बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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घायल हुए। तीन सिक्खों में से केवल एक को ही पकड़ा न जा सका, एक को एक
रास्ता चलते मोटे मुस्टंडे मुसलमान ने धर गिराया, तीसरे को पुलिस ने ही
पकड़ा। मुसलमान ने जिनको पकड़ा उनका नाम था जगतसिंह। सिक्खों में भी
उन दैत्याकार जगतसिंह के मुकाबले का कोई न था। वे जैसे बलवान् और साहसी
थे उनका शरीर भी ठीक वैसा ही दैत्य का-सा था। पुलिस के साथ यह कांड
करके वे पुलिस की आंख से बचकर निकल गए थे, किन्तु पूरी तरह बे-खटके होने
से पहले ही रास्ते के एक नलके से जल पीकर वे शान्ति से जब अपना मुंह पोंछ
रहे थे, उस समय उनकी अपेक्षा भी बलवान् एक मुसलमान ने आकर दोनों हाथों
से उनके दोनों पैर इस तरह जोर से दबाकर पकड़ लिए कि जगतसिंह फिर हिल न
सके। जगतसिंह धक्का न संभाल सके और गिर पड़े। मुकदमे में जगतसिंह
को फांसी हुई। इस प्रकार रासबिहारी के कुछ विश्वस्त आदमी फिर पकड़े गए।
यथासमय यह समाचार रासबिहारी के पास पहुँचा। उस समय सारे लाहोर शहर
में उन्हें आश्रय देनेवाला कोई नहीं था। उनका दल उस समय एकदम टूट गया
था। उनके साथी-सहायकों में से उस समय तक कुछ गुमनाम सिख युवक ही
बचे थे। अपार समुद्र के मध्य में मानो वे उस समय पालविहीन डोंगी पर किसी
तरह बह रहे थे। जो पुलिस वाले मरे और घायल हुए वे भारतवासी थे, जो
पकड़े गए, फांसी पर चढ़े या जेल में सड़ने लगे वे भी भारतवासी थे और इनमें
आपस में कोई द्वेष, कोई विरोध न था !
इस समय के कुछ पहले ही मुसलमानों के बीच भी विप्लव का षड्यन्त्र
आरम्भ होता है। आगे इस मुसलमान् जागृति की विस्तृत आलोचना करनी
होगी, इसलिए अभी यहाँ इतना ही कहना यथेष्ठ है कि तुर्की-इटालियन युद्ध के
बाद से भारतीय मुसलमानों में एक नई चेतना का संचार होता है। किन्तु हमारे
दल के साथ मुसलमान दल का संयोग होता है ठीक उस समय से, जिस समय की
कहानी अब हम सुना रहे हैं। उनके साथ परामर्श करके रासबिहारी ने ठीक
किया कि अब काबुल जाकर ही पहले आश्रय लेना होगा और वही ठहरकर
भारत की विप्लव चेष्टा को नियन्त्रित करना होगा। उन्होंने एक मौलवी से
कलमा पढ़ना सीखा। खालिस मुसलमान के वेश में ही काबुल जाना तय पाया।
कुछ सिख नेता भी रासबिहारी के साथ जाते। सब ठीक हो चुका था, और दो-
एक दिन में ही यात्रा करनी होती, जब एक दिन दोपहर को रासबिहारी बोल
उठे, "नही भाई, काबुल जाना अब नही होता, मुझे जान पड़ता है कि इस समय
काबुल की ओर जाने से विपत्ति आने की सम्भावना है, दूसरी ओर लाहोर में
भी अब घड़ी-भर और देर करने की इच्छा नहीं होती, दिल कहता है इस समय
देर करने से जरूर आफ़त आएगी। रासबिहारी के दिल में जब जो आता था
कभी उससे उलटा न करते थे। इसलिए उसी वक्त ठीक कर डाला कि उसी
दिन रात की गाड़ी से रवाना होंगे। काशी के दो युवक इस समय उनके पास
थे। एक का नाम था. विनायकराव कापले, वे मराठा थे पर बहुत दिन काशी
पहली निष्फलता के बाद / 107
में रहे थे, दूसरे युवक का नाम हमारे समझने की सुविधा के लिए धरा जाता है,
गंगाराम । यह बहुत दिन तक फ़रार रहे। रासबिहारी और विनायकराव रात
को आठ बजे की गाड़ी से रवाना हुए। तय हुआ कि गंगाराम कुछ सिक्ख नेताओं
को लेकर दो-एक दिन बाद काशी आएँगे । करतारसिंह, हरनामसिंह और दूसरे
कई सिक्ख नेताओं ने काबुल जाना ठीक किया।
रासबिहारी जिस मकान में रहते थे वही मकान सबकी अपेक्षा बेखटक था,
क्योंकि इसका पता बहुत लोगों को न था। जिन सब मकानों पर वे भिन्न-भिन्न
लोगों से मिलते-जुलते थे, उन सब मकानों से इस समय कोई सम्बन्ध न रखा जाय,
रासबिहारी का यह विशेष अनुरोध था। किन्तु यह होने पर भी गंगाराम रास-
बिहारी को स्टेशन पर पहुँचाकर लौटते समय एक बार उसी पुराने मकान को
झाँककर देखने गए, उनकी इच्छा थी यदि खटका न देखा तो अपने बहुत-से
कपड़े-लत्ते जो उस मकान में थे लेते आएँगे । किन्तु पुलिस ने पहले से ही इन सब
मकानों के चारों ओर अपने आदमी रख छोड़े थे । गंगाराम ने उस मकान के
निकट जाकर झाँका ही था कि पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया।
पकड़े जाने के कुछ दिन के अन्दर ही गंगाराम ने पुलिस के नजदीक सब बातें
मान ली । उनके इज़हार से पुलिस ने उस मकान का सुराग भी पा लिया जिसमें
रासबिहारी अन्तिम बार ठहरे थे । उस मकान की खानातलाशी लेने पर पुलिस
को उनके हाथ के लिखे दो-एक कागज़ भी मिले। इससे पहले जिन्होंने इज़हार
दिये थे उनसे ही पुलिस को पता लग चुका था कि रासबिहारी फिर पंजाब आए
थे और इसी लाहौर में थे। गंगाराम को पाकर उन्होंने यह भी सुन लिया कि
भयंकर धर-पकड़ के समय भी रासबिहारी लाहौर में ही थे । पुलिस यह भी
जान गई कि रासबिहारी काशी से आए थे और फिर काशी वापस चले गए हैं।
मौत के मुंह से इसी प्रकार रासबिहारी कई बार बचे थे। इससे बहुत दिन
पहले की बात है, एक दफे और रासबिहारी इसी लाहौर में आए थे, उस समय
तक वे देहरादून ही में नौकरी करते थे, कुछ दिन की छुट्टी ली थी और दिल्ली
होकर लाहौर की तरफ दल का काम-काज देखने आए थे। इधर दिल्ली में
खानातलाशी और गिरफ्तारियां आरम्भ हो गईं। रासबिहारी इस बारे में कुछ
भी न जानते थे । दिल्ली की खानातलाशी के फलस्वरूप पुलिस को दीनानाथ
नामी लाहौर के एक युवक का सन्धान मिला, एक आदमी के मकान पर रास-
बिहारी का ट्रंक और कपड़े-लत्ते आदि भी मिल गए। किन्तु लाहौर में रासबिहारी
ठीक किस जगह हैं इसका सुराग पुलिस को न मिला। तो भी दीनानाथ का
ठिकाना पुलिस को मिल गया और लाहौर मे उसे पकड़ लिया गया। तब भी
रासबिहारी लाहौर में थे । दीनानाथ जिस दिन पकड़ा गया उससे अगले दिन
शाम के समय डी० ए० वी० कालेज के बोर्डिंग के एक विद्यार्थी ने रासबिहारी के
पास आकर उन्हें दीनानाथ की गिरफ़्तारी की खबर दी। तब तक उन्हें यह
खबर न मिली थी। सबकी सलाह से तय पाया कि उसी रात रासबिहारी लाहौर
108 / बन्दी जीवन
छोड़ दें। रासबिहारी दिल्ली चले गए। इस तरह सलाह-मशविरा करते-करते
रात अधिक हो जाने पर वह विद्यार्थी बोर्डिंग में वापस न गया, जिस मकान पर
रासबिहारी थे वह रात उसने भी वहीं काट दी। सबेरे पुलिस ने वही मकान घेर
लिया। तीन युवक गिरफ्तार हुए पर रासबिहारी न पकड़े गए। दीनानाथ जिस
दिन पकड़ा गया उसके अगले दिन रात के समय उसने सब बातें खोल दीं। यदि
एक दिन पहले वह मुखबिर हो जाता तो रासबिहारी भी पकड़ लिए जाते।
इधर फिर दिल्ली आकर रासबिहारी अमीरचन्द के मकान की ओर जाने
