आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
। ' '५१५' '
नापि तदाक्षेपप्रतिषेधाभ्यां वृक्षत्व-शिंशपात्ववत्, परापर-
भावानभ्युपगमात् ।
अभ्युपगमे वा समर्थस्याप्यकरणमसमर्थस्यापि वा करणं
प्रसज्येत ।
बाधदोष¹ तथा कारित्व साध्य रहा तो सामर्थ्य-हेतु नहीं रह सकना, इस
प्रकार असिद्धि दोष आ जाता है । एवं कारित्व हेतुसे सामर्थ्य सिद्ध
करनेमें भी बाध और असिद्धि दोष हो जायगा । क्योंकि विरोधके कारण
हेतुके रहनेपर साध्य नहीं रहेगा और साध्यके रहनेपर हेतु ही नहीं रह
सकेगा । ऐसे ही अकारित्व हेतुसे असामर्थ्यरूप साध्यका अनुमान
करनेमे भी बाध और असिद्धि दोष हो जाते हैं। क्योंकि अकारित्व
रहने पर सामर्थ्यके न होनेसे बाध होगा तथा असामर्थ्य रहने पर
कारित्वका न रहना ध्रुव होनेसे अकारित्व हेतुमे स्वरूपासिद्धि दोष हो
जायगा । इस तरह कुशूल-( बखारी ) स्थ और क्षेत्रस्थ बीजमे पूर्वोक्त
प्रकारसे दिखाया गया प्रसङ्ग और विपर्यय-रूप अनुमान ही दूषित
हो जाता है और क्षणिकत्वसिद्धिके योग्य नहीं रह जाता है ।
"सामर्थ्य और कारित्वरूप व्यावृत्तियोंका वृक्षत्व और शिंशपात्व-
के समान कुछका ग्रहण और कुछका परित्याग कर आंशिक विरोध भी
मानना ठीक नहीं है। अर्थात् जैसे शिंशपात्व-धर्म वृक्षत्वके साथ
सीसमके वृक्षमे रहता भी है, और वृक्षत्व-धर्म वाले आम्रादि वृक्षों-
का परित्याग भी करता है, वैसे ही सामर्थ्य और कारित्व-धर्ममे भी
परस्पर आंशिक विरोध रहेगा और उतनेसे ही दोनों व्यावृत्तियोंमें
भेदकी सिद्धि हो जायगी" यह भी नहीं कह सकते हो । क्योंकि वृक्षत्व
और शिंशपात्वके समान सामर्थ्य और कारित्वमें व्याप्यव्यापकभाव
नहीं मानते हो । अर्थात् आपसमे जहाँ व्याप्यव्यापकभाव रहता है,
वहीं आंशिक विरोध भी रह सकता है ।
यदि इसके लिये व्याप्यव्यापकभाव मानो तो जैसे वृक्ष होता हुआ
१. यदि कारित्वं सामर्थ्येन प्रतिषिध्येत तदाऽभावाद्बाधः स्यात्, यदि कारि-
त्वेन सामर्थ्यं प्रतिषिध्येत तदाऽऽपादकासिद्धिरित्यर्थ इति शङ्करमिश्रः ।
८ आत्मतत्त्वविवेके
नाप्युपाधिभेदात् कार्यत्वानित्यत्ववत्, तदभावात् ।
न च शब्दमात्रमुपाधिः, पर्यायशब्दोच्छेदप्रसङ्गात् ।
नापि विकल्पभेदः, स्वरूपकृतस्य तस्य व्यावृत्तिभेदकत्वेऽ-
भी आम सीसम नहीं रहता, वैसे ही समर्थ भी अकारी (नहीं
करनेवाला) हो जाय और असमर्थ भी करनेवाला हो जाय। सारांश
यह है कि जो व्यापक होता है वह व्याप्यके बिना भी रह जाता है।
इसलिये यदि सामर्थ्यको व्यापक और कारित्वको व्याप्य मानो तो
समर्थको भी नहीं करनेवाला मानना पड़ेगा। अथवा यदि कारित्वको
व्यापक और सामर्थ्यको व्याप्य मानोगे तो असमर्थको भी करनेवाला
मानना पड़ेगा, जो सर्वथा अयुक्त है।
यदि कहो कि कार्यत्व और अनित्यत्वके समान सामर्थ्य और
कारित्वरूप व्यावृत्तियोंमें भी उपाधिकृत¹ भेद है, तो वह भी ठीक नहीं
है। क्योंकि यहां कोई उपाधि ही नहीं है। अर्थात् कार्यत्व और
अनित्यत्व-धर्ममें गोत्व अश्वत्वके समान आत्यन्तिक या वृक्षत्वशिंशपात्व-
क्षणभङ्गवाद ९
समर्थव्यावृत्तेरपि भेदप्रसङ्गात् । विषयकृतस्य तु तस्य भेद-
कत्वेऽन्योन्याश्रयप्रसङ्गात्¹ ।
न च निर्निमित्त एवायं व्यावृत्तिभेदव्यवहारोऽतिप्रसङ्गात् ।
नापि द्वितीयः । सा च सहकारिसाकल्यं वा प्रातिस्विकी
वा ?
