भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
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शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
थे लेकिन भाड़े के लिए लड़ने वाले नहीं, बल्कि सिर्फ अपने फ़र्ज़ के लिए या
किसी काम के लिए कहें; वे निष्काम भाव से लड़ते और मरते थे। सिक्ख इतिहास
यही कुछ था, मराठों का आन्दोलन भी यही कुछ बताता है। राणा प्रताप के साथी
राजपूत भी इसी तरह के योद्धा थे। बुन्देलखण्ड के वीर छत्रसाल के साथी भी ऐसे
थे।
ऐसे ही लोगों का एक वर्ग पैदा करने वाले बाबा राम सिंह ने प्रचार और संगठन
शुरू किया। बाबा राम सिंह का जन्म 1824 में लुधियाना ज़िले के भैणी गाँव में
हुआ। आपका जन्म बढ़ई घराने में हुआ। जवानी में महाराजा रणजीत सिंह की सेना
में नौकरी की। ईश्वर-भक्ति अधिक होने से नौकरी-चाकरी छोड़कर गाँव जा रहे।
नाम का प्रचार शुरू कर दिया।
1857 के ग़दर में जो-जो ज़ुल्म हुए, वे सब देखकर और पंजाब की ग़द्दारी
देखकर कुछ असर ज़रूर हुआ होगा। क़िस्सा यह कि बाबा राम सिंह जी ने उपदेश
शुरू करवा दिया। साथ-साथ बताते गये कि 'फिरंगियों' से पंजाब की मुक्ति बहुत
ज़रूरी है। उन्होंने तब उस असहयोग का प्रचार किया, जैसे वर्षों बाद 1920 में
महात्मा गाँधी ने किया। उनके कार्यक्रम में अंग्रेज़ी राज की शिक्षा, नौकरी, अदालतों
आदि का और विदेशी चीज़ों का बहिष्कार तो था ही, साथ में रेल और तार का
भी बहिष्कार किया गया था।
पहले-पहले सिर्फ नाम का ही उपदेश होता था। हाँ, यह ज़रूर कहा जाता था
कि शराब-मांस का प्रयोग बिल्कुल बन्द कर दिया जाये। लड़कियाँ आदि बेचने
जैसी सामाजिक कुरीतियों के ख़िलाफ़ भी प्रचार होता था, लेकिन बाद में उनका
प्रचार पोलिटिकल रंग में रँगा गया।
पंजाब सरकार के पुराने काग़ज़ों में एक स्वामी रामदास का ज़िक्र आता है,
जिसे कि अंग्रेज़ी सरकार एक पोलिटिकल आदमी समझती थी और जिस पर
निगाह रखी जाती थी। 1857 के बाद जल्द ही उसके रूस की ओर जाने का
पता चलता है। बाद में कोई ख़बर नहीं मिलती। उसी आदमी के सम्बन्ध में कहा
जाता है कि उसने एक दिन बाबा राम सिंह से कहा कि अब पंजाब में राजनीतिक
कार्यक्रम और प्रचार की ज़रूरत है। इस समय देश को आज़ाद करवाना बहुत
ज़रूरी है। तब से आपने स्पष्ट रूप से अपने उपदेश में इस असहयोग को शामिल
कर लिया।
1863 में पंजाब सरकार के मुख्य सचिव रहे टी.डी. फार्सिथ ने अपनी
आत्मकथा में लिखा है कि 1863 में ही मैं समझ गया था कि यह धार्मिक-सा
आन्दोलन किसी दिन बड़ा ग़दर मचा देगा। इसीलिए मैंने भैणी के उस गुरुद्वारे में
ज़्यादा आदमियों का आना-जाना और इकट्ठा होना बन्द कर दिया। इस पर बाबा
जी ने भी अपना काम का ढंग बदल लिया। पंजाब प्रान्त को 22 ज़िलों में बाँट
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 157
लिया। प्रत्येक ज़िले में एक-एक व्यक्ति प्रमुख नियत किया गया, जिसे 'सूबा'
कहा जाता था। अब उन्होंने 'सूबों' में प्रचार और संगठन का काम शुरू कर दिया।
गुप्त तरीक़ों से आज़ादी का भी प्रचार जारी रखा। संगठन बढ़ता गया, प्रत्येक
नामधारी सिख अपनी आय का दसवाँ हिस्सा अपने धर्म के लिए देने लगा। बाहर
का हंगामा बन्द हो जाने से सरकार का शक दूर हो गया और 1869 में सभी बन्दिशें
हटा ली गयीं। बन्दिशें हटते ही ख़ूब जोश बढ़ा।
एक दिन कुछ कूके अमृतसर में से जा रहे थे। पता चला कि कुछ कसाई
हिन्दुओं को तंग करने के लिए उनकी आँखों के सामने गोहत्या करते हैं। गाय के
तो वे बड़े भक्त थे। रातों-रात सभी कसाइयों को मार डाला और भैणी का रास्ता
पकड़ा। बहुत-से हिन्दू पकड़े गये। गुरु जी ने पूरी कहानी सुनी। सबको लौटा दिया
कि निर्दोष व्यक्तियों को छुड़ायें और अपना अपराध मान लें। यही हुआ और वे लोग
फाँसी चढ़ गये। ऐसी ही कोई घटना फ़िरोज़पुर ज़िले में भी हो गयी। फाँसियों से
जोश और बढ़ गया। उस समय उन लोगों के सामने आदर्श था पंजाब में सिख-राज
स्थापित करना और गोरक्षा को वे अपना सबसे बड़ा धर्म मानते थे। इसी आदर्श की
पूर्ति के लिए वे प्रयत्न करते रहे।
13 जनवरी, 1872 को भैणी में माघी का मेला लगने वाला था। दूर-दूर से
लोग आ रहे थे। एक कूका मलेर कोटला से गुज़र रहा था। एक मुसलमान से झगड़ा
हो जाने से वे उसे पकड़कर कोतवाली में ले गये और उसे बहुत मारा-पीटा व एक
बैल की हत्या उसके सामने की गयी। वह बेचारा दुखी हुआ, भैणी पहुँचा। वहाँ
जाकर उसने अपनी व्यथा सुनायी। लोगों को बहुत जोश आ गया। बदला लेने का
विचार ज़ोर पकड़ गया। जिस विद्रोह का भीतर ही भीतर प्रचार किया गया था, उसे
कर देने का विचार ज़ोर पकड़ने लगा, लेकिन अभी मनचाही तैयारी भी नहीं हुई
थी। बाबा राम सिंह ऐसी स्थिति में क्या करते? यदि उन्हें मना करते हैं तो वे मानते
नहीं और यदि उनका साथ देते हैं तो सारा किया-धरा तबाह होता है। क्या करें?