को ही थे कि राह में उन्होंने थाने के नजदीक अमीरचन्द के मकान वाले नौकर
को कहीं जाते देखा। उन्हें जरा सन्देह-सा हुआ, नौकर को बुलाकर पूछा अमीर-
चन्द कहाँ है। नौकर मालिक के दोस्त को पहचानकर बड़ी हड़बड़ाहट से बोल
उठा—"बाबू हमारे मकान पर न जाएँ, मालिक को पुलिस पकड़ ले गई है, मैं
उनके लिए थाने पर खाना ले जा रहा हूँ!" रासबिहारी के हाथ में उस समय
जो रुपया-पैसा था उससे कलकत्ते तक का रेल का टिकट खरीदा जा सकता था।
वे फिर स्टेशन लौटकर एकदम सीधा चन्दननगर चले आए। उस दिन से रास-
बिहारी का अज्ञातवास आरम्भ होता है। तब से "Thou art but a wander-
ing voice" (तू एक उड़ती-फिरती आवाज है) की तरह यह पकड़ा, वह पकड़ा
होने पर भी मानो उनका पता नहीं मिलता। इस प्रकार बार-बार विपत्ति से
उद्धार पाकर भी वे फिर उसी विपत्ति में पड़ते रहे।
2
काशी अंचल की कहानी
काशी में बैठे-बैठे हम पंजाब की दुरवस्था की बात कुछ भी न जान पाए
थे । तो भी कुछ दिन तक पंजाब का कोई संवाद न पाने पर हम कुछ चिन्तित
होने लगे । रासबिहारी इस बार जब पहले पंजाब गए थे तब कह गए थे कि जल्दी
ही पंजाब से कुछ सिक्ख कार्यकर्त्ताओं को भेज देंगे, क्योंकि सिक्खों की पल्टन में
यदि सिक्ख ही जाकर काम करें तो खूब फल हो । पंजाब से जब करतारसिंह
आदि एक बार काशी आए थे तब उनकी ज़बानी भी सुना था कि रासूदा¹ शीघ्र
ही कुछ सिक्खों को इधर भेजना चाहते हैं । उस समय तक कानपुर, लखनऊ,
'फैजाबाद (अयोध्या) आदि शहरों में हमारे आदमी नहीं गए थे। विप्लव ठीक
कब आरम्भ होगा, यह संवाद एक आदमी हमारे पास ले आया था, और इसके
बाद हमें पंजाब का और कोई संवाद नहीं मिला था। पंजाब से कुछ लोग
सीधे फैजाबाद ज़रूर आए थे, एवं कानपुर और लखनऊ में भिन्न-भिन्न समय
'पर पंजाब से ही लोग भेजे गए थे । इधर हम लोग काशी की छावनी में आने-
जाने लगे । 21 फरवरी सन् 1915 रविवार को विप्लव शुरू होने की बात थी,
हम शनिवार रात तक काशी की छावनी में गए थे । उधर पंजाब में विप्लव की
तारीख 21 से हटाकर 19 कर दी गई थी उसका हमेंकुछ भी पता न था। शनिवार
रात को भी काशी की पल्टन के हवलदार और नायब हवलदार आदि ने हमें
आश्वासन दिलाया था कि विप्लव आरम्भ हो जाने पर वे निश्चय ही विप्लव दल
का साथ देंगे ।
किन्तु इस समय कई विचारों ने हमें एकदम चंचल कर दिया था । हम
लोग सोचते थे कि अंग्रेजों के विरुद्ध विप्लव करने जा रहे हैं, और यदि सचमुच
विप्लव आरम्भ हो गया तो अपने परिवारों को कहाँ किस दशा में रक्खा
जाएगा । विप्लव आरम्भ होने पर विप्लवी दल को दिल्ली ले जाकर दूसरे
विप्लवी दल के साथ मिलाना होगा। उस अवस्था में यदि अंग्रेज़ी फ़ौज आकर
काशी पर दखल करे तो हमारे परिवारों की क्या अवस्था होगी ? इस भावना
- बड़े भाई को बँगला में दादा कहते हैं, उसका संक्षेप 'दा' भी हो जाता है !
110 / बन्दी जीवन
ने हमें थोड़ा व्याकुल नहीं किया।
विप्लव सचमुच शुरू हो जाने पर पल्टन के सिपाहियों को तथा शहर के
गुंडों को संयत शासन के अधीन रखना कितना कठिन काम होगा, यह भी हम
भूल न गए थे, विप्लव के समय सैकड़ों-हजारों परिवारों के मंगल-अमंगल का
उत्तरदायित्व भी हमीं लोगों के सिर पर था, यह बात भी कभी हमारे ध्यान से
नहीं हटी । किन्तु विप्लव जब करना ही था तब समस्याएँ चाहे कितनी कठिन
क्यों न हों इनका समाधान भी हमें करना ही था ।
और भी एक विचार ने हमें उससमय चिन्तित किया था। हम सोचते थे कि
यदि दूसरे स्थानोंमें विप्लव आरम्भ हो जाय और हमारे यहाँ न हो, तब हम लोगों
की, जो पहले से ही पुलिस की विष-दृष्टि में पड़ चुके थे, क्या गति होगी ? और
दूसरे स्थानों में विप्लव आरम्भ हुआ कि नहीं, यह भी जानेंगे कैसे ? इस अवस्था
में अन्यान्य केन्द्रों की पक्की बात जाने बिना काशी की पल्टन को उभार देना
युक्ति-संगत होगा कि नही, यह हम सोचकर तय न कर पाए थे । हम जानते थे
कि काशी में हमारे अपने दल को जो कुछ शक्ति थी उससे हम काशी की अंग्रेज
छावनी पर हमला कर सकते थे । ऐसी अवस्था में देशी पल्टन को भी कोई एक
पक्ष अवश्य लेना पड़ता, और हमारा विश्वास था कि देशी पल्टन हमारी तरफ
ही योग देगी। इस तरह हम जानते थे कि इच्छा हो तो हम काशी में विप्लव का
सूत्रपात कर सकते हैं। किन्तु और स्थानों की बात जाने बिना, विशेषतः पंजाब
की बात जाने बिना कुछ करने की हिम्मत न होती थी । यदि अपने दल में काफ़ी
तादाद में अस्त्र-शस्त्र रहते तो भी ऐसा करने की हिम्मत हो जाती । जो हो इन
सब भावनाओं के बाद हमने तय किया था कि रेलवे स्टेशन और तार-घर के
पास जांच-पड़ताल करके ही हमें इस बात का संशय दूर करना होगा कि पजाब
की ओर से तार आने में कुछ गोल-माल हुआ है कि नही। यदि तार न आया
तो जान लेंगे कि वहाँ कुछ गोलमाल शुरू हो गया है, विचार था कि विप्लव शुरू
होने के कुछ पहले ही सब तरफ तार काट दिए जाएँगे । हमें स्टेशन पर ट्रेनों के
आने-जाने में भी गोलमाल होने की आशा थी ।
हमने स्थिर किया था कि इस प्रकार अन्य स्थानों की बात जानकर ही
काशी की अंग्रेजी पल्टन पर आक्रमण करेंगे और रात के समय समर्थ अंग्रेज पुरुषों
को जेल में डालकर जेल के कैदियों को मुक्त कर देंगे । हमने समझा था कि
जेल के क़ैदी इस तरह हमारी मदद से छूट जाएँगे तो उनमें से कुछ तो ज़रूर
हमारा साथ देंगे । तब तक हम जेल न गए थे, इसलिए जेलों की अवस्था कुछ भी
न जानते थे। यह तो अब जान पाया है कि यह आशा कैसी बड़ी दुराशा थी।
जो हो, हमारा मतलब यह था कि आधी रात को मेगज़ीन और खजाना हाथ में
करके कुछ लोगों को एकदम इलाहाबाद और दानापुर की ओर विप्लव की
खबर के साथ भेज देते, और सवेरा होने पर आम खुली सभा बुलाकर शहर के
धनी लोगों से धन-संग्रह करके शहर के युवकों से वालण्टियर होने का अनुरोध
काशी अंचल की कहानी / 111
करते। उस समय काशी में हमारे बंगाली लोगों की कई खुली सभा-समितियाँ
थीं। काशी में जितने भले लड़के थे सभी इन समितियों के सदस्य थे। इन समि-
तियों के सदस्यों की संख्या कम-से-कम दो सौ पचास थी। ये सभी लिखने-पढ़ने,
स्वभाव और चरित्र एवं शारीरिक सामर्थ्य में काशी के बंगाली समाज के उज्ज्वल
रत्न थे। इसी से काशी के शिक्षित लोगों को हमारी इन समितियों से बड़ी
सहानुभूति थी। कालेजों के प्रोफेसर, स्कूलों के मास्टर, बड़े-बड़े चिकित्सक,
म्युनिसिपल कमिश्नर आदि अनेक बंगाली थे और इन सब के कोई-न-कोई
सम्बन्धी हमारी समितियों के सदस्य थे। अनेक पर्वों और मेलों पर काशी में यह
