बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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स्वीकृति देनी पड़ी। पिंगले को सबस बड़े किस्म के दस बम देकर भेजा गया । ये
सब बम इतने बड़े थे कि इनमें से एक भी जिस जगह गिरता उस जगह और कोई
चिह्न तक न रहता। बारकों पर पड़ता तो अनेक बारकें एक ही साथ भूमिसत् हो
जाती । रोलट कमेटी की रिपोर्ट में इन्हीं बमों के सम्बन्ध में लिखा है—Suffi-
cient to annihilate half a regiment अर्थात् आधी रेजिमेंट को समूल
ध्वंस कर देने की शक्ति इन बमों में थी ।—अन्त में रासबिहारी का सन्देह ठीक
ही निकला। उस दफ़ादार ने पिंगले को अपनी छावनी मे ले जाकर बमों सहित
पकड़ा दिया । मेरठ के प्रायः दस-ग्यारह सिपाहियों ने भी बाद में फांसी के तख्ते
पर जीवन दिया ।
जिस समय पिंगले मेरठ गए उसी समय दादा ने मुझसे बंगाल मे कहला भेजा
कि मैं सीधा दिल्ली जाकर वहां के सभी ऊंचे अंग्रेज कर्मचारियों के बंगले इत्यादि
अच्छी तरह देख रखूं । उसी समय दिल्ली में एक बड़ा कांड करने की आयो-
जना चल रही थी । मुझे दादा से सलाह किए बिना दिल्ली जाना ठीक न जंचा
किन्तु पुलिस उस समय मुझे बुरी तरह खोजती थी। काशी जाना उस समय मेरे
लिए बड़ा विपत्तिकर था । पर तो भी मैं काशी आया। मै हमेशा से बेपरवाह
तबीयत का था। मैंने कभी कल्पना भी न की थी कि मुझ पर भी कभी विपत्ति
पड सकती है। अपनी इसी उच्छृंखल निर्भीकता के कारण ही अन्त में मैं पकड़ा
गया । रासबिहारी निर्भीक थे पर उच्छृंखल नहीं।
रात को मुगलसराय स्टेशन पर एक गुप्तचर के साथ मेरी भेंट हुई। किन्तु
मेरी मौसी संग मे थी, इसलिए भागने का कोई चारा न था। बगाल के एक
युवक भी मेरे संग थे और उनके माथ कुछ बम भी थे। उन युवक को सावधान
करके कह आया था कि मेरे साथ इकट्ठे एक गाड़ी में न चढ़ें और स्टेशन पर
मेरे पास से कुछ दूरी पर ही रहें। जो हो, स्टेशन पर कुछ गोलमाल नही हुआ।
मौसी से कह रक्खा था कि मै पकड़ा जाऊँ तो वे अमुक पता बताकर घर पहुंच
जाएं । काशी की ट्रेन प्लेटफार्म पर आई तो वह गुप्तचर मेरे साथ एक ही डिम्बे
में चढा, और न जाने क्यों, वह युवक भी मेरे ही डिब्बे मे आ चढ़े। उस गुप्तचर के
साथ मेरा परिचय था इसलिए उसने पूछा मेरे साथ की महिला कौन है। मुझे
मौसी के साथ निश्चिन्त होकर घर जाते देखकर मालूम हुआ कि गुप्तचर को कुछ
आश्वासन मिला, और शायद उसने सोचा कि बहुत दौड़-धूप करने की कुछ
आवश्यकता नही है। इसके अलावा मालूम होता है उसका सम्बन्ध काशी के खुफिया
विभाग के दारोगा यतीन्द्र मुखोपाध्याय के साथ था, इसलिए कोई गुप्त समाचार
मिलने पर यतीन्द्र के सिवाय और किसी के नजदीक वह प्रकट न करता। अन्दर
का मामला ऐसा ही रहा होगा। इसी से मालूम होता है उस यात्रा में मैं बच
सका । बहुत सवेरे घर आ पहुंचा, और घर पर बहुत थोड़ी देर टिककर फिर
बाहर निकल पड़ा। मेरा रंग-ढंग देखकर घर के सब लोग बड़े दुखी हुए । घर
में सबसे मैंने खुल्लमखुल्ला कह दिया कि किसी समय भी मैं पकड़ा जा सकता