क्योकि सामर्थ्य और कारित्व रूप व्यावृत्तियोंको भिन्न करनेवाला जो
ज्ञानरूप उपाधियोंमें भेद है, उसे स्वरूपकृत मानते हो या विषयकृत ?
यदि प्रथम पक्ष कहो तो असमर्थव्यावृत्ति ( सामर्थ्य ) भी अपने ही से
भिन्न होने लगेगी । क्योंकि असमर्थव्यावृत्तिके ही अनेक बार करके
हुए ज्ञान विषयके एक होनेपर भी स्वरूपत अर्थात् अपने अपने
व्यक्तित्त्वके विचारसे भिन्न भिन्न हैं। यदि द्वितीय पक्ष कहो तो अन्यो-
न्याश्रय दोष आ जायगा । क्योंकि सामर्थ्य और कारित्व रूप विषयमे
भेद ज्ञानभेदके अधीन होगा और उनके ज्ञानोंमे भेद उन्हीं विषयोंके
भेदके अधीन होगा । इस प्रकार अन्योन्याश्रय दोष हो जाता है ।
यदि सामर्थ
न तावदाद्यः पक्षः, सिद्धसाधनात् परा^१नभ्युपगमेन हेत्व-
सिद्धेश्च । यत् सहकारिसमवधानवत् तद्धि करोत्येवेति को नाम
नाभ्युपैति^२ यमुद्दिश्य साध्यते । न चास्मत्काले सहकारि-
समवधानवत्त्व^३ मस्माभिरभ्युपेयते, यतः प्रसङ्गः प्रवर्त्तेत ।
प्रातिस्विकी तु योग्यता अन्वयव्यतिरेक^४विषयीभूत बीजत्वं
वा स्यात्, तदवान्तरजातिभेदो^५ वा सहकारिवैकल्यप्रयुक्तकार्या-
भाववत्त्वं वा ?
सबोंके समवधानके कारण मानते हो अथवा प्रातिस्विकी योग्यता मानते
हो ? अर्थात् स्वभावसे ही प्रत्येक बीजमे यह योग्यता है ?
यहाँ प्रथम पक्ष ठीक नहीं है। क्योंकि तब आपके प्रसङ्ग और
विपर्ययका स्वरूप यह होगा 'कुशूलस्थ बीज यदि अपने सहकारियोंसे
युक्त होता तो अङ्कुर करता, नहीं करता है, इसलिये सहकारियोंसे
युक्त नहीं है । इस स्थितिमें यहाँ सिद्धसाधनदोष आ जाता है । एव
स्थिरवादियोंको कुशूलस्थ बीजमें सहकारियोंका समवधान अस्वीकृत
होनेके कारण प्रसङ्गमे दिया हुआ हेतु भी असिद्ध है । क्योंकि जो
सहकारियोंके सहित है, वह करता ही है" इसे कौन नहीं मानता है ?
जिसके प्रति यह साधन कर रहे हो । एव अङ्कुर नहीं करनेवाले
कुशूलस्थ बीजमे हम सहकारियोंका योग तो मानते नहीं कि आपका
दिया कारित्वका प्रसङ्ग लागू हो ।
आपका द्वितीय पक्ष भी ठीक नहीं है । क्योंकि बीजमें स्वाभाविक
अङ्कुर योग्यता तो तीन प्रकारकी हो सकता है । प्रथम बीजके रहते
अङ्कुर होता है और उसके अभावमे नहीं होता, इसलिये अन्वय-
व्यतिरेकज्ञानका विषयभूत बीजजातिका होना ही अङ्कुर योग्यता है ।
१. पर स्थिरवादी । २ नाभ्युपगच्छति—१ पु० पा०
३. समवधानवत्तास्माभि—१ पु० पा०
४ अन्वयव्यतिरेकेतिपदम् अन्वयव्यतिरेकग्रहपरम् ।
५. बौद्धाभिमतं कुर्वद्रूपत्वम् ।
क्षणभङ्गवादः १९
न तावदाद्यः, अकुर्वतोऽपि बीजजातीयस्य प्रत्यक्षसिद्धत्वात् ।
तवापि तत्राविप्रतिपत्तेः ।
न द्वितीयः१, तस्य२ कुर्वतोऽपि मयानभ्युपगमेन दृष्टान्तस्य
साधनविकलत्वात् । को हि नाम सुस्थात्मा प्रमाणशून्यमभ्युप-
गच्छेत् । स हि न तावत् प्रत्यक्षेणा३नुभूयते, तथानव४सायात् ।
दूसरा, बीजकी किसी अवान्तरजाति—(कुर्वद्रूपत्व) का होना । और
तीसरा, केवल सहकारिहीनताके ही कारण अंकुर न कर सकना । अर्थात्
पत्थरके टुकड़ोंके समान नहीं कि जो सहकारियोंके विद्यमान रहनेपर
भी अंकुर नहीं करते ।
इनमें प्रथम प्रकार (बीजजातिका होना) ठीक नहीं है । क्योंकि
तब आपके प्रसङ्ग और विपर्ययका यह स्वरूप होगा "कुशूलस्थ पदार्थ
यदि बीजजातिका होता तो अंकुर करता, नहीं करता है, इसलिए वह
बीजजातिका नहीं है" । किन्तु अंकुर नहीं करते हुए भी धान्यादिक
बीजजातिके हैं, यह प्रत्यक्षसिद्ध है । उनके बीजजातिके होनेमें तुम्हें