समिति के सदस्य लोग यात्रियो के आने-जाने और उनके स्नान आदि का ऐसा
बन्दोबस्त करते थे कि सब लोग चकित हो जाते थे। इन्हीं सब समितियों से
अनेक भले घरों की विपत्तिग्रस्त विधवाओं की अनेक प्रकार से सहायता की
जाती थी, बीमारी आदि के समय यही समितियों के सदस्य लोगों के घरों पर
जाकर सेवा-शुश्रूषा करते थे। काशी के गरीब छात्रों के लिखने-पढ़ने के बन्दो-
बस्त के लिए इन्ही समितियो के सदस्य लोग स्कूल आदि खोलते थे। इस तरह
इन सब समितियो का प्रभाव काशी के बंगाली समाज पर कुछ कम न था। इसी-
लिए हमने तय किया था कि विप्लव के समय काशी मे शान्ति और श्रृंखला रखने
का भार इन्ही समितियो के सदस्यो पर डाल दिया जायगा। इन समितियों के
सदस्यो ने यद्यपि गुप्त रूप से हमारे इस विप्लव के आयोजन मे साथ न दिया
था, किन्तु तो भी इनमे स्वदेश-प्रेम या सगठन-शक्ति कुछ साधारण न थी। इस
प्रकार प्रकट रूप से साहित्य और इतिहास की चर्चा करने के कारण तथा नित्य
नियमित व्यायाम का अभ्यास करने से इन समितियो के सदस्य लोग शहर की
शान्ति-रक्षा का भार उठाने के लि., अन्य सबसे अधिक उपयुक्त थे। हम आशा
करते थे कि विप्लव आरम्भ होने पर इनमे से और शहर के हिन्दुस्तानी युवकों
मे से भी निश्चय ही बहुत-से स्वेच्छा-सेवक मिलेगे जो आग्रहपूर्वक हमारे विप्लव
मे साथ देगे और ऐसे भी बहुत-से मिलेगे जो स्थानीय काम के लिए काशी मे
ही रह जाएँगे। उस दिन कल्पना की आंखो से जब देखते कि काशी की गली
मुहल्लो, राह-घाटो मे बंगाली स्वेच्छासेवक हाथ मे गोली-भरी पिस्तौल लिये
और कमर मे पैनी कृपाण लटकाये, दल बाँधे घूम रहे हैं तब गर्व से हमारी छाती
दस हाथ फूल उठती थी। हमने तय किया था कि अपने सब विप्लवियों के परि-
वारो का काशी के ही किसी एक स्थान मे इकट्ठा रहने का बन्दोबस्त कर दिया
जायगा। हमारे इन स्वेच्छा-सेवको का दल जिस प्रकार सारी काशी का अमन
क़ायम रखता उसी प्रकार हमारे परिवारों का भी ध्यान रखता।
हम यह भी जानते थे कि विप्लव आरम्भ होने के बाद सिपाही लोग ज्योंही
जान पाएँगे कि अस्त्र-शस्त्र जो कुछ है सो सब उन्ही के पास है और उनकी
112 / बन्दी जीवन
सहायता बिना हम देश के साधारण लोग कुछ भी करने में असमर्थ हैं, तब स्वभावतः
ही वे सिपाही स्वेच्छाचारी हो जाएँगे। किन्तु दूसरी तरफ हमने यह भी सोच
लिया था कि एक बार विप्लव में साथ देने के बाद जब तक कोई एक फैसला न
हो जायगा तब तक ये सिपाही लोग निश्चिन्त न रह सकेंगे, और फलतः अपने
स्वार्थ के लिए ही विप्लव सफल बनाने की ओर ध्यान देना होगा, और इस प्रकार
बाधित होकर उन्हें देश के शिक्षित और दृढ़चित्त विप्लव-नेताओं के अधीन रहना
पसंद होगा। इसके अलावा मेगज़ीन हाथ में आते ही जितना जल्द हो सकता,
हम अपने आदमियों को हथियारबन्द कर डालते और तब हम लोग भी बिलकुल
निहत्थे न रहते।
युद्ध-नीति से हम बिलकुल अनभिज्ञ थे, इस तरफ जैसी शिक्षा का प्रबन्ध
करना उचित था वह हमने किया नहीं था। कारण यह कि जर्मन-युद्ध इतनी जल्दी
छिड़ जायगा और इतनी जल्दी खुले तौर से विप्लव शुरू करना होगा, यह हम
पहले से समझ न सके थे। जो हो, रासबिहारी के पंजाब जाने पर मैंने और मेरे
एक बन्धु विनायकराव कापले ने Encyclopaedia Britannica (अंग्रेज़ी विश्व-
कोष) लेकर Strategy और Warfare (समरनीति) विषयक लेख पढ़ना
आरम्भ किया, और इससे पहले भी अनेक पत्रिकाओं आदि में इस विषय पर जो
लेख निकलते थे वह भी हम बराबर पढ़ते रहते थे। इस प्रकार ये सब पोथियाँ
पढ़कर हम युद्ध-कुशल सेनापति न हो सकेंगे, यह हम जानते थे; Encyclopae-
dia में भी पढ़ा था कि generals are made in the field of battle (युद्ध-
क्षेत्र में ही सेनानायक तैयार होते हैं) और इतिहास में इसके अनेक दृष्टान्त भी
देखे थे। आजकल के ज़माने में भी ऐसे दृष्टान्तों का अभाव नहीं है, रूस के अभी
उस दिन के विप्लव का इतिहास देखने से भी इसके प्रमाण मिलते हैं। अस्तु, जो
भी हो, हम लोगों ने जो किया था वही लिखे देता हूँ, उससे यदि हमारी कुछ
नादानी का परिचय मिले तो लज्जित नहीं हूँ।
स्टेशन और तारघर का हालचाल देख आने के लिए 21 फरवरी रविवार
को मैं बाइक पर चढ़कर काशी कैंटूनमेंट के स्टेशन पर शाम के समय आया था।
स्टेशन पर आकर सुना कि उस समय तक ट्रेन अथवा टेलीग्राफ़ का कुछ भी गोल-
माल नहीं हुआ। उसी स्टेशन पर उसी दिन शाम के वक़्त पलटन के एक हवलदार
के आने की बात थी। उसकी बाट जोहते-जोहते प्लेटफार्म पर घूमते-फिरते दिल
में आई कि अख़बार खरीद कर पढ़ूँ। पायोनियर खरीदकर देखा लाहौर में घर-
पकड़ आरम्भ हो गई है और यूरोपियन फ़ौज शहर में पिकेट कर रही है, अर्थात्
लड़ाई के समय की तरह सावधान होकर डेरे डालकर पड़ी है। समझ गया, काम
कुछ उलट-पुलट हो गया है। झट शहर में लौट आया। हमें अब सन्देह नहीं रहा
कि इस बार की विप्लव योजना भी छिन्न-भिन्न हो गई। किन्तु ठीक उसी दिन
सिंगापुर में विप्लव शुरू हो जाता है। सिंगापुर के साथ सीधे तौर पर हम लोगों
का कोई सम्बन्ध न था, यह इतिहास एक और परिच्छेद में बतलाया जायगा।
काशी अंचल की कहानी / 113
यदि सिगापुर भारत के अन्दर की कोई जगह होती तो भारत की अवस्था अत्यन्त
भयानक रूप धारण कर लेती, इसमें सन्देह नहीं । जिस समय सैकड़ों पल्टनें विदेश
के युद्ध-क्षेत्र में रोज ही भेजी जाती हों उस समय विप्लव शुरू हो जाने पर सचमुच
अधिकांश देशी पल्टनें हमारी ओर आ जातीं। हमारी यह आशा एकदम निर्मूल
या भ्रमपूर्ण न थी। सभी पल्टनों से हमें आशा का संवाद मिला हो, यह बात भी
न थी । एक तरफ जहाँ एक सिक्ख पल्टन के सिपाहियों ने हमारे दल के एक तरुण
युवक के मुंह से विप्लव नजदीक होने की खबर पाकर आग्रह और उत्साह के साथ
उसी रात पल्टन के मुखियों को बुलाकर गुप्त रूप से एक बैठक करके तय किया
था कि पहले वे जरूर कुछ न करेंगे, पर सचमुच विप्लव शुरू हो जाने पर वे निश्चय
ही विप्लव में साथ देंगे, वहाँ दूसरी तरफ एक ओर जगह की मुसलमान पल्टन ने
यह उत्तर दिया था कि "तुम क्या हमको बिलकुल बच्चा समझते हो ? अंग्रेजों
के साथ युद्ध करना क्या लड़को का खेल है ? तुम्हारी तरफ कोई नवाब या राजा-
महाराजा है ? जब नहीं है तो तुम्हें रुपये से मदद कौन देगा ? इसके अलावा
विप्लव शुरू होते ही वायरलेस टेलीग्राफी (बेतार के तार) पर उसी समय भारत
के चारों ओर खबर चली जायगी और थोड़े दिनों मे चारों ओर की फ़ौज
तुम्हारे ऊपर आ पडेगी। इस अवस्था में क्या तुम किसी तरह टिक सकोगे ?