आख़िर जब 150 आदमी चल ही पड़े तो आपने पुलिस को ख़बर भेज दी कि ये
व्यक्ति हंगामा कर रहे हैं और शायद कुछ ख़राबी करें, मैं ज़िम्मेदार नहीं हूँ। ख़याल
था कि हज़ारों आदमियों के संगठन में से सौ-डेढ़ सौ आदमी मारे गये (जायें) और
बाक़ी संगठन बचा रहा तो यह कमी तो फिर पूरी हो जायेगी और जल्द ही फिर
पूरी तैयारी होने से विद्रोह हो सकेगा। लेकिन हम यह देखते हैं कि दुनिया में 'end
Justifies the means' (परिणाम से ही तय होता है कि तरीक़े जायज़ थे या
नाजायज़) का सिद्धान्त राजनीति के मैदान में प्रायः लागू होता है। अर्थात यदि
सफलता मिल जाये तब तो चालें नेकनियती से भरी और सोच-समझकर चली गयी
कहलाती हैं और यदि कभी मिले असफलता तो बस फिर कुछ भी नहीं। नेताओं
को बेवकूफ़, बदनीयत आदि ख़िताब मिलते हैं। यही बात हम देखते हैं। जो चाल
158 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
बाबा राम सिंह ने अपने आन्दोलन से बचने के लिए चली, वह क्योंकि सफल नहीं
हुई, इसीलिए अब कोई उन्हें कायर और बुज़दिल कहता है और कोई बदनीयत व
कमज़ोर बताता है। ख़ैर।
हम तो समझते हैं कि वह राजनीति की एक चाल थी। उन्होंने पुलिस को
ख़बर कर दी ताकि वे कोई ऐसा इलाज कर लें जिससे कोई बड़ी ख़राबी पैदा न
हो, लेकिन सरकार उनके इस बड़े भारी आन्दोलन से बहुत डरती थी और उसे
पीस देने का अवसर खोज रही थी। उसने कोई ख़ास कार्यवाही न की और उन्हें
मर्ज़ी अनुसार जाने दिया।
लेकिन 11 जनवरी के पत्र में डिप्टी कमिश्नर लुधियाना मि. कावन ने यह
बात कमिश्नर को लिख भेजी कि राम सिंह ने उन लोगों से अपने सम्बन्ध न होने
की बात ज़ाहिर की है और उनके सम्बन्ध में हमें सावधान भी कर दिया है। ख़ैर!
वे 150 नामधारी सिंह बड़े जोश-ख़रोश में चल पड़े।
जब वे 150 व्यक्ति वहाँ से बदला लेने के विचार से चल पड़े, तो पुलिस
को पहले से बताया जा चुका था, लेकिन सरकार ने कोई इन्तज़ाम नहीं किया।
क्यों? क्योंकि वे चाहते थे कि कोई छोटी-मोटी गड़बड़ हो जाये और बहाना मिल
जाये, जिससे कि वे उस आन्दोलन को पीस दें। सो वह अब मिल गया।
वे कूके वीर उस दिन तो पटियाला राज्य की सीमा पर एक गाँव रब्बों में
पड़े रहे। अगले दिन भी वे वहीं टिके रहे। 14 जनवरी, 1872 की शाम को
उन्होंने मलोध के क़िले पर धावा बोल दिया। यह क़िला कुछ सिख सरदारों का
था, लेकिन इन्होंने इस पर हमला क्यों किया? इस सम्बन्ध में डिस्ट्रिक्ट गजेटियर
में लिखा है कि उन्हें उम्मीद थी कि मलोध सरकार उनके विद्रोह की नेता
बनेगी, लेकिन उन्होंने मना कर दिया और इन्होंने हमला कर दिया। बहुत सम्भव
है कि बाबा राम सिंह की बड़ी भारी तैयारी में मलोध सरकार ने मदद देने का
वायदा किया हो, लेकिन जब उन्होंने देखा कि विद्रोह तो पहले ही हो गया है
और बाबा राम सिंह भी साथ नहीं हैं और पूरी संगत भी नहीं बुलायी गयी है
तो उन्होंने मना कर दिया होगा। ख़ैर! जो भी हो, वहाँ लड़ाई हुई। कुछ घोड़े,
हथियार और तोपें ले वे वहाँ से चले गये। दोनों ओर के दो-दो आदमी मारे गये
और कुछ घायल हुए।
अगले दिन सवेरे 7 बजे वे मलेर कोटला पहुँच गये। अंग्रेज़ी सरकार ने मलेर
कोटला सरकार को पहले ही सूचित कर रखा था। उधर बड़ी तैयारियाँ की गयी
थीं। सेना हथियार लिये खड़ी थी, लेकिन इन लोगों ने इतनी बहादुरी से हमला
किया कि सेना और पुलिस के कुछ वश में न रहा। हमला कर वे शहर में घुस
गये और जाकर महल पर हमला कर दिया। वहाँ भी सेना उन्हें रोक न सकी। वे
जाकर ख़ज़ाना लूटने की कोशिश करने लगे। लूट ही लिया जाता, लेकिन दुर्भाग्य
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 159
से वे एक और दरवाज़ा तोड़ते रहे, जिससे कि उनका बहुत-सा समय नष्ट हो गया
और भीतर से कुछ भी न मिला।
उधर से सेना ने बड़े ज़ोर से धावा बोला। आख़िर लड़ते-लड़ते वहाँ से लौटना
पड़ा। उस लड़ाई में उन्होंने 8 सिपाही मारे और 15 को घायल किया। उनके सात
आदमी मारे गये। वहाँ से भी कुछ हथियार और घोड़े लेकर भाग निकले। आगे-आगे
वे और पीछे-पीछे मलेर कोटला की सेना और –
"A sort of running fight was kept along. Shots fired and many more
Kookas were wounded till both the parties reached the village of Rur in
the Patiala State, the Kookas carrying most of the wounded with them."
यानी भागते जा रहे थे। और लड़ते जा रहे थे। उनके और कई आदमी घायल
हो गये और वे उन्हें भी साथ ही उठा ले जाते थे। आख़िर पटियाला राज्य के रूड़
गाँव में ये पहुँचे और जंगल में छिप गये। कुछ घण्टों के बाद शिवपुर के नाज़िम
ने फिर हमला बोल दिया। लड़ाई छिड़ गयी पर बेचारे कूके थके-हारे थे। आख़िर
68 व्यक्ति पकड़ लिये गये। उनमें से दो औरतें थीं, वे पटियाला राज को दे दी
गयीं।
इसी बात को विद्रोह कहा जाता है। डिप्टी कमिश्नर लुधियाना मि. कावन ने
एक पत्र में कहा था –
"It looks like the commencement of an insurrection..."
यानी यह एक विद्रोह की तरह नज़र आता है।
अगले दिन मलेर कोटला लाकर तोप गाड़ दी गयी और एक-एक कर 50
कूके वीर तोप के आगे बाँध-बाँधकर उड़ा दिये गये। हरेक बहादुरी से
अपनी-अपनी बारी पर तोप के आगे झुक जाता और सत्त श्री अकाल कहता हुआ
तोप से उड़ जाता। फिर कुछ पता नहीं चलता कि वह किस संसार में चला गया।
इस तरह 49 व्यक्ति उड़ा दिये गये। पचासवाँ एक तेरह वर्ष का लड़का था। उसके
पास झुककर डिप्टी कमिश्नर ने कहा कि बेवकूफ़ राम सिंह का साथ छोड़ दे,
तुम्हें माफ़ कर दिया जायेगा। लेकिन वह बालक यह बात सहन नहीं कर सका और
उछलकर उसने कावन की दाढ़ी पकड़ ली और तब तक न छोड़ी जब तक उसके
दोनों हाथ न काट दिये गये। बाक़ी 16 आदमी अगले दिन मलोध जाकर फाँसी
पर लटका दिये गये। उधर बाबा राम सिंह को उनके चार सूबों के साथ गिरफ़्तार
करके पहले इलाहाबाद और बाद में रंगून भेज दिया गया। यह गिरफ़्तारी (रेगूलेशन)
1818 के अनुसार हुई थी।
जब यह ख़बर देश में फैली तो और लोग बहुत हैरान हुए कि यह क्या बना।
विद्रोह शुरू करके बाबाजी ने हमें भी क्यों न बुलाया और सैकड़ों लोग घर-बार
छोड़कर भैणी की ओर चल पड़े। एक गिरोह जिसमें कि 172 आदमी थे, कर्नल
160 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
बायली से मिला। वह अधीक्षक था। उसने झट उन्हें गिरफ़्तार करवा लिया। उनमें
से 120 को तो घरों को लौटा दिया, लेकिन 50 ऐसे थे जिनका कोई घरबार नहीं
था। वे सब सम्पत्ति आदि बेच-बाचकर लड़ने-मरने के लिए तैयार होकर निकले
थे। उन्हें जेल में डाल दिया गया। इस तरह वह आन्दोलन दबा दिया गया और बाबा
राम सिंह का पूरा यत्न निष्फल हो गया। बाद में देश में जितने कूके थे, वे सभी
एक तरह से नज़रबन्द कर दिये गये। उनकी हाज़िरी ली जाती थी। भैणी साहिब
में आम लोगों का आना-जाना बन्द कर दिया गया। ये बन्दिशें 1920 में आकर
हटायी गयीं।
यही पंजाब की आज़ादी के लिए दी गयी सबसे पहली कोशिश का संक्षिप्त
इतिहास है।
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 161
सम्पादक 'महारथी' के नाम पत्र
शहनशाही कुटिया
सूत मण्डी, लाहौर
27.2.1928
सम्पादक जी, सादर वन्दे!
