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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 119, कुल 408 में से

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पृष्ठ 119

काशी अंचल की कहानी / 117
हुई है। कुछ दिन बाद विनायकराव कापले के घर की भी तलाशी हुई।
विनायक उस समय गगा स्नान करके लौट रहे थे। वे रहते थे भाडे के मकान
पर, किन्तु भोजन करते थे अपने ही मकान पर। मकान के नजदीक आने पर
विनायक ने सुना कि उनके मकान पर अनेक साहब लोग उनकी प्रतीक्षा कर रहे
हैं। यह बात सुनते ही विनायक भी अन्तर्धान हो गए। इस प्रकार पुलिस किसी
को भी न पा सकी। उस समय भी रासबिहारी काशी मे ही रहे।
जिस समय सरकार की तरफ का गवाह विभूति स्पेशल ट्राइब्यूनल की अदा-
लत मे इन सब बातो का विवरण करने लगा उस समय अदालत के जज भी आंखे
फाडकर केवल विभूति के मुंह की ओर ताकते रहे और कुछ देर के लिए नोट
लिखना भी भूल गए। सरकारी कौन्सल और हमारी ओर के वकील-बैरिस्टर
आदि भी वैसे ही आग्रह और अचम्भे के साथ निर्वाक् होकर रासबिहारी के
अद्भुत कामो की कहानी सुनने लग गए, और बीच-बीच म कोई-कोई हमारी
ओर मुंह करके धीरे से बोल उठते—"ओह, रासबिहारी की ऐसी हिम्मत है !"
हम भी उस समय आनन्द और गर्व से गद्गद् हो जाते थे। एक बार विभूति के
मुंह की ओर देखकर समझने की चेष्टा की थी कि विभूति क्या सोचता है। ख्याल
आता है कि मन मे उस समय इस बात का दुःख हुआ था कि विभूति क्यो
हमारे गर्व और आनन्द मे भाग नही लेता। इस समय ठीक याद नही आता कि
विभूति भी सचमुच ऐसी मुखबरी करने के बाद गर्व अनुभव करता था कि
नही।
इस प्रकार काशी के अनेक युवक बगाल मे आकर इकट्ठे हो गए। जिन
लोगो का पजाब से कोई सीधा सम्बन्ध न हुआ था, अर्थात् जिनका नाम-धाम
पजाब मे कोई न जानता था, वे काशी मे ही रहे। ऐसे युवको की संख्या कम न
थी, और इसीलिए ऐसे भीषण सकट के समय भी रासबिहारी बेखटके काशी मे
रह सके थे। जिन युवको को कोई विप्लवी रूप से नही जानता, जिन पर कोई
सन्देह भी नही करता, ऐसे लोगो की संख्या जिस विप्लव दल मे जितनी अधिक
हो उतना ही वह दल बलशाली और कार्यक्षम होता है।
काशी मे हम लोग इस प्रकार सतर्क हो गए, पर पजाब के नेताओ मे से
लगभग सभी एक-एक करके पकड लिए गए। डा० मथुरासिह आदि केवल दो-
तीन आदमी काबुल भाग जाने मे सफल हुए। पिंगले तब भी पकडे न गए थे।
पंजाब की गोलमाल के बाद पिंगले भी काशी की तरफ ही आए थे। राह मे वे
भी करतारसिंह की तरह मेरठ छावनी मे विप्लव फैलाने के लिए घुस पडे। इस
प्रकार मेरठ छावनी के एक मुसलमान दफादार के साथ उनकी बातचीत हुई।
उस दफादार ने पिंगले के नजदीक विप्लव की बात मे खूब उत्साह दिखाया और
पिंगले के साथ ही काशी आ गया। किन्तु रासबिहारी ने पिंगले को ऐसे काम
मे हाथ डालने के लिए खास तौर स रोका। उन्होने कहा अब सिपाहियो मे जाने
का काम नही, पर पिंगले निरुत्साह न हुए। अन्त मे दादा को भी इस काम मे