भी विवाद नहीं है ।
बीजका कुर्वद्रूपत्वजातिका होनारूप द्वितीय प्रकारकी योग्यता-
का मानना भी ठीक नहीं है । क्योंकि तब आपके प्रसङ्गका यह
स्वरूप होगा "कुशूलस्थ बीज यदि कुर्वद्रूपत्व-जातिवाला होता तो क्षेत्र-
पतित बीजके समान अंकुर करता" । पर यहाँ मैं अंकुर करनेवाले
क्षेत्रस्थ-बीजमें भी कुर्वद्रूपत्वनामकी जाति नहीं मानता, इसलिये
आपका दृष्टान्त हेतुशून्य है । दृष्टान्त वही होता है, जिसे वादी प्रति-
वादी दोनों एक सा मानते हों । पर कौन स्वस्थ दिमाग वाला व्यक्ति
होगा, जो इस तरहकी प्रमाणशून्य वस्तुको माने । क्योंकि वह
१ नापि द्वितीयः—३ पु० पा०
२. तस्य = जातिविशेषस्य ।
३. प्रत्यक्षम् = निर्विकल्पकम् । निर्विकल्पकस्यैव तन्मते प्रामाण्यस्वी-
कारादित्यर्थः ।
४. अनवसायात् = अनुव्यवसायाभावादित्यर्थः ।
२२ आत्मतत्त्वविवेके
नाप्यनुमानेन, लिङ्गाभावात् । यदि न कश्चिद्विशेषः, कथं
तर्हि करणाकरणे इति चेत्, क एवमाह नेति । परं किं जाति-
भेदरूपः¹ सहकारिलाभालाभरूपो वेति नियामकं प्रमाणमनु-
मरन्तो न पश्यामः ।
तथापि योऽयं सहकारिमध्यमध्यासीनोऽक्षेपकरणस्वभावो²
भावः, स यदि प्रागप्यासीत् तदा प्रसह्य कार्यं कुर्वाणो गीर्वाण-
शापशतेनापि अपहस्तयितुं न शक्यते इति चेत्, युक्तमेतत्
यद्यक्षेपकरणस्वभावत्वम्³ भावस्य प्रमाणगोचरः स्यात्, तदेव कुतः
सिद्धमिति नाधिगच्छामः ।
(कुर्वद्रूपत्व जाति) प्रत्यक्ष से नहीं मालूम पड़ती है । कारण, क्षेत्रस्थ
बीजको देखकर—यह कुर्वद्रूपत्व-जातिवाला है—ऐसा किसीको अनुभव
नहीं होता है ।
अनुमानसे भी कुर्वद्रूपत्वकी सिद्धि नहीं हो सकती है, क्योंकि
इसमे कोई लिङ्ग ( साधन ) नहीं है । यहाँ जो तुम यह पूछो कि "यदि
बखार और खेतके बीजमें कोई विशेषता नहीं है, तो क्यों एक अंकुर
करता है और एक नहीं करता ?" तो विशेषता नहीं है—ऐसा कहता
कौन है ? परन्तु वह विशेषता क्या कुर्वद्रूपत्व-जातिका होना और न
होना है ? अथवा सहकारियोंका लाभ और अलाभरूप है ? इसका
निर्णय करनेवाले प्रमाणका अन्वेषण करते हुए हम उसे ( प्रमाणको )
नहीं पाते हैं ।
' तो भी, जो यह सहकारियोंके मध्यमे रह अविलम्ब अङ्कुरोत्पादक-
स्वभाववाला भाव पदार्थ है, वही यदि पहले ( बखारमे ) भी था, तो
उस समय भी अङ्कुरोत्पत्ति करता हुआ वह आपकी देवताके सौ
शापोंसे भी नहीं रोका जा सकता है" किन्तु ऐसा कहना भी तुम्हारा तब
१. जातिभेदः = कुर्वद्रूपत्वम् ।
२. स्वोत्पत्तिक्षणे एव कारित्वमक्षेपकारित्वम् ।
३. धर्मत्वं ' पु० पा०
क्षणभङ्गवादः १३
प्रसङ्गतद्विपर्ययाभ्यामिति चेत्, न, परस्पराश्रयप्रसङ्गात् ।
एवं स्वभावत्वसिद्धौ¹ हि तयोः प्रवृत्तिः, तत्प्रवृत्तौ चैवंस्वभा-
वत्वसिद्धिरिति ।
स्यादेतत् । कार्यजन्मैव अस्मिन्नर्थे² प्रमाणं, विलम्बकारि-
स्वभावानुवृत्तौ कार्यानुत्पत्तिः सर्वदेति चेत्, न, विलम्बकारिस्व-
भावस्य सर्वदैवाकरणे तत्त्वव्याघातात् । ततश्च विलम्बकारित्वस्य
ठीक हो जबकि भाव-वस्तुका अविलम्ब कार्य उत्पन्न करदेनारूप
स्वभाव प्रमाणित हो । किन्तु वही ( उक्त स्वभाव ) कैसे सिद्ध है, इसे
हम नहीं समझ पाते ।
यदि यह कहो कि “बीज यदि अविलम्ब अङ्कुर करनेका स्वभाव-
वाला न होता तो पत्थरके समान बादमे भी अङ्कुर नहीं करता, किन्तु
अङ्कुर करता है, इस लिये वह अविलम्ब अङ्कुर करनेका स्वभाववाला