आपका 17.2.1928 का कृपा पत्र व 'महारथी' के फ़रवरी अंक की एक प्रति
भी समय से मिल गयी थी। इसके लिए मेरा हृदय से आभार स्वीकार करें। आपने
गुरु राम सिंह जी का तीन रंगों वाले चित्र का फ़ोटो बनवाया या नहीं। मुझे यहाँ
पता लगा कि फ़ोटो तो कम से कम आपने अभी प्रकाशित नहीं किया। मैं समझता
हूँ कि चित्रों के बग़ैर इन लेखों की महानता कम हो जाती है। बाक़ी, लेख जो जल्दी
ही आपकी सेवा में भेजूँगा, सचित्र ही छपने चाहिए। बहुतों के तो ब्लॉक बने हुए
ही मिल सकेंगे। उनका डाक ख़र्च व कुछ माया ही देनी होगी। यदि आप उचित
समझो तो लिखें, मैं प्रबन्ध करवा दूँगा। अभी गुरु राम सिंह जी की एक और फ़ोटो
भेज रहा हूँ। एक सज्जन कह रहे थे कि ब्लॉक उनके पास है। यदि आप चाहो
तो वे भी छपवाकर भेज सकते हैं। कृपा करके यह लिखें कि कितनी फ़ोटोज़ की
ज़रूरत होगी। यह तो 'महारथी' की कुल संख्या पर निर्भर करता है।
लेख पर लेख पड़े हुए हैं किन्तु यहाँ राष्ट्रीय सप्ताह कर शहीदी दिवस मनाने
का प्रबन्ध किया जा रहा है। इसलिए तब तक यदि लेख न भेज सका तो कृपया
क्षमा कर दीजियेगा। हो सका तो पहला लेख एक सप्ताह तक भेज दूँगा। 'महारथी'
का अगला अंक कितने दिनों तक छप जायेगा? लेख और फ़ोटो कब तक पहुँच
जाने चाहिए? लिखें ज़रूर। जवाब जल्द देकर आभारी बनायें।
निवेदक
भगतसिंह
162 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
चित्र-परिचय
मार्च, 1928 के 'महारथी' में कूका आन्दोलन पर एक लेख छपा था। उसी
के साथ दो चित्रों का चित्र-परिचय भगतसिंह ने लिखा था। यह परिचय 'महारथी'
से लिया गया है। – स.
इस बार बहुरंग चित्र गुरु राम सिंह जी का है। उनका परिचय विस्तारपूर्वक गत अंक
और इस अंक में दिया जा चुका है। वही पर्याप्त है। हाँ, विशेष उल्लेखनीय दो रंगीन
चित्र हैं। एक तो इटली के नवयुवकों का – प्रत्येक बालक मुसोलिनी बनने का
प्रयत्न कर रहा है। भारत में भी चार दिन के लिए स्काउट दल, महावीर दल और
स्वयं-सेवक दल बने थे, अखाड़े स्थापित हुए थे परन्तु वह सब दूध का उफान
रहा। नेताओं को चाहिए कि कौंसिलों में स्पीचें झाड़ने की अपेक्षा इन भावी नेताओं
को कुछ बनायें।
दूसरा चित्र हुनर-नगर का है जो एक विशेष (आयोजन के) रूप में बम्बई में
हुआ था। हमें विस्मय होता है, जब हम इस विशाल हुनर-नगर की और गरीब, गँवार
कारीगरों की दशा की तुलना करते हैं। इन हुनर-प्रदर्शनियों पर जितना रुपया उजाड़ा
जाता है उसका शतांश भी तो कारीगरी की वास्तविक उन्नति में नहीं लगाया जाता।
हम पूछते हैं – कितने कारीगरों को धन एवं अधिकार से सहायता देकर समाज
अथवा सरकार अपना काम बढ़ाने का अवसर देती है? कितने मुहल्लों, बाज़ारों,
नगरों अथवा शहरों में हुनर-शालाएँ खोली जा रही हैं? कितने कारीगरों की
प्रतियोगिता करायी जाती है? और कितने नवयुवकों को भिन्न-भिन्न हुनर सीखने
की छात्रवृत्ति देकर हुनर सीखने को प्रोत्साहित किया जाता है? हिन्दू सभाएँ और
कांग्रेस मण्डल खोलने की अपेक्षा हुनर-शालाएँ स्थापित करने में हमें अपनी सब
शक्तियों को लगा देना चाहिए। कारीगरी ही हमको बेकारी, पराधीनता और निर्धनता
से बचा सकती है।
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 163
श्री मदनलाल ढींगरा
शहीद भगतसिंह ने 'किरती' में मार्च, 1928 से अक्टूबर 1928 तक 'आज़ादी
की भेंट शहादत' शीर्षक से एक लेखमाला लिखी। अगस्त, 1928 के 'किरती' में
इस लेखमाला का उद्देश्य इस रूप में बताया गया - "हमारा इरादा है कि उन
जीवनियों को उसी तरह छापते हुए भी उनके आन्दोलनों का क्रमशः हाल लिखें ताकि
हमारे पाठक यह समझ सकें कि पंजाब में जागृति कैसे पैदा हुई और फिर काम कैसे
होता रहा और किन कामों के लिए, किन विचारों के लिए उन शहीदों ने अपने प्राण
तक अर्पित कर दिये।" - स.