तुम्हारे हाथ में अस्त्र-शस्त्र ही कितने हैं ? तुम्हारी सामरिक शिक्षा-दीक्षा ही क्या
है ? ये बाते क्या सोच देखी हैं ? हम लोग न बच्चे हैं न पागल, ऐसी बातें फिर
हमारे नज़दीक कहने मत आना, हाँ, अगर सचमुच विप्लव शुरू हो गया तो अवश्य
हम लोग भी देशवासियों के विरुद्ध न चलेंगे, किन्तु देखना, होगा कुछ भी नही,
इत्यादि ।"
उस समय सिक्ख लोगों में जैसी उत्तेजना और उत्साह देखा गया था, वैसा
उत्साह केवल पंजाबी मुसलमानों और पठानो मे ही कुछ हद तक देखा है। भारत
की अनेक जातियों के साथ मिल-जुलकर समझ सका हूँ कि सिक्खों के समान
मजबूत, समर्थ और भावुक जाति भारत मे कोई नही है। सिक्ख लोग जैसे सहज
रूप से जितने थोड़े समय में उत्तेजित हो उठते हैं वैसी सहजता से भारत की
और कोई जाति उत्तेजित नही हो उठती। रासबिहारी जब विप्लव का उद्योग व्यर्थ
हो जाने पर पंजाब छोड़कर फिर काशी की ओर लौट रहे थे तब ट्रेन में एक सिक्ख
सैनिक के साथ उनकी बातचीत हुई। साधारण बातें होते-होते प्रसंगवश भारत
की वर्तमान अवस्था की बात आई । इतने थोडे समय की बातचीत से ही वह
सिक्ख इतना उत्तेजित हो उठा कि रासबिहारी के साथियों को डर हुआ कि कहीं
कुछ अनर्थ न हो जाय क्योकि ट्रेन के कमरे मे और भी कई तरह के लोग हैं, यह
भूलकर उस सिक्ख ने उत्तेजित स्वर में कहना शुरू कर दिया था कि वह देश के
लिए जरूर प्राण देगा। जो हो, बड़ी मुश्किल से उन्होंने उस यात्रा में छुटकारा
पाया।
इस विषय में सब बंगालियों को दोष देते हैं। बंगाली भी बेशक बड़ी भावुक
114 / बन्दी जीवन
जाति है, पर भाव के उन्माद में सिक्ख लोग घड़ीभर में जैसे एक असम्भव काण्ड
कर सकते हैं, वैसे भारत की और कोई जाति नहीं कर सकती । सिक्खों के
कहने और करने के बीच अन्तर बहुत थोड़ा रहता है। इसलिए मैं समझता हूँ कि
ऐसा कोई काम नहीं जिसे ये सिक्ख लोग उपयुक्त नेतृत्व में परिचालित होने पर
न कर सकें । सिक्ख समाज में आज केवल एक ही चीज़ का अभाव दीखता है और
उस अभाव को पूरा करने के लिए सिक्ख समाज इस प्रकार जाग्रत हो गया है कि
वह अभाव भी थोड़े ही दिनों में नहीं रहेगा । संसार की विचारधारा के साथ
रहने के लिए जैसी शिक्षा चाहिए सिक्ख समाज में वैसी शिक्षा का बिल्कुल अभाव
है और इस अभाव को दूर करने के लिए छोटे-छोटे सिक्ख जमींदार भी जैसी
आर्थिक सहायता करते हैं वैसा दृष्टान्त भारत की और किसी जाति में नहीं पाया
जाता । तो भी सिक्खों में संकीर्णता बड़ी है, इसलिए सिक्ख समाज के लिए वे
जो कुछ करते हैं उसका सौ में एक हिस्सा भी दूसरे समाजों के लिए नहीं कर
सकते । सिक्ख सम्प्रदाय में से बहुतों का विश्वास है कि यदि वे उपयुक्त-शक्ति
सामर्थ्य का उपार्जन कर लें तो फिर वे भारत में अपना साम्राज्य खड़ा कर
सकते हैं। जो हो, वे फिर एक साम्राज्य खड़ा कर सकें या न कर सकें, भविष्य
में यदि उनमें उपयुक्त शिक्षा का प्रचार न होगा तो भारत के भाग्य में बहुत
दुःख लिखे हैं, इसमें सन्देह नहीं ।
खैर, जाने दो इन बातों को, जो बात हम कह रहे थे उसे ही फिर कहें; कह
रहे थे कि किस तरह पंजाब की दुरवस्था की खबर हमने काशी में जान पाई थी ।
पायोनियर में यह कुसमाचार देखकर हमें बड़ी चोट लगी । हमें मालूम होने लगा
मानो हम भारतवासियों का कोई संकल्प भी अन्त तक नहीं रहता । हम जो
सोचेंगे, कुछ भी न होगा । अंग्रेज़ लोग जो करने की बात कहेंगे उसी में कृतकार्य
हो जाएँगे । न जाने विधाता का यह कैसा विधान है ।
भारतवासी का जीवन मानो केवल दूसरों के खेल की सामग्री है । उसको
अपनी मानो कोई साध, कोई वासना ही नहीं, या वह है भी तो मानो उसे पूर्ण
करने की शक्ति उसमें नहीं है । भारतवासी की सब चेष्टाओं का परिणाम मानो
केवल व्यर्थता से पूर्ण है, भारत का इतिहास भी वैसे एक विराट् व्यर्थता के कारण
उदास स्वर से भरा है। भारत के इतिहास की तरह भारत की विप्लव चेष्टा का
इतिहास भी एक सिरे से व्यर्थता का ही इतिहास है ।
: 2 :
रेलबे स्टेशन से मुरझाया हुआ घर वापस आया । घर में अनेक साथी मेरी
प्रतीक्षा में बैठे थे । मुहल्ले-मुहल्ले में कुछ युवकों के दल भी हमारे आदेश की
प्रतीक्षा में थे। उन्हें विप्लव की बात मालूम न थी,पर इतना तो सब जानते थे कि
शायद कोई भी भीषण काण्ड हो सकता है जिससे जान हथेली पर रखकर उन्हें
काशी अंचल की कहानी / 115-
उस कार्य में साथ देना होगा। साथियों ने सब सुना। विप्लव रुक गया यह
समझ लिया, तो भी दो-तीन दिन बड़ी उत्कण्ठा में कटे। जो हुआ सो एकदम
आशा के विपरीत रहा हो ऐसा भी नहीं, कारण यह कि इस व्यर्थता की आशंका
बड़े जोर से पहले ही दिल में उठी थी, इसलिए पायोनियर की खबर सुनकर हम
मानो मौन स्वर से बोल उठे—"यही तो कहते थे कि इतनी जल्दी क्या भारत का
भाग्य पलट जायगा !"—दो-तीन दिन में ही लाहौर में तांगे की दुर्घटना का
समाचार अखबार में पढ़ा, हममें से बहुतों ने सोचा कही भाग जानेवाले व्यक्ति
रासबिहारी ही न हों किसी-किसी ने कहा नहीं, रासबिहारी निश्चय ही वहां न
थे कारण कि रासबिहारी का भाग्य बड़ा उज्ज्वल है, उनका भाग्य ही उनकी
रक्षा करता है, इसीलिए विपत्तियों के मुंह में वे कभी नहीं पड़ सकते। इसके
सिवाय अखबार में तो साफ ही लिखा है कि तांगे के यात्री सिक्ख थे। इस प्रकार
रासबिहारी का भला-बुरा सोचते-सोचते हमारे दिन कटने लगे। क्योंकर और
कितने दिन तक रासबिहारी बेखटके काशी आ पहुंचेंगे इसी भावना में हम अस्थिर
होकर दिन गिनने लगे। पंजाब की दुर्बलता के कारण काशी के दल को भी
कही चोट न लगे इसी आशंका में हम कई आदमी घर पर बिलकुल न रहते थे,
केवल बीच-बीच में घर आकर खबर ले जाते थे कि पुलिस का उत्पात बढ़ रहा
है या घट रहा है। उस समय भी घर पर बराबर पुलिस का पहरा था। उनकी
आंखों में धूल डालकर ही सब काम करना होता था। काशी मे हम लोग इसी
प्रकार दिन काटने लगे।
इधर पंजाब से करतारसिंह और हरनामसिंह काबुल की ओर रवाना हुए।
राह में उन्हें न जाने क्या सूझी कि वे फिर सिपाहियों में विप्लव का प्रचार करने
के लिए छावनी में घुस पड़े। इस समय जगह-जगह सिपाहियों में धर-पकड़
आरंभ हो गई थी। इसलिए स्वभावतः उनके बीच एक आतंक-सा छाया देख
पड़ता था। इस अवस्था में सिपाहियों के बीच फिर प्रचार करने जाना करतार-
सिंह के लिए हरगिज उचित न था। फलतः सिपाहियों ने ही करतारसिंह को
पकड़वा दिया। उन्हें लाहौर लाया गया। जंजीरों में जकड़े हुए करतारसिंह की
तरुण मुखश्री में वीरत्व की ऐसी महिमा झलकती थी कि उस मूर्ति को देखकर
शत्रु-मित्र सभी एक साथ मुग्ध हो जाते थे। भाई परमानन्द ने अपनी 'आप बीती'
नामक पुस्तक में उस दृश्य का मर्मस्पर्शी भाषा में वर्णन किया है। ऊंचे दर्जे के
अंग्रेज राज्याधिकारी भी वीर को उपयुक्त मर्यादा देने मे प्रायः त्रुटि नहीं करते।