है” इस प्रसङ्ग और विपर्य्ययसे उक्त स्वभाव सिद्ध हो जायेगा—
तो यहां अन्योन्याश्रयदोष आ जायगा । क्योंकि कहीं भी पहले इस
प्रकारके स्वभावका होना प्रसिद्ध हो तो उक्त प्रसङ्ग और विपर्य्ययकी
प्रवृत्ति हो सके तथा पहले उक्त प्रसङ्ग और विपर्य्ययकी प्रवृत्ति हो
तब उक्त स्वभावका होना सिद्ध हो । इस प्रकार प्रत्येकको अपनी
सिद्धिके लिये एक दूसरेकी अपेक्षा होनेसे किसीकी भी सिद्धि नहीं
हो सकती है ।
“अस्तु, कार्यकी उत्पत्ति ही बीजके अविलम्बकारी स्वभावका
होनेमे प्रमाण है । क्योंकि यदि यह विलम्बकारी स्वभावका हो तो
उसका वह स्वभाव सदा बना रहेगा, इस प्रकार कभी भी कार्यकी
उत्पत्ति ही नहीं होगी । इससे सिद्ध होता है कि बीज अविलम्बकारी
स्वभावका ही है” यह युक्ति देना भी ठीक नहीं है, क्योंकि विलम्बकारी
स्वभाववाला पदार्थ यदि कभी भी कार्य न करे तो उसका विलम्बकारित्व
अर्थात् विलम्बसे करना यह विशेषण ही असङ्गत हो जायगा । इसलिये
'विलम्बकारी, इस पदका “जब तक सहकारियोंका असंनिधान रहे
१. स्वभावसिद्धौ—१ पु० पा० २. अस्मिन् अलोपकारित्वे ।
९४ आत्मतत्त्वविवेके
यावत्सहकार्यसन्निधानं तावन्न करोतीत्यर्थः । एवं च कार्य-
जन्म सामग्र्यां प्रमापयितुं शक्यते न तु जातिभेदे । ते तु किं
यथानुभवं विलम्बकारिस्वभावाः परस्परं प्रत्यासन्नाः कार्यं कृतवन्तः?
किं वा यथा त्वत्परिकल्पनं विप्रकारिस्वभावाः ? इत्यत्र कार्य-
जनन¹मजागरुकमेवेति ।
नापि तृतीयः, विरोधात् । सहकार्याभावप्रयुक्तकार्याभाव-
चाथं सहकारिविरहे कार्य्याक्षेति व्याहतम् । तस्माद् यद् यद्-
भावे एव यन्न करोति तत् तत् सद्भावे तत् करोत्येव इति तु
स्यात् । एतच्च स्थैर्यसिद्धेरेव परं बीजं सर्वस्वमिति ।
तब तक नहीं करनेवाला" यह अर्थ है । अर्थात् वह सामग्रीके जुटनेपर
ही कार्य करेगा । इस प्रकार कार्यकी उत्पत्ति तो सामग्रीके जुटावमे
प्रमाण हो सकती है न कि तुम्हारी कल्पित कुर्वद्रूपत्व जातिके होने
में । तब क्या वे बीज अनुभवके अनुसार विलम्बकारी स्वभावके
होते हुए भी सहकारियोंसे मिलकर कार्य किये ? अथवा जैसी कि
तुम्हारी कल्पना है—क्षिप्रकारी (अविलम्बकारी) स्वभावके होनेके
कारण ? इसमे कार्य जन्म प्रमाण होनेमें उदासीन है । अर्थात् स्व
कपोलकल्पनाकी अपेक्षा अनुभवको ही प्रमाण मानना समुचित है ।
बीजके स्वाभाविक अङ्कुरयोग्यतापक्षमे तीसरा प्रकार भी ठीक
नहीं है, क्योंकि स्ववचनमे ही विरोध हो जायगा । अर्थात् कुशूलस्थ
बीजको तुम भी सहकारीरहित मानते हो । ऐसी दशामे तुम्हारे
प्रसङ्गका यह स्वरूप होगा "सहकारीरहित बखारका बीज यदि
सहकारीके बिना कार्य (अङ्कुर) न करता हो तो कार्य करे" । यह
परस्पर व्याहत वचन है । इसलिये यह तो हो सकता है कि" जो ही
जिस वस्तुके बिना जिस कार्यको नहीं करता है, वही उस वस्तुके आ
जानेपर उस कार्यको कर देता है"। किन्तु यह तो हमारी स्थैर्य-
सिद्धिका ही एकमात्र मूल है । क्योंकि उक्त नियममें एक ही बीजका
पहले सहकारीके बिना और पीछे सहकारीके साथ रहना सिद्ध होता
हुआ उसके क्षणिकत्वका विरोध करता है ।
१. कर्मोपजनन—३ पु० पा०
क्षणभङ्गवादः १५
एतेन समर्थव्यवहारगोचरत्वं हेतुरिति निरस्तम् । तादृग्-
व्यवहारगोचरस्यापि बीजस्याङ्कुराकरणदर्शनात् । नासौ मुख्यस्तद्-
व्यवहारः१, तस्य जनननिमित्तकत्वात्, अन्यथा ऽनियम-
प्रसङ्गादिति चेत्, कीदृशं पुनर्जंननं मुख्यसमर्थव्यवहारनिमित्तम् ?