अब फिर यह बताने की ज़रूरत नहीं कि भारतवर्ष की आज़ादी के लिए जितनी
कुर्बानी पंजाब प्रान्त ने की है, उतनी किसी और प्रान्त ने नहीं की। बीसवीं सदी
के शुरू होने के साथ ही भारत में एक बार नयी अशान्ति की लहर दौड़ गयी,
जिसका परिणाम स्वदेशी-आन्दोलन की शक्ल में प्रकट हुआ। तब भी पंजाब ही
बंगाल का साथ दे सका था। गुलामी की ज़ंजीरें दिनोदिन जकड़ी देखकर जब दर्द
शुरू हुआ तब बहुत-से नौजवान अपने देशप्रेम में पागल हुए दिलों को केवल
लेक्चरबाज़ी और प्रस्तावबाज़ी-मात्र से सन्तोष न दे सके और कुछ दिल-जले लोगों
ने युग पलट आन्दोलन चलाया। यह आन्दोलन उन देशप्रेमी युवकों को अपनी ओर
खींचने में सफल हो गया और इन परवानों ने स्वतन्त्रता देवी के चरणों में अपने
जीवन तक बलिदान कर दिये और मुर्दा देश को फिर मृत्यु के प्रति निर्भयता
दिखाकर पुराने बुजुर्गों की याद ताज़ा कर दी।
यह युग पलटने वाले या विद्रोही लोग कैसे विचित्र होते हैं, इसका कुछ वर्णन
बंगाल के विद्रोही कवि नज़रुल इस्लाम ने अपनी 'विद्रोही' कविता में किया है।
मौत के हाथ में हाथ डालकर खेल करने वाले, ग़रीबों के सहायक, आज़ादी के
रक्षक, गुलामी के दुश्मन, ज़ालिमों, अत्याचारियों और मनमानी करने वाले शासकों
के शत्रु इन विद्रोही वीरों के दिल का, मन का, स्वभाव का, इच्छा का बड़ा सुन्दर
चित्र उन्होंने अपनी कविता में खींचा है। पहले ही वे कहते हैं -
बोलो बीर -
चिर उन्नत मम शीर
164 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
शिर नेहारि आमारि
नत शिर ओई शिखर हिमाद्रीय!
यानी हे विद्रोही वीर! तुम एकदम यह कहते हो कि मैं कब से सिर उठाये
खड़ा हूँ। मेरा ऊँचा सिर देखकर हिमालय ने भी अपना सिर शर्म के मारे झुका दिया।
आगे जाकर उसकी सख़्ती और नरमी का वर्णन किया है। कहीं वह मौत से
(के साथ) नाच कर रहा है, कहीं वह संसार का एक ही बार सर्वनाश करने पर
तुला हुआ है। वह बिजली की तरह चमकता है। वह संगीत की तरह मीठा है।
विधवा, गुलाम, मज़लूम, ग़रीब, भूखे और पीड़ित लोगों में बैठकर वह लगातार रोता
रहता है। ऐसे विचित्र जीव की विचित्र महिमा का वर्णन करते हुए अन्त में वे
विद्रोही के मुँह से कहलवाते हैं –
महा विद्रोही रणक्लान्त
आमि शेई दिन हँबो शान्त,
जबे उत्पीडि़तेर क्रन्दन-रोल
आकाशे बातासे ध्वनिबे ना
अत्याचारीर खड्ग कृपाण
भीम रणभूमे रणिबे ना
विद्रोही रणक्लान्त
आमि शेई दिन हँबो शान्त!
अर्थात्, मैं विद्रोही अब लड़ाई से थक गया हूँ। और मैं भी उसी दिन शान्त
हो जाऊँगा जिस दिन किसी दुखी की आह या चीत्कार आकाश में जाकर आग
न लगा सकेगा, यानी कोई दुखी न रहेगा, और जब ज़ालिमों, अत्याचारियों की
भयानक तलवार मैदान में चलनी बन्द हो जायेगी, यानी बाक़ी ही न रहेंगी, तब,
और तभी मैं शान्त हो सकूँगा और हो भी जाऊँगा।
ऐसे विचित्र विद्रोही जीव जो पूरे विश्व से टकरा जाते हैं और स्वयं को जलती
आग में झोक देते हैं, अपना ऐशो-आराम सब भूल जाते हैं और दुनिया की सुन्दरता,
श्रृंगार में कुछ वृद्धि कर देते हैं और उनके बलिदानों से ही विश्व में कुछ प्रगति होती
है। ऐसे ही वीर हर देश में हर समय होते हैं। हिन्दुस्तान में भी यही पूजनीय देवते
जन्म लेते रहे हैं, ले रहे हैं और लेते रहेंगे। हिन्दुस्तान में से भी पंजाब ने ऐसे रत्न
अधिक दिये हैं, बीसवीं शती के ऐसे ही सबसे पहले शहीद श्री मदनलाल जी
ढींगरा हैं।
वे कोई लीडर तो थे नहीं कि उनके जीते-जी उनका जीवन-चरित्र छापकर
दो-दो आने में बिक जाता। वे अवतार भी नहीं थे कि ज्योतिष से बताकर शोर मचा
दिया जाता कि हम तो पहले ही समझ गये थे कि वे बहुत ‘बड़े’ आदमी थे। उनकी
किन्हीं ऐसी बातों का भी हमें पता नहीं कि हम लिख सकें कि ‘होनहार बिरवान
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 165
के होत चीकने पात।'
वह ग़रीब और एक बदक़िस्मत विद्रोही था। उसके पिता ने उसे अपना पुत्र
मानने से इन्कार कर दिया था। देशभक्त और खुशामदी सभी अख़बारों में और उस
समय के गर्म नेता बिपिनचन्द्र पाल तक ने उन्हें कोस-कोसकर गालियाँ दीं। तो
फिर बताओ इन हालात में, आज बीस साल बाद उनके बारे में तथ्यों को फिर से
इकट्ठा करने की कोशिश में किसी को कितनी सफलता मिल पायेगी?
इन कठिनाइयों में हम आज उनका जीवन-वृतान्त लिखने बैठ गये हैं।
धीरे-धीरे हम लोग, उनका नाम भी न भूल जायें, यही सोचकर आज उनके बारे
में जैसे भी तथ्य मिल सकते हैं, यह वृतान्त पाठकों के सामने रख रहे हैं।
आप शायद अमृतसर के रहने वाले थे। घर से अच्छे थे। बी.ए. पास कर पढ़ने
के लिए इंग्लैण्ड चले गये। कहा जाता है कि वहाँ आप कुछ अय्याशी में फँस गये।
यह बात यक़ीन से नहीं कही जा सकती, लेकिन यह कोई अनहोनी बात भी नहीं
है। उनका मन बड़ा रसिक व भावुक था, इस बात का प्रमाण भी मिलता है।
इंग्लैण्ड के ख़ुफ़िया विभाग (Scotland Yard) के एक प्रसिद्ध जासूस श्री ई.टी.
वुडहॉल ने (Union Jack) यूनियन जैक नामक साप्ताहिक अख़बार में अपनी डायरी
छापी थी। मार्च, 1925 के अंक में उन्होंने श्री मदनलाल ढींगरा का हाल लिखा
है। यह जासूस उनके पीछे लगाया गया था। वह लिखता है —
"Dhingra was an extraordinary man. Dhingra's passion for flowers
was remarkable."
यानी ढींगरा एक असाधारण व्यक्ति था। ढींगरा का फूलों के प्रति ज़बरदस्त
लगाव था। आगे जाकर उन्होंने लिखा है कि वे बाग़ के किसी सुन्दर कोने में जाकर
बैठ जाते थे और घण्टों तक फूलों को एक कवि की तरह मस्त होकर निहारते रहते
और कभी उनकी आँखों से बड़ी तेज़ चमक कौंध उठती थी। उसी चमक को
देखकर ई.टी. वुडहॉल उस्ताद सिकलाहिन आगे लिखता है —
"There is a man to keep an eye on. He will do something desperate
someday."