पिछले विप्लव युग की कहानी देखते हुए साधारण रूप से यह कहा जा सकता है
कि अंग्रेज राज्याधिकारी विप्लवियों के वीरत्व और गुणों पर बहुधा मुग्ध हो
उठा करते थे।
इधर एकाएक एक दिन सुना, रासूदा काशी आ गए। रासूदा से भेंट होने
पर पंजाब की सब अवस्था मालूम हो गई। एक तो पंजाब का समाचार बंगाल में
देना आवश्यक था, दूसरे मेरा काशी मे ठहरना किसी तरह अभीष्ट न था, इस-
116 / बन्दी जीवन
लिए दादा ने मुझसे एकदम काशी छोड़ देने को कहा। हमारा यह नियम था कि
धर-पकड़ आरम्भ होने पर तुरन्त ही हम पहले का बन्दोबस्त जड़ से बदल देते थे,
अर्थात् मनुष्य के मन का हम पूरी तरह कभी विश्वास न करते थे, क्योंकि हम
जानते थे मनुष्य अपने मन को आप ही ठीक-ठीक नहीं पहचानता, इसलिए किसी
के पकड़े जाने पर हम उसी क्षण सावधान हो जाते थे।
इसी समय काशी में पुलिस की निगरानी ऐसी कड़ी हो गई कि कोई भी नया
बंगाली पुलिस की नजर बचाकर आ ही न सकता था। बंगाली टोले के हर
मुहल्ले में पुलिस हरएक घर जाकर पता लगाती थी कि वहाँ कोई नया बंगाली
तो नहीं आया। चन्दननगर और बंगाल में रासबिहारी को पहचानने वाले खुफिया
पुलिस के जितने कारिन्दे थे सबको काशी के भिन्न-भिन्न स्टेशनों पर पहरे पर
नियुक्त किया गया था। चौबीस घण्टा ऐसा ही पहरा रहता था। इसके अलावा
काशी में जो लोग पुलिस की विष-दृष्टि में पड़ चुके थे उनके ऊपर भी जहाँ तक कड़ा
पहरा रखना पुलिस के लिए सम्भव था, उसमें पुलिस जरा भी कसर न छोड़ती
थी। जो भी बंगाली काशी में आते उन सभी का नाम-धाम पुलिस लिख लेती,
और फिर मकान पर जाकर पता लगाती कि उनकी बात सच है या नहीं। इस
प्रकार पुलिस काशी में रासबिहारी की टोह लेती थी। और ऐसी भीषण अवस्था
में भी रासबिहारी बेखटके काशी आ पहुँचे थे।
हम कुछ लोग पहले से ही सावधान थे। बहुत थोड़े समय ही घर पर टिकते
थे। अधिक समय जिस जगह रहते थे उसे दल के कुछ आदमियों को छोड़कर
कोई न जानता था। और रासूदा ही घर-घर जाकर रात को हमारा पता लेते थे।
क्योंकि रासबिहारी को काशी में कोई बहुत पहचानता न था। काशी में हमारा
खूब अच्छा दल था, इसीलिए रासबिहारी ऐसी अवस्था में काशी मे अनायास एक
महीने से ऊपर रह सके थे। रासबिहारी को पकड़ने के लिए ब्रिटिश गवर्नमेण्ट ने
कमर कस ली, और काशी के दल को बचाने के लिए रासबिहारी ने भी कमर
कस ली। काशी के युवक लोग चुपचाप घरों में बैठे और रासबिहारी ही घर-घर
जाकर पूछ-ताछ करने लगे। किसे किस उपाय से काशी से बाहर भेज दें। प्रत्येक
युवक के निकट जाकर रासबिहारी रोज़ यही बात ठीक करते। पहले मैं काशी
छोड़कर चला गया, फिर एक और मित्र ने भी काशी छोड़ दी। इसी तरह धीरे-
धीरे बहुत लोग काशी से खिसककर बंगाल आ गए। जो युक्तप्रदेश के थे वे
अपना शहर छोड़कर दूसरे शहर में जाकर रहे, जैसे काशी वाले लखनऊ गए
और लखनऊ वाले काशी आ गए।
मेरे बंगाल में खिसक आने के कुछ ही दिन बाद हमारे काशीवाले मकान की
खानातालाशी हुई, इसके थोड़े ही दिन बाद काशी के एक और युवक के घर की
खानातालाशी हुई, वे युवक उस समय काशी में ही थे, पर अपने घर पर न रहते
थे। तड़के तीन बजे पुलिस ने घर घेर लिया, पर सबेरे व्यर्थ मनोरथ होकर लौट
गई ! रासबिहारी के पास उस युवक ने सुना कि उनके घर की खाना-तलाशी
काशी अंचल की कहानी / 117
हुई है। कुछ दिन बाद विनायकराव कापले के घर की भी तलाशी हुई।
विनायक उस समय गगा स्नान करके लौट रहे थे। वे रहते थे भाडे के मकान
पर, किन्तु भोजन करते थे अपने ही मकान पर। मकान के नजदीक आने पर
विनायक ने सुना कि उनके मकान पर अनेक साहब लोग उनकी प्रतीक्षा कर रहे
हैं। यह बात सुनते ही विनायक भी अन्तर्धान हो गए। इस प्रकार पुलिस किसी
को भी न पा सकी। उस समय भी रासबिहारी काशी मे ही रहे।
जिस समय सरकार की तरफ का गवाह विभूति स्पेशल ट्राइब्यूनल की अदा-
लत मे इन सब बातो का विवरण करने लगा उस समय अदालत के जज भी आंखे
फाडकर केवल विभूति के मुंह की ओर ताकते रहे और कुछ देर के लिए नोट
लिखना भी भूल गए। सरकारी कौन्सल और हमारी ओर के वकील-बैरिस्टर
आदि भी वैसे ही आग्रह और अचम्भे के साथ निर्वाक् होकर रासबिहारी के
अद्भुत कामो की कहानी सुनने लग गए, और बीच-बीच म कोई-कोई हमारी
ओर मुंह करके धीरे से बोल उठते—"ओह, रासबिहारी की ऐसी हिम्मत है !"
हम भी उस समय आनन्द और गर्व से गद्गद् हो जाते थे। एक बार विभूति के
मुंह की ओर देखकर समझने की चेष्टा की थी कि विभूति क्या सोचता है। ख्याल
आता है कि मन मे उस समय इस बात का दुःख हुआ था कि विभूति क्यो
हमारे गर्व और आनन्द मे भाग नही लेता। इस समय ठीक याद नही आता कि
विभूति भी सचमुच ऐसी मुखबरी करने के बाद गर्व अनुभव करता था कि
नही।
इस प्रकार काशी के अनेक युवक बगाल मे आकर इकट्ठे हो गए। जिन
लोगो का पजाब से कोई सीधा सम्बन्ध न हुआ था, अर्थात् जिनका नाम-धाम
पजाब मे कोई न जानता था, वे काशी मे ही रहे। ऐसे युवको की संख्या कम न
थी, और इसीलिए ऐसे भीषण सकट के समय भी रासबिहारी बेखटके काशी मे
रह सके थे। जिन युवको को कोई विप्लवी रूप से नही जानता, जिन पर कोई
सन्देह भी नही करता, ऐसे लोगो की संख्या जिस विप्लव दल मे जितनी अधिक
हो उतना ही वह दल बलशाली और कार्यक्षम होता है।
काशी मे हम लोग इस प्रकार सतर्क हो गए, पर पजाब के नेताओ मे से
लगभग सभी एक-एक करके पकड लिए गए। डा० मथुरासिह आदि केवल दो-
तीन आदमी काबुल भाग जाने मे सफल हुए। पिंगले तब भी पकडे न गए थे।
पंजाब की गोलमाल के बाद पिंगले भी काशी की तरफ ही आए थे। राह मे वे
भी करतारसिंह की तरह मेरठ छावनी मे विप्लव फैलाने के लिए घुस पडे। इस
प्रकार मेरठ छावनी के एक मुसलमान दफादार के साथ उनकी बातचीत हुई।
उस दफादार ने पिंगले के नजदीक विप्लव की बात मे खूब उत्साह दिखाया और
पिंगले के साथ ही काशी आ गया। किन्तु रासबिहारी ने पिंगले को ऐसे काम
मे हाथ डालने के लिए खास तौर स रोका। उन्होने कहा अब सिपाहियो मे जाने
का काम नही, पर पिंगले निरुत्साह न हुए। अन्त मे दादा को भी इस काम मे
118 / बन्दी जीवन
स्वीकृति देनी पड़ी। पिंगले को सबस बड़े किस्म के दस बम देकर भेजा गया । ये
सब बम इतने बड़े थे कि इनमें से एक भी जिस जगह गिरता उस जगह और कोई
चिह्न तक न रहता। बारकों पर पड़ता तो अनेक बारकें एक ही साथ भूमिसत् हो
जाती । रोलट कमेटी की रिपोर्ट में इन्हीं बमों के सम्बन्ध में लिखा है—Suffi-
cient to annihilate half a regiment अर्थात् आधी रेजिमेंट को समूल
ध्वंस कर देने की शक्ति इन बमों में थी ।—अन्त में रासबिहारी का सन्देह ठीक
ही निकला। उस दफ़ादार ने पिंगले को अपनी छावनी मे ले जाकर बमों सहित
पकड़ा दिया । मेरठ के प्रायः दस-ग्यारह सिपाहियों ने भी बाद में फांसी के तख्ते
पर जीवन दिया ।
जिस समय पिंगले मेरठ गए उसी समय दादा ने मुझसे बंगाल मे कहला भेजा