न तावदक्षेपकरणं, करणमेवेत्येतत्स्वभावत्वेना२प्युपपत्तेः । ततश्च
जनननिमित्त३ एवायं व्यवहारो न व्याप्तिसिद्धिरिति ।
इससे “समर्थव्यवहारका विषय होना अर्थात् अङ्कुरसमर्थ कहा
जाना ही अङ्कुरकारी होनेमे हेतु है” यह भी खण्डित हो गया।
क्योंकि अङ्कुरसमर्थ कहे जाते हुए भी कुशूलस्थ बीजका अङ्कुर
नहीं करना देखा जाता है ।
यदि 'कुशूलस्थ बीजमे अङ्कुरसमर्थत्वका व्यवहार मुख्य (वास्त-
विक) नहीं है, क्योंकि वास्तविक व्यवहारका कारण तो कार्यका पैदा
करना है, जो कि खेतमे बोये गये बीजमें ही है । अन्यथा भ्रमवशान्
पत्थरमें किया गया अङ्कुर समर्थत्वका व्यवहार भी वास्तविक व्यवहार
हो जायगा" । तो फिर किस प्रकार कार्य पैदा करना वास्तविक समर्थ
व्यवहारका कारण मानते हो ? यहां अविलम्बसे कार्य पैदा करना
समर्थ व्यवहारका निमित्त नहीं हो सकता है, क्योंकि वह असिद्ध है ।
कारण यह है कि कोई भी कारण अपने सहकारियोंके बिना कार्य नहीं
करता, इसलिये विलम्बसे कार्य करना स्वाभाविक है, जो कुशूलस्थ
बीजमें भी है ही । व्यवहारमे अनियम तो इसीसे मिट जायगा कि
बीज सहकारियोंके जुटनेपर ही करता है, और सहकारियोंके जुट
जानेपर करता ही है । इसलिये पत्थरमे अङ्कुर समर्थत्वका व्यवहार
वास्तविक क्यों कर होगा ?
इसलिये कदाचित् अङ्कुर पैदा करना ही अंकुर समर्थत्व-व्यवहारका
निमित्त है, न कि अविलम्ब पैदा करना । अत कुशूलस्थ बीज अंकुर
समर्थ कहा जायगा । पत्थर तो कभी भी अंकुर नहीं करता, इसलिये यह
अङ्कुर समर्थ नहीं कहा जा सकता ।
१. तत्र व्यवहार —१ पु० पा० २. स्वभावत्वे—१ पु० पा० ।
३. जनननिबन्धन —१ पु० पा०
१६ आत्मतत्त्वविवेके
स्यादेतत् । एतावतापि भावस्य कः स्वभावः समर्थितो
भवति ? न हि क्षेपाक्षेपाभ्यामन्यः प्रकारोऽस्तीति चेत् , 'न,
दूषणाभिधानसमये१ निश्चयाभावेनैव संदिग्धासिद्धिनिर्वाहे कथापूर्व-
रूप२पर्यवसानात् । उत्तरपक्ष३समये तु सोऽपि न दुर्वचः ।
इस प्रकार "जो समर्थ व्यवहारका विषय होता है, वह अङ्कुर
करता है" यह व्याप्ति असिद्ध है । अतः प्रसङ्गोपस्थापनमे मूल शैथिल्य
हो जाता है । अथवा "जो सत् है वह क्षणिक है" यह व्याप्ति नहीं
सिद्ध हो सकती है । अतः पूर्वमे कहा गया आपका अनुमान क्षणिक-
वादमे प्रमाण नहीं हो सकता है ।
"अस्तु, फिर भी भाववस्तुके कौनसे स्वभावका आप समर्थन
करते हैं ? विलम्बसे करनेका या अविलम्बसे ( तत्क्षण ) करनेका ?