यानी उस व्यक्ति पर आँख रखनी चाहिए। किसी न किसी दिन वह कुछ
धमाका करेगा। ख़ैर।
हम बात कर रहे थे कि वे शायद अय्याशी में फँस गये। उस कहानी के आगे
यों कि फिर स्वदेशी आन्दोलन का असर इंग्लैण्ड तक भी पहुँचा और जाते ही
श्री सावरकर ने इण्डियन हाउस नामक सभा खोल दी। मदनलाल भी उसके सदस्य
बने।
इधर हिन्दुस्तान में खुले आन्दोलन को दबाने के कारण युग-पलट लोगों ने
ख़ुफ़िया सोसाइटियाँ स्थापित कर लीं। यहाँ तक कि 1908 में अलीपुर की साज़िश
166 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
का मुक़दमा बन गया। श्री कन्हाई और श्री सतेन्द्रनाथ को फाँसी मिल गयी। धीरेन्द्र
और उल्लासकर दत्त को भी उसी समय फाँसी की सज़ा सुनायी गयी थी। ये ख़बरें
इंग्लैण्ड में भी पहुँचीं और इन गरम नौजवानों में आग लग गयी। वे कहते हैं कि
एक दिन रात को श्री सावरकर और मदनलाल ढींगरा बहुत देर तक मशवरा करते
रहे। अपनी जान तक दे देने की हिम्मत दिखाने की परीक्षा में मदनलाल को ज़मीन
पर हाथ रखने के लिए कहकर सावरकर ने हाथ पर सुआ गाड़ दिया, लेकिन
पंजाबी वीर ने आह तक न भरी। सुआ निकाल लिया गया। दोनों की आँखों में आँसू
भर आये। दोनों एक-दूसरे के गले लग गये। आहा, वह समय कैसा सुन्दर था! वह
अश्रु कितने अमूल्य व अलभ्य थे। वह मिलाप कितना सुन्दर, कितना महिमामय
था! हम दुनियादार क्या जानें, मौत के विचार तक से डरने वाले हम कायर लोग
क्या जानें कि देश की ख़ातिर क़ौम के लिए प्राण दे देने वाले वे लोग कितने ऊँचे,
कितने पवित्र और कितने पूजनीय होते हैं।
अगले दिन से ढींगरा फिर इण्डियन हाउस, सावरकर वाली सभा में नहीं गये
और भारतीय विद्यार्थियों और विशेष खुफ़िया पुलिस का प्रबन्ध करने वाले और
उनकी छोटी-मोटी आज़ादी को कुचलने वाले सर कर्जन बायली, जोकि
Secretary of State for India के एड-डी-कांप Aid-de-Camp थे, द्वारा चलायी
हिन्दुस्तानी विद्यार्थियों की सभा में जा शामिल हुए। यह देखकर इण्डियन हाउस
वाले लड़कों को बड़ा जोश आया और उन्होंने उन्हें देशघातक, देशद्रोही तक कहना
शुरू कर दिया, लेकिन उनका गुस्सा भी तो सावरकर ने यह कहकर शान्त किया
कि आख़िर उन्होंने हमारी सभा को चलाने के लिए भी तो सर तोड़ प्रयत्न किया
था और उनकी मेहनत के फलस्वरूप ही हमारी सभा चल रही है, इसलिए हमें
उनका धन्यवाद करना चाहिए। ख़ैर। कुछ दिन तो चुपचाप गुज़र गये।
1 जुलाई, 1909 को इम्पीरियल इंस्टीच्यूट के जहाँगीर हॉल में एक बैठक
थी। सर कर्जन बायली भी वहाँ गये हुए थे। वे दो और लोगों से बातें कर रहे थे
कि अचानक ढींगरा ने पिस्तौल निकालकर उनके मुँह की ओर तान दीं। कर्जन
साहिब की डर के मारे चीख़ निकल गयी, लेकिन कोई इन्तज़ाम होने से पहले
ही मदनलाल ने दो गोलियाँ उनके सीने में मारकर उन्हें सदा की नींद सुला
दिया। फिर कुछ संघर्ष के बाद वे पकड़े गये। बस फिर क्या था, दुनियाभर में
सनसनी मच गयी। सब लोग उन्हें जी-भरकर गालियाँ देने लगे। उनके पिता ने
पंजाब से तार भेजकर कहा कि ऐसे बाग़ी, विद्रोही और हत्यारे आदमी को मैं
अपना पुत्र मानने से इन्कार करता हूँ। भारतवासियों ने बड़ी बैठकें कीं। बड़े-बड़े
भाषण हुए। बड़े-बड़े प्रस्ताव पास हुए। सब उनकी निन्दा में। पर उस समय भी
एक सावरकर वीर थे, जिन्होंने खुल्लमखुल्ला उनका पक्ष लिया। पहले तो उनके
ख़िलाफ़ प्रस्ताव न पास होने देने के लिए यह बहाना पेश किया कि अभी तक
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 167
उन पर मुक़दमा चल रहा है और हम उन्हें दोषी नहीं कह सकते। आख़िर में जब
इस प्रस्ताव पर वोट लेने लगे तो सभा के अध्यक्ष श्री बिपिनचन्द्र पाल यह कह
ही रहे थे कि क्या यह सभी की सर्वसम्मति से पास समझा जाये, तो सावरकर
साहब उठ खड़े हुए और आपने व्याख्यान शुरू कर दिया। इतने में ही एक अंग्रेज़
ने इनके मुँह पर घूँसा मार दिया और कहा – "Look! how straight the
English fist goes." एक, हिन्दुस्तानी नौजवान ने उस अंग्रेज़ के सिर पर एक
लाठी जड़ दी और कहा – "Look! how straight the Indian club goes!"
यानी, “देखा, यारों का हिन्दुस्तानी डण्डा कैसे ठिकाने पर पड़ता है!” शोर मच
गया। बैठक बीच में ही छूट गयी। प्रस्ताव भी ऐसे ही रह गया। ख़ैर।
मुक़दमा चल रहा था। मदनलाल बड़े खुश थे। बड़े शान्त थे। सामने दर पर
मौत खड़ी देखकर भी वे मुस्कुरा रहे थे। वे निर्भय थे। आहा! वे वीर विद्रोही थे।
आपने अन्त में जो बयान दिया वह आपकी नेक-दिली, आपकी देशभक्ति और
योग्यता का बड़ा भारी सबूत है। हम उनके ही शब्दों में देते हैं। यह 12 अगस्त के
'Daily News' (डेली न्यूज़) में छपा था –
"I admit the other day, I attempted to shed blood as an humble
revenge for the inhuman hangings and deportations of patriotic Indian
youth. In the attempt I have consulted none but my own conscience, I
have conspired with none but my duty."
"I believe that a nation held down by foreign bayonet is in a per-
petual state of war. Since open battle is rendered impossible to disarmed
races, I attacked by surprise, since guns were denied to me I drew forth
my pistol and fired."
"As an Hindu, I fell that wrong to my country is insult to God. Her
cause is the cause of Shri Rama, her service is the service of Shri Krishna.
Poor in wealth and intellect, a son like myself has nothing else to offer
but his own blood, and so I have sacrificed the same on her altar."
"The only lesson required in India at present is to learn how to die,
and the only way to teach it is by dying ourselves. Therefore I die and
I glory in my martyrdom."
"This war will continue, as long as the Hindu and English races last
if this present unnatural relation does not cease."
My only prayer to God is—"May I be reborn of the same mother
and may I redie in the same sacred casue, till the cause is successful,
and she stands free for the good of humanity and to the glory of God,—
Bande Matram."