कि मैं सीधा दिल्ली जाकर वहां के सभी ऊंचे अंग्रेज कर्मचारियों के बंगले इत्यादि
अच्छी तरह देख रखूं । उसी समय दिल्ली में एक बड़ा कांड करने की आयो-
जना चल रही थी । मुझे दादा से सलाह किए बिना दिल्ली जाना ठीक न जंचा
किन्तु पुलिस उस समय मुझे बुरी तरह खोजती थी। काशी जाना उस समय मेरे
लिए बड़ा विपत्तिकर था । पर तो भी मैं काशी आया। मै हमेशा से बेपरवाह
तबीयत का था। मैंने कभी कल्पना भी न की थी कि मुझ पर भी कभी विपत्ति
पड सकती है। अपनी इसी उच्छृंखल निर्भीकता के कारण ही अन्त में मैं पकड़ा
गया । रासबिहारी निर्भीक थे पर उच्छृंखल नहीं।
रात को मुगलसराय स्टेशन पर एक गुप्तचर के साथ मेरी भेंट हुई। किन्तु
मेरी मौसी संग मे थी, इसलिए भागने का कोई चारा न था। बगाल के एक
युवक भी मेरे संग थे और उनके माथ कुछ बम भी थे। उन युवक को सावधान
करके कह आया था कि मेरे साथ इकट्ठे एक गाड़ी में न चढ़ें और स्टेशन पर
मेरे पास से कुछ दूरी पर ही रहें। जो हो, स्टेशन पर कुछ गोलमाल नही हुआ।
मौसी से कह रक्खा था कि मै पकड़ा जाऊँ तो वे अमुक पता बताकर घर पहुंच
जाएं । काशी की ट्रेन प्लेटफार्म पर आई तो वह गुप्तचर मेरे साथ एक ही डिम्बे
में चढा, और न जाने क्यों, वह युवक भी मेरे ही डिब्बे मे आ चढ़े। उस गुप्तचर के
साथ मेरा परिचय था इसलिए उसने पूछा मेरे साथ की महिला कौन है। मुझे
मौसी के साथ निश्चिन्त होकर घर जाते देखकर मालूम हुआ कि गुप्तचर को कुछ
आश्वासन मिला, और शायद उसने सोचा कि बहुत दौड़-धूप करने की कुछ
आवश्यकता नही है। इसके अलावा मालूम होता है उसका सम्बन्ध काशी के खुफिया
विभाग के दारोगा यतीन्द्र मुखोपाध्याय के साथ था, इसलिए कोई गुप्त समाचार
मिलने पर यतीन्द्र के सिवाय और किसी के नजदीक वह प्रकट न करता। अन्दर
का मामला ऐसा ही रहा होगा। इसी से मालूम होता है उस यात्रा में मैं बच
सका । बहुत सवेरे घर आ पहुंचा, और घर पर बहुत थोड़ी देर टिककर फिर
बाहर निकल पड़ा। मेरा रंग-ढंग देखकर घर के सब लोग बड़े दुखी हुए । घर
में सबसे मैंने खुल्लमखुल्ला कह दिया कि किसी समय भी मैं पकड़ा जा सकता
काशी अंचल की कहानी / 119
हूँ। मेरी ताई मेरे दोनों हाथ अपने दोनों हाथों में दबाकर बड़ी अनुनय के साथ
कहने लगीं, "तू क्यों डरता है शची, मैं कहती हूँ तुझे कुछ न होगा, तू घर पर ही
रह।" किन्तु मैंने किसी की कोई बात न सुनी। उस समय मालूम हुआ रात
खतम होकर भोर हुआ चाहता है, चार या साढ़े चार बजे होंगे, मैं घर छोड़कर
रासबिहारी के ठिकाने पर आ ठहरा। फिर दूसरे दिन सुबह के वक्त काशी से
चला गया, उसी दिन सवेरे ही हमारे घर की खानातलाशी हुई। हमारे घर के
सामने ही एक गुप्तचर रहता था। सभी गप्तचरों के मुंह से पुलिस ने मेरे घर आने
की खबर पाई थी, पर घर की तलाशी लेने पर मुझे न पाकर वे सब अत्यन्त
आश्चर्य करने लगे, यहाँ तक कि कई पुलिस वालों ने समझा मैं अभी भागा हूँ और
सड़कों पर दौड़-धूप भी की। पीछे कलकत्ते जाकर सुना कि पुलिस मुझे पकड़ने
आई तो पुलिस के सामने ही, कहते हैं, मैं छतों-छतों पर भागता हुआ गायब हो
गया, और वह सब देखती हुई भी कुछ न कर सकी।
राजपूताना के एक युवक के साथ मैं दिल्ली आ पहुँचा। अपने दल के ही
एक युवक के डेरे पर अतिथि हुआ। दिल्ली में जो करना था सो किया। दिल्ली में
ही पिंगले के साथ भेंट होने की बात थी। उस समय के होम मेम्बर सर रेजिनाल्ड
क्रैडक साहब तब दिल्ली में न थे, और एक-दो और कारण थे, जिससे दिल्ली में
कुछ किया नहीं गया।
दिल्ली में एक दिन बाइक पर घूमते-घूमते सांझ हो गई थी। रास्ते में जगह-
जगह लिखा था शाम को साढ़े छः बजे बत्ती जला लेना चाहिए। मैंने भी बाइक
की बत्ती जला ली। मेरी बत्ती कुछ खराब थी। मैं बाइक पर तेजी से जाते हुए
ज्योंही रास्ते के मोड़ से घूमा त्योंही देखा कि एक अंग्रेज घुड़सवार बड़े रोब से
घोड़ा दौड़ाये चला आता है। मुझे देखते ही मेरी ओर हाथ बढ़ाकर उसने अंगुली
से इशारा किया 'ठहरो', मैं भी झट बाइक से नीचे उतर पड़ा। घुड़सवार ने मेरे
नजदीक आकर प्रश्न किया, "बत्ती क्यों नहीं जलाई ?" तब देखा बाइक की
बत्ती बुझ गई है। मैंने कहा, "बत्ती अभी बुझ गई है हाथ लगाकर देखो अभी
गरम है।" "बत्ती जलाओ" कहकर अंग्रेज घुड़सवार ने घोड़ा छोड़ दिया। मैं कुछ
देर एकटक उस दर्पोन्मत्त अंग्रेज घुड़सवार की ओर देखता रह गया, और सोचने
लगा, "हाय रे ! कब हम भी घोड़े पर चढ़कर इस तरह माथा ऊंचा करके छाती
फुलाये घूमेंगे।"
मेरठ में पिंगले कृतकार्य हों या न हों, दिल्लो में हमें कुछ काम करना था।
इसी बीच समाचारपत्र में पढ़ा, मेरठ छावनी में पिंगले पकड़े गए। और ठीक इस
समय मैं भी बुरी तरह बीमार पड़ गया। लाचार मुझे दिल्ली छोड़नी पड़ी। इस
बीमारी में मैं पन्द्रह दिन तक एक साथ खाट पर पड़ा रहा। दूसरे सप्ताह निमो-
निया के लक्षण भी दिखाई दिए। उस समय जिन युवकों ने मेरी सेवा की थी उनके
यत्न की बात मैं जीवन-भर भूल नहीं सकता। मुझे उस समय उठने की भी ताक़त
न थी। उस समय वही युवकगण मेरा मल-मूत्र तक साफ करते थे।
120 / बन्दी जीवन
उधर पंजाब में लाहोर षड्यन्त्र के मामले की सुनवाई आरम्भ हो गई ।
लाहोर के मामले में शायद अनेक बातें सुनने लायक हैं। किन्तु मुझे इस विषय
में कुछ विशेष नहीं कहना है ।
इस प्रसंग में सबसे पहले यह बात ध्यान में आती है कि इस मामले में सौ
विप्लवियों में से प्रायः दस व्यक्ति विप्लव धर्म को तिलांजलि देकर अपने ही
बन्धुओं को विपत्ति के मुंह में डालने से भी नही चूके । इन सब मुखबिरों के विषय
में देश मे अनेक आलोचनाएँ हुई हैं। इन्हीं को देखकर ही बहुत लोगों की विप्ल-
वियों के विषय में बड़ी हीन धारणा हो गई है। पर एक बात याद रहे कि ईसा-
मसीह के शिष्यों में भी विश्वासघातकता का दृष्टांत पाया जाता है। मसीह-जैसे
महापुरुष के सम्पर्क में आने के बाद भी मनुष्य का अधःपतन हो जाता है। तब
अन्य स्थानों में ऐसा अधःपतन हो जाने में आश्चर्य ही क्या है ?¹ हमारा विश्वास
है कि विप्लव का काम जितना आगे बढ़ेगा विश्वासघातकता भी उसी परिमाण
में बढ़ेगी। इन सब षड्यन्त्र के मामलों में जैसे एक तरफ विश्वासघात के दृष्टांत
पाये जाते है, वैसे ही दूसरी तरफ वीरता की भी अद्भुत कीर्ति हम देख पाते हैं ।
जो हो, लाहोर षड्यन्त्र के मामले की केवल दो बातें मैं पाठकों को देता हूँ ।—
अदालत में विचार के समय ज्वालासिंह नामी एक सिक्ख ने अभियुक्तों के शिनाख्त
के विषय में एक उज्ज्र पेश किया। केवल इसी अपराध पर जेल के सुपरिण्टेण्डेण्ट
ने उन्हें तीस बेतों की सज़ा दी। आश्चर्य की बात है कि पजाब में कही भी इसका
ज़रा भी प्रतिवाद नहीं हुआ । करतारसिंह ने मुकद्दमे के समय अदालत में सब