इन दो प्रकारोंसे भिन्न तीसरा प्रकार नहीं हो सकता है । अर्थात्
किसी भी पदार्थको या तो विलम्बसे कार्य करनेवाला अथवा अविलम्ब
कार्य करनेवाला माना जा सकता है । यदि विलम्बसे कार्य करना
स्वभाव मानें तो सहकारियोंका योग रहनेपर भी नहीं करेगा । यदि
अविलम्ब ( तत्क्षण ) कार्य करना स्वभाव माने तो सहकारीकी विना
प्रतीक्षा किये अकेला ही कर देगा" इस प्रकारका उपर्युक्त प्रश्न नहीं
कर सकते हो । क्योंकि इस प्रकारके प्रश्नसे तुम्हारा अभिप्राय मालूम
होता है कि तुम सभी भावोंका अविलम्बकारित्व स्वभाव मनवा कर
प्रकृतमे यह प्रसङ्ग देना चाहते हो कि "बखारका बीज अविलम्बकारी
होता तो अङ्कुर कर देता" । किन्तु तुम्हारे पक्षमे दोष देनेके समय
भावोंके स्वभावको अनिश्चय द्वारा सन्देहमे डाले रखकर ही तुम्हारे
साथ हो रही हमारी जल्पकथाका पूर्वरूप पूरा हो जाता है । क्योंकि
भाव स्वभाव का निर्णय हुए बिना तुम्हारे पूर्वोक्त प्रसङ्गमे सन्दिग्धा-
सिद्धिदोष बिना प्रयासके ही आ जाता है और तुम्हारा प्रसङ्ग खटाई
में ही रह जाता है ।
१. दूषणावसरे—१ पु० पा०
२. पूर्वरूपम् = परपक्षखण्डनम् ।
३. उत्तरपक्षः—स्वपक्षस्य स्थैर्यस्य स्थापनम् ।
क्षणभङ्गवादः १७
तथाहि करणं प्रत्यविलम्ब इति कोऽर्थः ? किमुत्पत्तेरनन्तर-
मेव करणं, सहकारिसमवधानानन्तरमेव वा । विलम्ब इत्यपि
कोऽर्थः ? किं यावन्न सहकारिसमवधानं तावदकरणं, सर्वथैवाकरण-
मिति वा । तच्च प्रथमचतुर्थयोः प्रमाणाभावादनिश्चयेऽपि द्वितीय-
तृतीययोः प्रत्यक्षमेव प्रमाणम् । बीजजातीयस्य १ हि सहकारिसम-
वधानानन्तरमेव करणं करणमेवेति प्रत्यक्षसिद्धमेव । तथा सह-
कारिसमवधानरहितस्याकरणमित्यपि ।
अत्र च भवानपि न विप्रतिपद्यत एव, प्रमाणसिद्धत्वात् विपर्य-
अपने पक्षका समर्थन रूप कथाके उत्तरपक्षके अवसरमें तो भावों
का स्वभाव बतलाना भी कठिन नहीं है । क्योंकि कार्य करनेमे
अविलम्बका क्या अभिप्राय है ? क्या जब ही वह कारण जन्म
ले, उसके दूसरे क्षणमें ही कार्य करना ? या कभीका जन्मा होकर
भी अपने सहकारियोंके बाद ही कार्य करना ? तथा विलम्बसे भी
करनेका क्या अभिप्राय है ? क्या जबतक सहकारियोंका सन्निधान
न हो तबतक न करना ? अथवा कभी भी न करना ? इन चारों
पक्षोंमें प्रथम और चतुर्थ पक्ष असिद्ध है । क्योंकि पैदा होते ही
करनेमें कोई प्रमाण नहीं है । एवं यदि कभी भी न करे तो संसार
मे कभी कोई कार्य ही न दीख पड़े ।
इनमे दूसरा और तीसरा पक्ष यदि आपको अभिप्रेत हो तो उसमें
प्रत्यक्ष ही प्रमाण है । क्योंकि बीजजातिका सहकारियोके योगमे
ही करना और अवश्य करना यह तो प्रत्यक्ष-सिद्ध ही है । इसी तरह
सहकारियोंके अभावमे नहीं करना भी प्रत्यक्षसे ही सिद्ध है । इन
दूसरे और तीसरे पक्षोंके माननेमें आपको भी विरोध नहीं होगा,
क्योंकि ये प्रत्यक्षसिद्ध हैं । बल्कि इनके न माननेमें ही अनेक
बाधायें हैं ।
१. क्षणिकत्ववादिभिरेकस्यां व्यक्तौ करणाकरणयोरनङ्गीकारात् बीज-
जातीयस्येत्युक्तम् ।
१८ आत्मतत्त्वविवेके
ये बाधकाच्च। तथाहि यदि सहकारिविरहेऽकुर्वाणस्तत्समव-
धानेऽपि न कुर्यात्, तज्जातीयमकारणमेव१ स्यात्, समवधानासम-
वधानयोरुभयोरप्यकरणात्।
एवं तत्समवधानविरहेऽपि यदि कुर्यात्, सहकारिणो न
कारणं स्युः, तानन्तरेणापि करणात्। तथा चानन्यथासिद्धान्वय-
व्यतिरेकवतामप्यकारणत्वे कार्यस्याकस्मिकत्वप्रसङ्गः२। तथा
च कादाचित्कत्व३विहतिरिति।
क्योंकि सहकारियोंके अभावमे न करनेवाला कारण यदि सह-
कारियोंके सन्निधानमे भी कार्य न करे तो वह जाति ही अकारण हो