अर्थात, मैं मानता हूँ कि मैंने उस दिन एक अंग्रेज़ का ख़ून किया और कहता
168 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
हूँ कि यह उन निर्दयता भरी सज़ाओं का मामूली-सा बदला है जोकि हिन्दुस्तानी
देशभक्त नौजवानों को फाँसी और कालेपानी की दी गयी हैं। मैंने इस काम में अपने
ज़मीर के सिवा किसी और की सलाह नहीं ली। अपने फ़र्ज़ के सिवाय किसी से
साज़िश नहीं की।
मेरा यह विश्वास है कि एक राष्ट्र, जिसे विदेशी लोगों ने बन्दूकों से दबाया
हो, वह हमेशा युद्ध की स्थिति में होता है और चूँकि हथियार छीनकर खुली
लड़ाई असम्भव बना दी जाती है, मैंने छिपकर बिना बताये हमला किया है।
क्योंकि हमें बन्दूकें रखने से मना किया जाता है, इसीलिए मैंने पिस्तौल खींच
लिया और चला दिया।
मैं एक हिन्दू के रूप में समझता हूँ कि मेरे देश के साथ किया गया अन्याय
ईश्वर का अपमान है, क्योंकि देश की पूजा श्री रामचन्द्र जी की पूजा है और देश
की सेवा श्रीकृष्ण जी की सेवा है।
एक ग़रीब और मूर्ख, मेरे जैसे नौजवान के पास अपनी माता की सेवा में भेंट
करने के लिए अपने रक्त के सिवाय और क्या हो सकता है? सो मैंने अपना रक्त
माता के चरणों में चढ़ाया है।
इस समय यदि हिन्दुस्तान को किसी सबक की ज़रूरत है तो यह कि मरना
कैसे चाहिए। और इसे सिखाने का तरीक़ा है कि हम खुद मरकर दिखायें। इसीलिए
मैं मर रहा हूँ। इसीलिए मुबारक हो शहीदाना मौत।
यह लड़ाई तब तक जारी रहेगी जब तक हिन्दुस्तानी और अंग्रेज़ दो राष्ट्र रहेंगे
और इनका यह अस्वाभाविक गठबन्धन बना रहेगा। मेरी ईश्वर के आगे यही प्रार्थना
है कि मैं फिर इसी माँ की गोद से जन्म लूँ और जब तक वह स्वतन्त्र न हो जाये
और मानव-समाज की पूर्ण सेवा और उन्नति योग्य न बन जाये, मैं यहीं जन्मता
रहूँ और मरता रहूँ।
– वन्देमातरम्!
16 अगस्त, 1909 का दिन भी इतिहास में याद रहेगा। उस दिन इंग्लैण्ड में
हिन्दुस्तानी युग-पलट पार्टी की आवाज़ गूँजाने वाला ढींगरा वीर अपनी मतवाली
चाल चलता हुआ तख़्ते पर जा चढ़ा था। श्रीमती एग्निस स्मेडले एक जगह इस
घटना का ज़िक्र करती हुई लिखती हैं –
"He walked to the scaffold with his head high and shook off hands
of those who offered to support him, saying that he was not afraid of
death."
आहा! सहारा देकर ले जाने वाले व्यक्तियों के हाथ पीछे झटककर वह कहने
लगा, 'मैं मौत से नहीं डरता'। आहा! धन्य हैं मृत्युंजय!
"As he stood on the scaffold he was asked if he had a last word
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 169
to say. He answered,—Bande Matram."
माँ से इतना प्यार! फाँसी के तख़्ते पर खड़े हुए से पूछा जाता है – कुछ कहना
चाहते हो? तो उत्तर मिलता है, 'वन्देमातरम!' माँ! भारत माँ! तुम्हें नमस्कार! वह
वीर फाँसी पर लटक गया और उनकी लाश भी भीतर ही दफ़ना दी गयी और
हिन्दुस्तानियों को उनकी दाह-क्रिया आदि कराने की इजाज़त नहीं दी गयी। धन्य
था वह वीर! धन्य है उसकी याद! मुर्दा देश के अमूल्य हीरे को बारम्बार नमस्कार!
मार्च, 1928 किरती
170 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
दस मई का शुभ दिन
अप्रैल, 1928 में 'किरती' के 1857 के ग़दर सम्बन्धी अंक में '10 मई का
शुभ दिन' नाम से लेख छपा। इसके लेखक का नाम तो नहीं दिया गया, लेकिन यह
शहीद भगतसिंह के साथियों का ही लेख है। सम्भवतः भगवतीचरण वोहरा का। वे
बहुत अच्छे लेखक थे और 'किरती' से गहरे रूप में जुड़े हुए थे। मार्च, 1925 से
लेकर जुलाई 1928 तक भगतसिंह ने 'किरती' के सम्पादकीय विभाग में बहुत ही
लगन से काम किया था। यह लेख उसी समय छपा था। – स.
“ओ दर्दवाले दिल, दर्द हों चाहे हज़ार
दस मई का दिन भुलाना नहीं,
इसी रोज़ छिड़ी 'आज़ादी की जंग'
वक़्त खुशी का ग़मी लाना नहीं।”
दस मई वह शुभ दिन है जिस दिन कि 'आज़ादी की जंग' शुरू हुई थी।
भारतवासियों का गुलामी की ज़ंजीरें तोड़ने के लिए यह प्रथम प्रयास था। यह प्रयास
भारत के दुर्भाग्य से सफल नहीं हुआ, इसीलिए हमारे दुश्मन इस 'आज़ादी की जंग'
को 'ग़दर' और बग़ावत के नाम से याद करते हैं और इस 'आज़ादी की जंग' में
लड़ने वाले नायकों को कई तरह की गालियाँ देते हैं। विश्व के इतिहास में ऐसी
कई घटनाएँ मिलती हैं, जहाँ आज़ादी की जंग को कई बुरे शब्दों में याद किया जाता
है। कारण यही है कि वह जंग जीती न जा सकी। यदि विजय हासिल होती तो
उन जंगों के नायकों को बुरा-भला न कहा जाता, बल्कि वे विश्व के महापुरुषों
में माने जाते और संसार उनकी पूजा करता।
आज दुनिया गैरीबाल्डी और वाशिंगटन की क्यों बढ़ाई व इज़्ज़त करती है,
इसलिए कि उन्होंने आज़ादी की जंग लड़ी और उसमें सफल हुए। यदि वे सफल
न होते तो वे भी 'बाग़ी' और 'ग़दरी' आदि भद्दे शब्दों में याद किये जाते। लेकिन
वे सफल हुए, इसलिए वे महापुरुषों में माने जाने लगे। इसी तरह यदि 1857 की
आज़ादी की जंग में ताँत्या टोपे, नाना साहिब, झाँसी की महारानी, कुमार सिंह
(कुँवर सिंह), और मौलवी अहमद साहिब आदि वीर जीत हासिल कर लेते तो
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 171
आज वे हिन्दुस्तान की आज़ादी के देवता माने जाते और सारे हिन्दुस्तान में उनके
सम्मान में राष्ट्रीय त्यौहार मनाया जाता।
हिन्दुस्तान के मौजूदा इतिहासों को, जोकि हमारे हाथों में दिये जाते हैं, पढ़कर
हिन्दुस्तानियों के दिलों में उन शूर-वीरों के लिए कोई अच्छी भावनाएँ पैदा नहीं
होतीं, क्योंकि उन 'आज़ादी की जंग' के नायकों को क़ातिल, डाकू, खूनी, धार्मिक
जनूनी व अन्य कई बुरे-बुरे शब्दों में याद किया गया है और उनके विरोधियों को
राष्ट्रीय नायक बनाया गया है। कारण यह है कि 1857 की 'आज़ादी की जंग' के
जितने इतिहास लिखे गये हैं, वे सारे के सारे ही या तो अंग्रेज़ों ने लिखे हैं जोकि
ज़बरदस्ती तलवार के ज़ोर पर, लोगों की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ हिन्दुस्तान पर क़ब्ज़ा
जमाये बैठे हैं और या अंग्रेज़ों के चाटुकारों ने। जहाँ तक हमें पता है, इस आज़ादी
की जंग का एकमात्र स्वतन्त्र इतिहास लिखा गया, जोकि बैरिस्टर सावरकर ने
लिखा था और जिसका नाम '1857 की आज़ादी की जंग का इतिहास' (The
history of the Indian war of Independence of 1857) था। यह इतिहास बड़े
परिश्रम से लिखा गया था और इण्डिया ऑफिस की लाइब्रेरी से छान-बीनकर, कई
उद्धरण दे-देकर सिद्ध किया गया था कि यह राष्ट्रीय संग्राम था और अंग्रेज़ों के
राज से आज़ाद होने के लिए लड़ा गया था। लेकिन अत्याचारी सरकार ने इसे छपने
ही नहीं दिया और अग्रिम रूप से ज़ब्त कर लिया। इस तरह लोग सच्चे हालात पढ़ने
से वंचित रह गये।
इस जंग की असफलता के बाद जो ज़ुल्म और अत्याचार निर्दोष हिन्दुस्तानियों
पर किया गया, उसे लिखने की न तो हमारे में हिम्मत है और न ही किसी और
में। यह सबकुछ हिन्दुस्तान के आज़ाद होने पर ही लिखा जायेगा। हाँ, यदि किसी
को इस ज़ुल्म, अत्याचार और अन्याय का थोड़ा-सा नमूना देखना हो तो उन्हें मिस्टर
एडवर्ड थामसन की पुस्तक, 'तस्वीर का दूसरा पहलू' (The Other Side of the
Medal) पढ़नी चाहिए, जिसमें उसने सभ्य अंग्रेज़ों की करतूतों को उघाड़ा है और
जिसमें बताया गया है कि किस तरह नील हेवलाक, हडसन कूपर और लारेन्स ने
निर्दोष हिन्दुस्तानी स्त्री-बच्चों तक पर ऐसे-ऐसे कहर ढाये थे कि सुनकर रोंयें खड़े
हो जाते हैं और शरीर काँपने लगता है!