बातें स्वीकार कर ली पर अंग्रेज़ जज ने पहले दिन उनकी किसी बात को दर्ज
नहीं किया । उन्होंने करतारसिंह को समझाकर कहा कि उनकी स्वीकारोक्ति से
उनका अपना Case बहुत खराब हो जायगा । इस पर भी करतारसिंह ने अपना
मत न बदला । उन्होंने सब घटनाओं का दायित्व स्वयं अपने ही सिर पर लिया ।
विवश होकर जज ने कहा, “करतारसिंह आज मैंने तुम्हारी कोई भी बात नहीं
सुनी तुम्हें एक दिन का और समय देता हूँ । अच्छी तरह सोच-विचारकर कल जो
- नागपुर के झण्डा सत्याग्रह में 1764 स्वयंसेवकों में से दो सौ से अधिक माफ़ी मांगकर
छूट गये थे । यह भी न भूलना होगा कि इन स्वेच्छा-सेवकों को सारा देश एक आवाज़ से
प्रोत्साहन और साधुवाद दे रहा था, चारो तरफ धन्य-धन्य की गूंज सुन पड़ती थी, इनके,
सगे-सम्बन्धी इनकी वीरता पर अभिमान करते थे, यहाँ तक कि बहुतों की स्त्रियां और
बहने 'युद्ध-क्षेत्र' में साथ उपस्थित थीं और जेल में साथ जाने तक को तैयार थीं । दूसरी
तरफ यदि ये लोग सिर न झुकाते तो इन्हें औसतन केवल तीन मास की सादी या कड़ी
क़ैद मिलती । षड्यन्त्र के अभियुक्तों के लिए प्रत्येक बात इससे ठीक उलटी थी । कहना
पड़ता है भारतवासियों की रीढ़ की हड्डी अभी तक भी बहुत कमज़ोर है और वे गर्दन
सीधी करके खड़ा होना नहीं जानते । आध्यात्मिकता की कितनी ही डींगें हांका करें,
घटनाएं सिद्ध करती हैं कि चरित्र-बल में वे संसार की सब स्वतन्त्र जातियों से पीछे हैं।
काशी अंचल की कहानी / 121
कहना हो वह कहना।'" दूसरे दिन फिर करतारसिंह ने सब दायित्व अपने ही सिर
पर ले लिया। उनकी शान्त वीरता पर सब मुग्ध हो गये। भारत के इतिहास मे
करतारसिंह का नाम सदा अमर रहेगा। भारत के विप्लव युग को भी करतार-
सिंह ने स्मरणीय कर दिया।
इस षड्यन्त्र के मामले मे लाहौर डी० ए० वी० कालेज के भूतपूर्व अध्यापक
भाई परमानन्द भी पकड़े गए, उन्हे भी अन्त में आजन्म कालेपानी का दण्ड
मिला। लाहौर जेल में रहते समय वे करतारसिंह के पास की कोठरी ही मे बन्द
थे। उस समय प्रायः सभी राजनैतिक अपराधी एक ही बैरक मे बन्द रहते थे।
गत को वे सभी अपनी-अपनी कोठरी से एक-दूसरे के साथ गप-शप करते थे। कहते
है एक दिन भाई परमानन्द ने करतारसिंह से कहा "देखो यदि मालूम होता
कि अन्त मे मुझे भी यही दुर्गति भोगनी होगी तो मै भी तुम्हारे काम मे पूरा उद्यम
से योग देता !" भाई परमानन्द के एक ओर करतारसिंह थे और दूसरी ओर की
कोठरी मे एक और सिक्ख थे। वे अब भी बचे हुए है और इन्ही से मैने उक्त
घटना अण्डमन में सुनी थी।
3
दिल्ली में
(1) प्रताप की कहानी
राजपूताना के जिस युवक के साथ मै दिल्ली गया उसका नाम था प्रताप-
सिंह । ये राजपूताना के चारण वंश के थे । चारण लोग राजपूतो मे पूज्य माने
जाते है । प्रताप के पिता का नाम था सरदार केशरीसिंह । वे उदयपुर के राणा
के विशेष प्रिय थे और अब मुझे ठीक याद नही, या तो प्रताप के पिता या उनके '
दादा उदयपुर के राणा के मन्त्री पद तक पहुंचे थे । उनकी जागीर मेवाड के
अन्तर्गत शाहपुरी राज्य में थी ।
एक दिन था, जब यही राजपूताना वीरो का लीला-निकेतन कहा जाता था,
एक दिन इसी राजपूताना में भीष्म के समान महापुरुषों का भी आविर्भाव हुआ
था, बंगाल की कल्पना दृष्टि में शायद आज भी राजपूताना उसी अतीत युग की
शूरता, वीरता और उदारता की प्रतिमूर्ति-रूप ही प्रतीत होता है, किन्तु पौराणिक
युग का वह गौरवमण्डित राजपूताना आज नहीं है । तथापि राजपूताना के आज
बिलकुल अधःपतित हो जाने पर भी उस अतीत युग के संस्कार आज भी प्रत्येक
राजपूतानावासी के हृदय में अंकित हैं । प्रताप-परिवार की कहानी देखकर यह
बात मेरे मन में स्वतः जाग उठती है ।
यह परिवार राजपूताना के गण्य-मान्य समृद्ध ज़मीदारों में गिना जाता था,
किन्तु स्वदेश-प्रीति और तेजस्विता की खातिर इन्हें अपना घर-बार बरबाद करना
पड़ा ।
सबसे पहले दिल्ली षड्यन्त्र के मामले के सम्बन्ध में प्रताप और प्रताप के
बहनोई पकड़े गए । किन्तु उनके विरुद्ध कोई विशेष प्रमाण न रहने से उस बार
उनका छुटकारा हो गया । इसके कुछ ही दिन बाद कोटा में ही एक और राज-
नैतिक मामले में प्रताप के पिता सरदार केशरीसिंहजी को आजन्म कालेपानी का
दण्ड हुआ और, प्रताप के एक सगे चचा के नाम भी वारण्ट निकला, सम्भवतः
आज भी वे पकड़े नहीं गए । केशरीसिंहजी का स्वास्थ्य अच्छा न रहने से उन्हें
अण्डमन नहीं जाना पड़ा, देश की जेलों में ही रहना पड़ा ।¹
- बाद में जुलाई सन् 1919 में उन्हें छोड़ दिया गया था पर उनके भाई का वारंट अभी
तक नहीं हटाया गया ।
दिल्ली में / 123
इस मामले के फलस्वरूप सरदार केशरीसिंहजी की और उनके छोटे भाई की
समूची सम्पत्ति तो ज़ब्त हुई ही, इसके अलावा उनके जो भाई राजनीति के पास
फटकते भी न थे, उनकी भी सारी सम्पत्ति ज़ब्त हो गई। इस तरह वे समृद्ध-
सम्पन्न जागीरदार की अवस्था से एकदम रास्ते के भिखारी हो गए। प्रताप की
माता के दुःखों की उस समय सीमा न थी, आज एक सम्बन्धी के पास रहतीं तो
कल दूसरे सम्बन्धी के घर जाकर अतिथि बनतीं। अन्त में अपने पिता के घर
जाकर किसी तरह दिन काटती रहीं, प्रताप के मामा के घर की हालत भी विशेष
अच्छी न थी। विधाता जब किसी के प्रति निर्दय होते हैं तब उनकी निष्ठुरता के
निकट संसार की सब निष्ठुरता फीकी पड़ जाती है और वे जिनको वीर बनाकर
उठाते हैं, उनके वीरत्व के निकट भगवान् की निष्ठुरता भी हार मानने को बाध्य
होती है। इसी से इतनी विपत्ति में पड़कर भी प्रतापसिंह बराबर विप्लव दल में
काम करते रहे। काम करने-करने में भी अन्तर है, केवल कर्त्तव्य ज्ञान से काम
करना एक बात है, और काम करके आनन्द पाना दूसरी बात; हमारा विचार है
कि काम करके आनन्द पाया जाय यही हमारा कर्त्तव्य है; अर्थात् जैसा काम करके
मन में किसी तरह का अनुताप-परिताप न हो, जैसा काम करने से मन में और
प्राण में ग्लानि की कोई सूचना भी न हो और सबसे बढ़कर जैसा काम करने से
मनुष्य साक्षात् रूप से आनन्द भी पाये, हमारा विचार है वैसा काम ही मनुष्य का
कर्त्तव्य है और जो करके मनुष्य आनन्द तो पाये ही नहीं, प्रत्युत उससे क्लेश का
आभास हो वह काम करना मनुष्य को उचित नहीं। वैसी स्थिति में मानना होगा
कि अनधिकार चेष्टा की जा रही है, क्योंकि वैसी स्थिति में आनन्द अथवा तृप्ति
कुछ भी नहीं होती। अर्थात् लज्जा की खातिर, लोक-निन्दा के भय से कर्त्तव्य-
कार्य में योग देना एक बात है, और कर्त्तव्य-कार्य करके सचमुच आनन्द पाना दूसरी
बात। प्रताप ने जो अपनी पारिवारिक अवस्था के भीषण संकट-काल में भी इस
प्रकार विप्लव कार्य में योग दिया था उससे उनके दिल के किसी कोने में किसी
तरह की ग्लानि अथवा संकोच तो था ही नहीं, वरन् विपत्ति की ऐसी कराल
मूर्ति आँखों से देखकर भी वे पिता के अभिप्रेत प्रिय कार्य में फिर भी अपने को