जायगी। क्योंकि सहकारीका सन्निधान और असन्निधान दोनों दशाओं
में यह वस्तु नहीं करती है। जैसे कि मिट्टी, पानी आदि सहकारियोंके
योगमे अथवा अभावमे भी पत्थरसे अंकुर नहीं पैदा होता, इसलिये
समझा जाता है कि पत्थर जाति ही अंकुरके प्रति अकारण है।
इसी प्रकार सहकारियोंके असन्निधानमे भी यदि कार्य करे तो
सहकारी पदार्थ कारण ही न कहे जॉय, क्योंकि उनकी बिना अपेक्षा
किये ही कार्य कर देता है। इस प्रकार जो वस्तु अन्यथासिद्ध नहीं
है और कार्यके साथ अन्वय-व्यतिरेक सहचार वाली है, वह भी यदि
कारण न हो तो विश्वका कार्यमात्र ही आकस्मिक (बिना कारणका)
हो जायगा। अर्थात् कार्योत्पत्तिकी कोई व्यवस्था ही नहीं रह
जायगी। ऐसी दशामे कार्यका किसी समयमे नहीं रहना और पीछे
हो जाना—यह नहीं बनेगा। क्योंकि कार्यको कारणके अधीन माननेसे
ही कारणके अभावमे कार्यका नहीं होना और कारणकी सत्तामे कार्यका
होना—यह व्यवस्था बन पाती है। बिना कारणके कार्य माननेमें तो
कब कार्य होगा और कब नहीं होगा—इसका ठिकाना ही नहीं रहेगा।
इस स्थितिमे कार्य या तो सदा ही रहेगा या कभी न होगा।
१. तज्जातीयमवारणं स्यात्—१ पु० पा०
२. कार्यस्याकारणत्वप्रसङ्गः—२ पु० पा०
३. किञ्चित्कालेऽसतः किञ्चित्कालसत्त्वं कादाचित्कत्वम्।
क्षणभङ्गवादः १९
एवं च द्वितीयपक्षविवक्षायामक्षेपकारित्वमेव भावस्य स्व-
भावः । तृतीयपक्षविवक्षायां तु क्षेपकारित्वमेव भावस्य स्वरूपमिति
नोभयप्रकार³ निवृत्तिरिति ।
तथापि किमसमर्थस्यैव सहकारिविरहः, स्वरूपलाभानन्तरं
कर्तुरेव वा सहकारिसमवधानम्, अन्यथा वेति । किं नियामक-
मिति चेत् इदमुच्यते । कुशूलस्थबीजस्याङ्कुरानुकूलः शिलाशक-
इस प्रकार भाव पदार्थका क्या स्वभाव है ? इस प्रश्नका यही उत्तर
हो सकता है कि—अविलम्ब और विलम्बके पूर्वोक्त चारो पक्षोंमे यदि
दूसरा लिया जाय तो अविलम्बसे करना ही भाववस्तुका स्वभाव है और
तीसरे पक्षके लिये जाने पर तो विलम्बसे करना ही भावका स्वभाव है।
इस तरह परिस्थितिके अनुसार अविलम्बसे करना और विलम्बसे
करना दोनों ही भावके स्वभाव हैं।
"फिर भी इसका निर्णय कैसे हो कि जो असमर्थ रहता है वही
सहकारियोंसे विहीन रहता है और जो अपना स्वरूप पाते ही कार्य कर
देता है, उसीको सहकारियोंका योग प्राप्त होता है—यह ठीक है, अथवा
समर्थ भी कभी सहकारियोंसे रहित रहता है और वही कभी सहकारी
पाकर कार्य कर देता है—यह ठीक है ? तात्पर्य यह है कि समर्थको
(कुर्वद्रूपको) ही सहकारियोंका योग प्राप्त होता है और वह उनसे
च्युक्त होकर कभी नहीं रहता है। इसलिये कुर्वद्रूप (कार्योन्मुख) जो
क्षेत्रस्थ बीज है, वही अंकुर समर्थ है—ऐसा मानना चाहिये। कुशूलस्थ
बीजको तो अंकुर समर्थ कहना और यह कहना कि वही भविष्यमें
सहकारियोंका योग पाकर अंकुर करता है, दोनों ही गलत हैं।" इस तरह
के प्रश्न और तात्पर्यवर्णन पर तुमसे मै यह पूछता हूँ कि पत्थरोंके
टुकड़ोंकी अपेक्षा कुशूलस्थ बीजमें ऐसी कोई विशेषता, जो अंकुरके
अनुकूल हो, है कि नहीं ? यदि नहीं है तो अंकुर चाहने वाले व्यक्ति
की नियमतः एक तरफ (कुशूलस्थ बीजकी ओर) प्रवृत्ति और दूसरी
तरफ से (पत्थर खण्डकी ओरसे) निवृत्ति नहीं होनी चाहिये।
३. नोभयाकार—१ पु० पा०
२० आत्मतत्त्वविवेके
लात् कश्चिदस्ति विशेषो न वा ? न चेन्नियमनेनैव प्रवृत्तिः
अन्यस्मा¹न्निवृत्तिश्च तदर्थिनो न स्यात् । परम्परयाङ्कुरप्रभवस-
मर्थबीजक्षणजननादयमेवेति चेत्, कदा पुनः परम्परयापि तथा-
भूतं करिष्यतीति । तत्र सन्देह इति चेत्, स पुनः किमाकारः ?