लेकिन इस बात का ख़याल करके स्वतन्त्र व्यक्तियों को शर्म आयेगी कि वे
लोग भी, जिनके बुजुर्ग इस जंग में लड़े थे, जिन्होंने हिन्दुस्तान की आज़ादी की
बाज़ी पर सबकुछ लगा दिया था और जिन्हें इस पर गर्व होना चाहिए था, वे भी,
इस जंग को आज़ादी की जंग कहने से डरते हैं। कारण यह कि अंग्रेज़ी अत्याचार
ने उन्हें इस क़दर दबा दिया था कि वे सर छुपाकर ही दिन काटते थे। इसलिए
उन बुजुर्गों की यादगार मनानी या स्थापित करनी तो दूर, उनका नाम लेना भी गुनाह
समझा जाता था।
172 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
लेकिन हालात कुछ ऐसे बन गये कि जिनसे विदेशों में बसे हिन्दुस्तानी
नौजवान 10 मई के दिन को राष्ट्रीय त्यौहार बनाकर मनाने लगे। और कुछ हिन्दी
(हिन्दुस्तानी) नौजवान यहाँ भारत में भी यही त्यौहार मनाने की कुछ कोशिशें करते
रहे हैं। सबसे पहले, जहाँ तक पता चलता है, यह त्यौहार इंग्लैण्ड में 'अभिनव
भारत' ने बैरिस्टर सावरकर के नेतृत्व में सन् 1907 में मनाया। इस त्यौहार को मनाने
का ख़याल कैसे आया, वह कथा इस तरह है (गुलामों में खुद तो ऐसे यादगारी-दिन
मनाने के ख़याल कम ही पैदा होते हैं) –
“1907 में अंग्रेज़ों ने विचार किया कि 1857 के ग़दरियों पर जीत हासिल
करने की पचासवीं वर्षगाँठ मनानी चाहिए। 1857 की याद ताज़ा करने के लिए
हिन्दुस्तान और इंग्लैण्ड के प्रसिद्ध अंग्रेज़ों के अख़बारों ने अपने-अपने विशेषांक
निकाले, ड्रामे किये गये और लैक्चर दिये गये और हर तरह से इन कथित ग़दरियों
को बुरी तरह कोसा गया। यहाँ तक कि जो कुछ भी इनके मन में आया, सब
ऊल-जलूल इन्होंने ग़दरियों के ख़िलाफ़ कहा और कई कुफ़्र किये। इन गालियों
और बदनाम करने वाली कार्रवाई के विपरीत सावरकर ने 1857 के हिन्दुस्तानी
नेताओं – नाना साहिब, महारानी झाँसी, ताँत्या टोपे, कुँवर सिंह, मौलवी अहमद
साहिब की याद मनाने के लिए काम शुरू कर दिया, ताकि राष्ट्रीय जंग के
सच्चे-सच्चे हालात बताये जायें। यह बड़ी बहादुरी का काम था और शुरू भी
अंग्रेज़ी राजधानी में किया गया। आम अंग्रेज़ नाना साहिब और ताँत्या टोपे को शैतान
के वर्ग में समझते थे, इसलिए लगभग सभी हिन्दुस्तानी नेताओं ने इस आज़ादी की
जंग को मनाने वाले दिन में कोई हिस्सा न लिया। लेकिन मि. सावरकर के साथ
सभी नौजवान थे। हिन्दुस्तानी घर में एक बड़ी भारी यादगारी मीटिंग बुलायी गयी।
उपवास किये गये और क़समें ली गयीं कि उन बुजुर्गों की याद में एक हफ़्ते तक
कोई ऐयाशी की चीज़ इस्तेमाल नहीं की जायेगी। छोटे-छोटे पैम्फ़लेट 'ओह शहीदो'
(Oh! Martyrs) नाम से इंग्लैण्ड और हिन्दुस्तान में बाँटे गये। छात्रों ने आक्सफ़ोर्ड,
कैम्ब्रिज और उच्चकोटि के कॉलेजों में छातियों पर बड़े-बड़े, सुन्दर-सुन्दर बैज
लगाये जिन पर लिखा था, '1857 के शहीदों की इज़्ज़त के लिए।' गलियों-बाज़ारों
में कई जगह झगड़े हो गये। एक कॉलेज में एक प्रोफ़ेसर आपे से बाहर हो गया
और हिन्दुस्तानी विद्यार्थियों ने माँग की कि वह माफ़ी माँगे, क्योंकि उसने उन
विद्यार्थियों के राष्ट्रीय नेताओं का अपमान किया है और विरोध में सारे के सारे
विद्यार्थी कॉलेज से निकल आये। कई की छात्रवृत्तियाँ मारी गयीं, कइयों ने इन्हें खुद
ही छोड़ दिया। कइयों को उनके माँ-बाप ने बुलवा लिया। इंग्लिस्तान में राजनीतिक
वायुमण्डल बड़ा गर्म हो गया और हिन्दुस्तानी सरकार बड़ी हैरान व बेचैन हो गयी।”
(बैरिस्टर सावरकर का जीवन, पृष्ठ 45-46, चित्रगुप्त रचित)
इन हालात की ख़बर जहाँ भी पहुँची, विदेशों में, वहाँ-वहाँ दस मई का दिन
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 173
बड़ी सज-धज से मनाया गया और लोगों में बड़ा जोश आ गया कि अंग्रेज़ किस
प्रकार हमारे राष्ट्रीय वीरों को बदनाम करते हैं। उन्होंने रोष के रूप में मीटिंगें कीं
और उनकी याद में 10 मई का दिन हर वर्ष मनाना शुरू कर दिया। काफ़ी समय
बाद अभिनव भारत सोसायटी टूट गयी और इंग्लैण्ड में यह दिन मनाना बन्द हो
गया, लेकिन कुछ समय बाद अमेरिका में हिन्दुस्तान ग़दर पार्टी स्थापित हो गयी
और उसने उसे हर बरस मनाना शुरू कर दिया। ग़दर पार्टी के स्थापित होने के दिन
से लेकर अब तक अमेरिका में यह दिन सज-धज से मनाया जाता है। बड़ी भारी
मीटिंग होती है, जिसमें सब हिन्दुस्तानी एकत्र होते हैं। उसमें इन 1857 के शूरवीरों
के जीवन और कारनामे बताये जाते हैं। इस तरह इन शहीदों की याद साल दर साल
ताज़ा की जाती है और ऐसी कविताएँ –
‘ओ दर्द-मन्द दिल, दर्द दे चाहे हज़ार
दस मई का दिन भुलाना नहीं।
इस रोज़ छिड़ी जंग आज़ादी की
बात खुशी की ग़मी लाना नहीं।’