लगा सके, इससे उनका दिल आनन्द और गर्व से फूल उठता था। ऐसे बहुत
सज्जन देखे गये हैं जो केवल कर्त्तव्य की खातिर अथवा बन्धुत्व को निभाने के लिए
ही इस विप्लव कार्य मे योग देते थे, इसी से उनके कार्य में वैसा उत्साह न देखा
जाता था और इसीलिए वे अधिकांश समय मुरझाये से रहते थे। ऐसा भाव देख-
कर हम उन्हें अधिक दिन यह विडम्बना न भोगने देते, और शीघ्र ही निर्विवाद
रूप से आनन्द भोगने का अवसर दे देते थे, जिससे वे छुटकारा पाकर शान्ति से
दम ले सकें। किन्तु जब-जब ऐसा नहीं किया गया है, जब-जब प्रकृति और प्रवृत्ति
के विरुद्ध आचरण किया गया है, तब-तब प्रकृति देवी ने अपना पूरा बदला चुकाया
है। प्रताप वैसे कर्त्तव्य की खातिर ही उस कार्य में योग न देते थे। उन जैसे युवक
मैंने बहुत ही कम देखे हैं। प्रताप केवल स्वयं ही आनन्द में रहते हों सो नहीं,
124 / बन्दी जीवन
उनके संग में जो रहते थे वे भी आनन्द पाते थे । तो भी बीच-बीच में प्रताप का
मन माता-पिता के लिए अधीर न होता हो सो नहीं, हमारा तो विचार है कि
जिसका मन ऐसी अवस्था में माता-पिता के लिए अधीर न होता हो उसका
विश्वास करना उचित नहीं है। माया-मोह का एकदम अभाव होना एक बात है,
और माया-मोह में लिप्त न होना दूसरी बात । मनुष्य की दृष्टि से मैं तो उन्हीं को
श्रेष्ठ कहूँगा जिनके स्वभाव में माया-मोह की पूरी सत्ता है किन्तु जो माया-मोह
में लिप्त नहीं होते। इसी से प्रताप को जब दुःखी देखता तब मेरे प्राणों में बड़ी
ही व्यथा होती । किन्तु कार्य-क्षेत्र में जब देखता प्रताप किसी से भी पीछे नहीं है
तब फिर वैसा ही आनन्द भी प्रतीत होता ।
भले-बुरे का द्वंद्व भी प्रताप के अंतःकरण में चरम अवस्था तक जा पहुँचा
था। प्रताप के पकड़े जाने पर पुलिस बहुत दिन तक अनेक प्रकार के प्रलोभन
दिखाकर उन्हें सब गुप्त बातें प्रकट कर देने के लिए विशेष तंग करती रही। पुलिस
प्रताप से कहती कि सब गुप्त बातें कह देने पर केवल प्रताप को ही नहीं वरन्
उसके पिता को भी छोड़ दिया जायगा; यही नहीं उसके चाचा पर से भी
मुकद्दमा उठा लिया जायगा, उनकी सब सम्पत्ति फिर लौटा दी जायगी, और इस
सबके अलावा और भी कुछ पुरस्कार दिया जायगा। प्रताप की माता ने कितना
कष्ट पाया है, प्रताप के भी दण्डित हो जाने से माता की अवस्था कैसी शोचनीय
हो जायगी और इस आघात को वे कैसे सह सकेंगी, यह सब बातें पुलिस अपनी
स्वभावसिद्ध चतुराई के साथ बार-बार समझाती थी। पुलिस की ये सब बातें
बिल्कुल निर्मूल हों सो भी तो न था। पहले-पहल तो वे पुलिस के साथ ज्यादा
देर ठीक तरह बात ही न करते थे । पीछे उन लोगों के साथ बात करना प्रताप
को मानो कुछ-कुछ भला लगने लगा। एक दिन पुलिसवालों के साथ प्रताप की
क़रीब तीन-चार घंटे बातचीत हुई। हम सब पास की निर्जन कोठरी में बैठे-बैठे
दम थामकर ज़मीन-आसमान की बातें सोचने लगे, सन्देह हुआ कि अब की बार
प्रताप फूट पड़ेगा । पीछे मुकद्दमा आरम्भ होने पर जब हम सबको प्रायः दिनभर
इकट्ठा रहने का सुयोग मिला तब मालूम हुआ कि सच ही प्रताप का मन बहुत
विचलित हो गया था। यहां तक कि अन्त में एक दिन प्रताप ने पुलिस से कह
दिया कि वे एक दिन और सब बातों पर विचार कर लें फिर कहना होगा तो
कह देंगे। किन्तु अगले दिन जब पुलिस प्रताप से मिलने आई, प्रताप बोले, "देखिए
बहुत सोचा-विचारा अन्त में तय किया है कि कोई बात नहीं खोलूँगा। अभी तक
तो केवल मेरी ही माता कष्ट पा रही हैं, किन्तु यदि मैं गुप्त बातें प्रकट कर दूं तो
और भी कितने लोगों की माताएँ ठीक मेरी माता के समान दुःख पाएँगी, एक माँ
के बदले और कितनी माताओं को तब हाहाकार करना होगा।"-मन के एक
बार नीचे फिसल पड़ने पर उसे फिर अपनी जगह लौटा लाना कितना कठिन कार्य
है, यह चिन्ताशील व्यक्ति ही समझ सकते हैं ।
नहीं मालूम, आज भारत में कितने ऐसे पिता हैं, जो सरदार केशरीसिंहजी
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की तरह सब जान-बूझकर अपने को और अपनी सन्तान को इस प्रकार देश के
कार्य में बलि दे सकेंगे। भारत का दुर्भाग्य है कि प्रताप-सा युवक आज इस जगत्
में नहीं है। बरेली जेल में अंग्रेज़ों का दण्ड भोगते-भोगते उसका नश्वर शरीर उस
दिव्य आत्मा का साथ न निबाह सका। इसी प्रताप के साथ मैं दिल्ली गया था
और कई दिन तक इकट्ठे काम करने का अवसर पाया था। उस समय प्रताप की
आयु लगभग बाईस बरस की रही होगी। दिल्ली में, हमने इस यात्रा में कितना
काम किया यह दूसरे परिच्छेद में लिखा जायगा।
(2) मुसलमान विप्लवदल की कहानी
पहले ही कह चुके हैं कि पंजाब का विप्लवायोजन विफल हो जाने के बाद
मुसलमान विप्लव संघ के साथ हमारे दल का पहले-पहल परिचय हुआ। इस
बार दिल्ली में रहते समय इस विप्लव दल के साथ हमें और भी घनिष्ठ परिचय
करने का अवकाश मिला।
इस मुसलमान विप्लव दल के विषय में हमारे देशवासी एकदम कुछ भी
नही जानते; कारण, कि इनका काम-काज प्रकट रूप से कुछ भी दिखाई नहीं
दिया। गत तुर्की इटैलियन युद्ध के समय से ही भारत मे इस विप्लवदल का
सूत्रपात हुआ है। उसी युद्ध के समय, शायद 1911 ई० में, भारत के मुसलमानों
ने युद्ध में घायलों की सेवा-सुश्रूषा करने के लिए तुर्की में एक दल (Medical
Mission) भेजा। उस दल में अधिकतर मुसलमान लोग ही थे। पंजाब के
'ज़मींदार' पत्र के सम्पादक श्रीयुत ज़फ़रअलीखाँ भी उस दल में थे।
इस दल ने तुर्की के सुलतान और अन्यान्य स्वदेश-प्रेमी मुसलमान सेनापतियों
और राजकर्मचारियो के निकट विशेष सम्मान और आदर पाया। मेरे एक मुसल-
मान बन्धु मुझसे कहते थे कि उसी आदर की अधिकता से उनका माथा गर्म
हो गया था। जिन्हें भारत में पग-पग पर लांछन और अपमान सहना होता था,
उन्हें जब तुर्की में राजा के अतिथि रूप में राजसम्मान के साथ समग्र तुर्की में
भ्रमण करने का सुयोग मिला तब उनका माथा गर्म होना ही चाहिए था।
भारत की आबहवा में रहकर इतने दिन तक मुसलमान समाज में किसी चेतना के
लक्षण दिखाई नही दिए, किन्तु जब इसी मुसलमान दल के लोग तुर्की की स्वाधीन
आबहवा के स्पर्श में आए और जब उन्होंने देखा कि आज भी उनके स्वधर्मी
लोगो ने यूरोपवालों के देश में भी अपना आधिपत्य बराबर बना रखा है, और
ऐसे एक स्वधर्मावलम्बी राज्य के बाल-वृद्ध-वानता तक, प्रत्येक व्यक्ति ने
जब भारतीय मुसलमान दल को आदर के साथ अपनाया, तब उनकी कितने ही
समय की मोह-निद्रा मानो पल-भर में उड़ गई, सहसा भारतीय मुसलमानों ने
अपने को पहचान लिया। तुर्की इटैलियन युद्ध के फलस्वरूप भारतीय मुसलमान
समाज में साधारण रूप से एक जागृति के लक्षण दिखाई दिए थे। काशी में देखा,
धुनिये-जुलाहे और गाडीवान तक रोज़ तुर्की का संवाद जानने के लिए व्यस्त रहते
थे। स्वधर्मी लोगों की समवेदना किसी मुसलमान को कष्ट के साथ अर्जन नहीं