बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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दिल्ली में
(1) प्रताप की कहानी
राजपूताना के जिस युवक के साथ मै दिल्ली गया उसका नाम था प्रताप-
सिंह । ये राजपूताना के चारण वंश के थे । चारण लोग राजपूतो मे पूज्य माने
जाते है । प्रताप के पिता का नाम था सरदार केशरीसिंह । वे उदयपुर के राणा
के विशेष प्रिय थे और अब मुझे ठीक याद नही, या तो प्रताप के पिता या उनके '
दादा उदयपुर के राणा के मन्त्री पद तक पहुंचे थे । उनकी जागीर मेवाड के
अन्तर्गत शाहपुरी राज्य में थी ।
एक दिन था, जब यही राजपूताना वीरो का लीला-निकेतन कहा जाता था,
एक दिन इसी राजपूताना में भीष्म के समान महापुरुषों का भी आविर्भाव हुआ
था, बंगाल की कल्पना दृष्टि में शायद आज भी राजपूताना उसी अतीत युग की
शूरता, वीरता और उदारता की प्रतिमूर्ति-रूप ही प्रतीत होता है, किन्तु पौराणिक
युग का वह गौरवमण्डित राजपूताना आज नहीं है । तथापि राजपूताना के आज
बिलकुल अधःपतित हो जाने पर भी उस अतीत युग के संस्कार आज भी प्रत्येक
राजपूतानावासी के हृदय में अंकित हैं । प्रताप-परिवार की कहानी देखकर यह
बात मेरे मन में स्वतः जाग उठती है ।
यह परिवार राजपूताना के गण्य-मान्य समृद्ध ज़मीदारों में गिना जाता था,
किन्तु स्वदेश-प्रीति और तेजस्विता की खातिर इन्हें अपना घर-बार बरबाद करना
पड़ा ।
सबसे पहले दिल्ली षड्यन्त्र के मामले के सम्बन्ध में प्रताप और प्रताप के
बहनोई पकड़े गए । किन्तु उनके विरुद्ध कोई विशेष प्रमाण न रहने से उस बार
उनका छुटकारा हो गया । इसके कुछ ही दिन बाद कोटा में ही एक और राज-
नैतिक मामले में प्रताप के पिता सरदार केशरीसिंहजी को आजन्म कालेपानी का
दण्ड हुआ और, प्रताप के एक सगे चचा के नाम भी वारण्ट निकला, सम्भवतः
आज भी वे पकड़े नहीं गए । केशरीसिंहजी का स्वास्थ्य अच्छा न रहने से उन्हें
अण्डमन नहीं जाना पड़ा, देश की जेलों में ही रहना पड़ा ।¹
- बाद में जुलाई सन् 1919 में उन्हें छोड़ दिया गया था पर उनके भाई का वारंट अभी
तक नहीं हटाया गया ।