आदि पढ़ी जाती हैं। विशेषतः 1914-15 में ये पंक्तियाँ प्रत्येक पुरुष की जीभ
पर चढ़ी हुई थीं, क्योंकि उस समय वे एक और आज़ादी की जंग लड़कर
हिन्दुस्तान को आज़ाद करवाना चाहते थे। लेकिन वह प्रयास भी असफल हुआ,
जिसमें हज़ारों नौजवानों ने भारतमाता पर शीश वार दिये, लेकिन हमारी गुलामी को
न काटा जा सका।
दस मई का दिन क्यों मनाया जाता है? इसका कारण यह है कि दस मई के
दिन ही असली जंग शुरू हुई थी। 10 मई को मेरठ छावनी के 85 वीरों ने चर्बी
वाले कारतूस इस्तेमाल करने से इन्कार कर दिया था। उनका कोर्ट मार्शल किया
गया और प्रत्येक जवान को 10 साल सख़्त कैद की सज़ा दी गयी। बाद में ग्यारह
सिपाहियों की कैद कम कर पाँच साल कर दी गयी थी। लेकिन यह सारी कार्रवाई
ही इस तरीक़े से की गयी थी कि जिसमें हिन्दुस्तानी सिपाहियों के गर्व और मान
को भारी चोट पहुँचती थी, वह दृश्य बड़ा दर्दनाक था। देखने वालों की आँखों से
टप-टप आँसू गिरते थे। सारे के सारे बुत बने हुए थे। वे 85 सिपाही जो उनके भाई
थे, सब दुखों-सुखों में शरीक थे, उनके पैरों में बेड़ियाँ डाली हुई थीं। उनका
अपमान सहन करना मुश्किल था, लेकिन कुछ बन नहीं सकता था।
अगले दिन “घुड़सवार और पैदल सेना ने जाकर जेल तोड़ दी, अपने साथियों
को छुड़ा लिया, अफ़सरों के घरों को फूँक डाला। जिस यूरोपीय को पकड़ सके,
उसे मार डाला और दिल्ली की ओर चढ़ाई कर दी। ग़दर का आरम्भ इसी दिन
हुआ और 10 मई से ही गिना जाता है।”
(ऑक्सफ़ोर्ड हिस्ट्री ऑफ़ इण्डिया, पृष्ठ 715)
174 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
सो पाठकों ने ऊपर लिखी घटनाओं से देख लिया है कि दस मई का दिन
क्यों और कब से मनाना शुरू किया गया। पाठक यह सब हाल पढ़कर देख सकते
हैं कि उनका क्या फ़र्ज़ है। क्या उन्होंने उस आज़ादी के लिए, जिसलिए कि
हज़ारों-लाखों हिन्दुस्तानियों ने सर लगा दिये थे और हज़ारों लगाने के लिए तैयार
बैठे थे, आज तक कुछ किया है या नहीं? यदि आज तक उन्होंने कुछ नहीं किया
तो वे कौन-सा मुहूर्त देख रहे हैं? आज़ादी की जंग में शामिल होने के लिए तो
साल के 365 दिनों में से 365 ही पवित्र हैं। हर पल भारतमाता तुम्हारा इन्तज़ार
कर रही है कि तुम उसकी ज़ंजीरें तोड़ने के लिए अपना फ़र्ज़ पूरा करते हो या
नहीं। क्या इन्सान बनकर आज़ादी हासिल करोगे? इसी सवाल के जवाब से भारत
का भविष्य निर्भर करता है।
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 175
भाई बालमुकुन्द जी
अगस्त, 1928 के 'किरती' में प्रकाशित यह लेख भगतसिंह या उनके किसी
साथी का लिखा हुआ है। – स.
अब तक हम पंजाबी शहीदों के जीवन 'किरती' में बिना क्रम के ही छापते रहे
हैं। कभी बब्बर अकाली शहीदों के जीवन छापे तो कभी 1914-15 वाले ग़दर पार्टी
के शहीदों के। कभी 1908 वाले मदनलाल जी का ही जीवन छापा। अब हमारा
इरादा है कि उनके जीवन-वृत्तान्त को उसी तरह छापते हुए भी उन आन्दोलनों का
क्रमशः हाल लिखें ताकि हमारे पाठक समझ सकें कि पंजाब में जागृति कैसे पैदा
हुई और फिर काम कैसे होता रहा और किन कामों के लिए, किन विचारों के लिए,
उन शहीदों ने अपने प्राण तक उत्सर्ग कर दिये।
वास्तव में अब का आन्दोलन 1907 से ही चलता है और फिर वह कभी
किसी रंग में और कभी किसी ढंग से चलता चला गया। 1907 में बड़ा भारी
आन्दोलन हुआ। जोश में आये लोगों ने कई जगह दंगे, झगड़े किये, उनकी कुछ
बातें सरकार ने मान लीं और फिर आन्दोलन को कुचल डाला। बाद में 1908-09
में लिटरेचर पैदा करने और अच्छे-अच्छे विचारों को पक्का करने का काम होता
रहा। बाद में एक खुफ़िया सोसायटी बन गयी, जिसका परिणाम दिल्ली बम केस
से प्रकट हुआ। इसमें चार सज्जनों – श्री अमीरचन्द जी, श्री अवध बिहारी, श्री
बालमुकुन्द जी और श्री बसन्तकुमार बिस्वास को फाँसी हुई। बाद में कामागाटामारू
की बजबज घटना हो गयी और 1914-15 यानी अगले ही वर्ष ग़दर-लहर की
रौनक हुई और तीन-चार साल तक यही हंगामा रहा। 1919 में विद्रोह हुए और
मार्शल लॉ लगा। फिर असहयोग आन्दोलन चला और अकाली आन्दोलन चले और
आख़िर में बब्बर अकाली आन्दोलन चला, जिसमें 10-12 लोग फाँसी पर लटकाये
गये या लड़ते-लड़ते शहीद हो गये। पंजाब में बलिदानों और आन्दोलनों का इतिहास
हिन्दुस्तान में सब प्रान्तों से अधिक सुन्दर और गर्व योग्य है, लेकिन अफ़सोस है
कि उसे अभी तक किसी ने क्रमिक रूप में लिखा ही नहीं।
आज हम दिल्ली-षड्यन्त्र के शहीद, शहीद भाई बालमुकुन्द जी का जीवन
लिख रहे हैं। अगली बार हम दिल्ली-षड्यन्त्र का इतिहास भी देंगे और हम उनके
176 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़