 'रूस
के नायक और नायिकाएँ' किताब में प्रकाशित हैं। कभी अवसर मिला तो वह
कहानी भी पाठकों के समक्ष रखेंगे। ख़ैर, फ़िलहाल पाठक संक्षेप में ही समझ लें
कि किस प्रकार रूस में कार्य चल रहे थे।
पहले तो काम खुले रूप में आरम्भ किया गया, लेकिन फिर सरकार ने जुल्म
ढाकर धर-पकड़ करके हज़ारों की संख्या में लोग साइबेरिया में भेज दिये। बिना
वारण्ट हज़ारों व्यक्तियों को पकड़ लिया। चार-पाँच बरस तक वे अँधेरी कोठरियों
में बन्द रखे गये। बाद में लगभग सौ व्यक्तियों पर मुक़दमा चलाया गया जिनमें से
कुछ को सज़ा दी गयी। हज़ारों मुक़दमों में से एक 'ट्रायल ऑफ़ दि हण्ड्रेड नाइण्टी
थ्री' नाम से प्रसिद्ध है। संक्षेप में, सरकारी संख्या के अनुसार हज़ारों लोग पकड़े
गये और उन्हें जेलों की तंग अँधेरी सीलनभरी कोठरियों में चार-चार पाँच-पाँच
साल बन्द करके रखा गया। इनमें से तीन सौ व्यक्तियों को तो बहुत दिनों तक बन्दी
रखा गया। इसी प्रकार अन्य अनेकों ने भी मरने की कोशिश की। 193 पर मुक़दमा
चला। अत्यन्त अन्यायकारी न्यायालय ने सामान्य सबूत के आधार पर ही दस-दस
वर्षों की सज़ा सिर्फ़ इस बात के लिए दी कि वे प्रचारक थे। उनमें से नब्बे को
बरी कर दिया और शेष को सात से दस साल तक की सख़्त सज़ाएँ हुईं तथा बाद
में उम्रभर के लिए साइबेरिया की जलावतनी। एक अन्य मुक़दमे में एक महिला
को नौ-दस वर्ष की सख़्त सज़ा मात्र इस आरोप में हुई कि उसने एक मज़दूर को
साम्यवादी विचारधारा का एक परचा दिया था।
इस तरह जुल्म होता देखकर काम पहले से भी अधिक गुप्त और सोच-
समझकर होने लगा। साथ ही प्रतिशोध की भावना भी सक्रिय हो उठी। साधारणतया
एक-आध कमीना खुफ़िया अधिकारी जिसे भी चाहता, पकड़ता और जलावतन
कर देता। इससे उसे तो इनाम मिल जाता लेकिन नौजवानों का जीवन ख़तरे में पड़
जाता।
कहा तो यह जाता है कि 16 अप्रैल, 1899 में जिस काराकोज्फ ने ज़ार पर
गोली चलायी थी, वह भी नाशवादियों का ही काम था। और एक पोलिश नौजवान
बेरेजोज्वस्की भी जिसने अगले वर्ष ज़ार पर पेरिस में गोली चलायी थी, उस पार्टी
अन्तरराष्ट्रीय क्रान्तिकारी आन्दोलन का अध्ययन / 217