बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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उधर पंजाब में लाहोर षड्यन्त्र के मामले की सुनवाई आरम्भ हो गई ।
लाहोर के मामले में शायद अनेक बातें सुनने लायक हैं। किन्तु मुझे इस विषय
में कुछ विशेष नहीं कहना है ।
इस प्रसंग में सबसे पहले यह बात ध्यान में आती है कि इस मामले में सौ
विप्लवियों में से प्रायः दस व्यक्ति विप्लव धर्म को तिलांजलि देकर अपने ही
बन्धुओं को विपत्ति के मुंह में डालने से भी नही चूके । इन सब मुखबिरों के विषय
में देश मे अनेक आलोचनाएँ हुई हैं। इन्हीं को देखकर ही बहुत लोगों की विप्ल-
वियों के विषय में बड़ी हीन धारणा हो गई है। पर एक बात याद रहे कि ईसा-
मसीह के शिष्यों में भी विश्वासघातकता का दृष्टांत पाया जाता है। मसीह-जैसे
महापुरुष के सम्पर्क में आने के बाद भी मनुष्य का अधःपतन हो जाता है। तब
अन्य स्थानों में ऐसा अधःपतन हो जाने में आश्चर्य ही क्या है ?¹ हमारा विश्वास
है कि विप्लव का काम जितना आगे बढ़ेगा विश्वासघातकता भी उसी परिमाण
में बढ़ेगी। इन सब षड्यन्त्र के मामलों में जैसे एक तरफ विश्वासघात के दृष्टांत
पाये जाते है, वैसे ही दूसरी तरफ वीरता की भी अद्भुत कीर्ति हम देख पाते हैं ।
जो हो, लाहोर षड्यन्त्र के मामले की केवल दो बातें मैं पाठकों को देता हूँ ।—
अदालत में विचार के समय ज्वालासिंह नामी एक सिक्ख ने अभियुक्तों के शिनाख्त
के विषय में एक उज्ज्र पेश किया। केवल इसी अपराध पर जेल के सुपरिण्टेण्डेण्ट
ने उन्हें तीस बेतों की सज़ा दी। आश्चर्य की बात है कि पजाब में कही भी इसका
ज़रा भी प्रतिवाद नहीं हुआ । करतारसिंह ने मुकद्दमे के समय अदालत में सब
बातें स्वीकार कर ली पर अंग्रेज़ जज ने पहले दिन उनकी किसी बात को दर्ज
नहीं किया । उन्होंने करतारसिंह को समझाकर कहा कि उनकी स्वीकारोक्ति से
उनका अपना Case बहुत खराब हो जायगा । इस पर भी करतारसिंह ने अपना
मत न बदला । उन्होंने सब घटनाओं का दायित्व स्वयं अपने ही सिर पर लिया ।
विवश होकर जज ने कहा, “करतारसिंह आज मैंने तुम्हारी कोई भी बात नहीं
सुनी तुम्हें एक दिन का और समय देता हूँ । अच्छी तरह सोच-विचारकर कल जो
- नागपुर के झण्डा सत्याग्रह में 1764 स्वयंसेवकों में से दो सौ से अधिक माफ़ी मांगकर
छूट गये थे । यह भी न भूलना होगा कि इन स्वेच्छा-सेवकों को सारा देश एक आवाज़ से
प्रोत्साहन और साधुवाद दे रहा था, चारो तरफ धन्य-धन्य की गूंज सुन पड़ती थी, इनके,
सगे-सम्बन्धी इनकी वीरता पर अभिमान करते थे, यहाँ तक कि बहुतों की स्त्रियां और
बहने 'युद्ध-क्षेत्र' में साथ उपस्थित थीं और जेल में साथ जाने तक को तैयार थीं । दूसरी
तरफ यदि ये लोग सिर न झुकाते तो इन्हें औसतन केवल तीन मास की सादी या कड़ी
क़ैद मिलती । षड्यन्त्र के अभियुक्तों के लिए प्रत्येक बात इससे ठीक उलटी थी । कहना
पड़ता है भारतवासियों की रीढ़ की हड्डी अभी तक भी बहुत कमज़ोर है और वे गर्दन
सीधी करके खड़ा होना नहीं जानते । आध्यात्मिकता की कितनी ही डींगें हांका करें,
घटनाएं सिद्ध करती हैं कि चरित्र-बल में वे संसार की सब स्वतन्त्र जातियों से पीछे हैं।