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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 216, कुल 788 में से

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पृष्ठ 216

हैं। फिर कभी ठीक उसी तरह के काम होते हैं तो उन्हें शहीद कर दिया जाता है।
विरोधी भी आकर शामिल हो जाते हैं। सरकार तड़पती है। आपस में उनकी
नोक-झोंक होने लगती है। जनता की शर्तें स्वीकारने में बेवजह देर की जाती है
और इन्क़लाब की जंग शुरू हो जाती है। यह विचारों का दृश्य आपके सामने रखा
गया है। पीटर क्रोपोटकिन रूसी युगान्तकारियों में से थे। पकड़े जाने के बाद पीटर
पाल नामक क़िले में बन्दी बनाये गये थे। उस सख़्त जेल में से ये भाग गये और
यूरोप में जाकर अपने विचारों का प्रचार करने लगे। उपरोक्त बातों से पता चलता
है कि उस समय उनकी मनःस्थिति क्या थी।
सबसे पहले उन्होंने बर्न नामक शहर में (फ़्रांस में) मज़दूरों के शासन की
स्थापना वाले दिन की बरसी मनायी। यह बात 18 मार्च, 1876 की है। उस दिन
उन्होंने मज़दूरों का जुलूस निकाला और बाज़ार में पुलिस से हाथापाई भी कर बैठे।
जब सिपाहियों ने उनके लाल झण्डे को उखाड़ने का प्रयास किया, तब बहुत तगड़ा
फ़साद खड़ा हो गया। अनेक सिपाही बुरी तरह घायल हुए। अन्त में ये सभी पकड़े
गये और 10 से 40 दिनों तक क़ैद की सज़ा हुई।
उधर अप्रैल माह में इटली में किसानों को उकसाकर अनेक स्थानों पर बग़ावतें
खड़ी कर दीं। वहाँ भी इनके साथी पकड़े गये, जिनमें से काफ़ी बरी हो गये। उनका
विचार अब इसी तरह से प्रचार का था। इसलिए वे कहा करते थे – Neither
money nor organizations nor literature was needed any longer for (for their
propaganda work). One human being in revolt with torch or dynamite was
off to instruct the world. अर्थात प्रचार-कार्य के लिए न तो धन की आवश्यकता
है, न बड़े पोथों की और न बड़े भारी संगठन की। कोई भी एक आदमी – जिसने
हाथ में मशाल पकड़ी हुई हो, जिससे वह आग लगा सके या डाइनामाइट हो जिससे
वह एक बार मकानों और ऐसे इन्सानों को उड़ा सके – सारी दुनिया को अपनी
इच्छानुसार शिक्षा दे सकता है।
अगले बरस, 1878 से बस ऐसे कामों ने ज़ोर पकड़ लिया। बर्लिन में इटली
का बादशाह हम्बर्ट जब अपनी बेटी के साथ मोटरकार में जा रहा था, तब उसे
मारने का प्रयास किया गया। शहंशाह विलियम को एक साधारण नवयुवक ने गोली
मार दी। तीन हफ़्ते बाद डॉक्टर कार्ल नौर्वालिंग ने एक बार खिड़की में से शहंशाह
पर गोली चला दी। जर्मनी में उस समय ग़रीब मज़दूरों के भाषणों को निर्मम ढंग
से कुचला जा रहा था। उसके बाद एक दिन गोष्ठी करके फ़ैसला लिया गया था
कि जिस प्रकार भी सम्भव हो, इस भ्रष्ट पूँजीवादी वर्ग और उसकी मददगार
सरकार एवं पुलिस आदि को भयभीत किया जाये।
15 दिसम्बर, 1883 को विलीरिड फ्लोडसोर्फ में उलुबैक नाम के कुख्यात
पुलिस अफ़सर को मार डाला गया। 23 जून, 1884 को रुजेट को इसी अपराध
210 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़