किं सहकारिषु समवहितेष्वपि करिष्यति न चेति, उतासमवहितेष्वपि
तेषु करिष्यति न चेति ।
अथ यदा सहकारिसमवधानं तदैव करिष्यत्येव², परं कदा
तेषां समवधानमिति सन्देहः । न तावत् पूर्वः, सामान्यतः
कारणत्वावधारणे तस्यानवकाशात्, अनवकाशे वा कारणत्वानवधा-
रणात् । नापि द्वितीयः, सहकारिणां तस्यानवधारणे तस्यानवकाशात्,
यदि कहो कि—पत्थरसे वखारके बीजमे यही विशेषता है कि
वखारका बीज अंकुर जमानेमे समर्थ क्षेत्रस्थबीजके क्षणका परम्परा
जनक है—तो बताओ कि परम्परा भी वह क्षेत्रस्थबीजके क्षणको कब
पैदा करेगा ? यदि कहो कि इसमे सन्देह है, तो वह सन्देह किस प्रकार
का है ? क्या—सहकारियोंके रहनेपर भी वह करेगा या नहीं—इस प्रकार
का है ? अथवा सहकारियोंके नहीं रहनेपर भी करेगा या नहीं—इस
प्रकारका है ? अथवा जब सहकारियोंका योग होगा तभी करेगा और
अवश्य करेगा पर कब सहकारियोंका योग होगा—इसमे सन्देह है ?
इनमे प्रथम प्रकारका संशय नहीं हो सकता है । क्योंकि सामान्य
रूपसे बीजमे कारणत्वका निश्चय रहनेपर संशय नहीं हो सकता है ।
यदि संशय होगा तो बीज जातिमे कारणत्व ही नहीं बन सकेगा, जो कि
प्रत्यक्षसे सिद्ध है ।
द्वितीय संशयपक्ष भी नहीं हो सकता है । क्योंकि सहकारियों
मे यदि कारणत्वका निश्चय है तो उक्त संशयका अवसर ही नहीं होगा,
यदि संशय होगा तो इस स्थितिमे सहकारियोंमे कारणताका निश्चय
१ अपरस्मा—१ पु० पा०
२ करोत्येव—१ पु० पा०
क्षणभङ्गवादः २१
अवकाशे वा तेषां तत्त्वानवधारणात् । तृतीये तु सर्व एव
तत्सन्तानान्तःपातिनो बीजक्षणाः समानशीलाः प्राप्नुवन्ति, यत्र
तत्र सहकारि समवधाने सति करणनियमात्, सर्वत्र च सहकारि-
समवधानसम्भवात् ।
समर्थ एव क्षणे क्षित्यादिसमवधानमिति चेत्, किमसमर्थे
सहकारिसमवधानमेव नास्ति ? समवधाने सत्यपि वा तस्मान्न
कार्यजन्म ?
नाद्यः, शिलाशकलादावपि क्षिति-सलिल-तेजः-पवनयोग-
दर्शनात् ।
न द्वितीयः, शिलाशकलादिव कदाचित् सहकारिसाकल्यव-
तोऽपि बीजादङ्कुरानुत्पत्तिदर्शनात्¹ ।
ही नहीं हो सकेगा । किन्तु सहकारियोंमे भी कारणत्व है, इसे पहले
ही सिद्ध किया जा चुका है। अतः द्वितीय संशयपक्ष भी अनुपपन्न है ।
तृतीय संशयपक्षमे तो बखारमे रहनेसे लेकर खेतमे जाने तक
बीजके जितने भी क्षण हैं, वे सभी समान स्वभाववाले सिद्ध हो जाते हैं ।
क्योंकि जिस तिस क्षणमे सहकारीका सन्निधान होने पर कार्य पैदा हो
सक्ता है और सभी क्षणोमे सहकारीका सन्निधान भी हो सक्ता है ।
इस प्रकार सम्पूर्ण बीजजातिमे अङ्कुरकारणत्व सिद्ध होता है ।
यदि कहो कि “जिस क्षणमे अङ्कुर पैदा होता है, उसी क्षणमे मट्टी
पानी आदिका योग हो सकता है, बाकी क्षणोंमे नहीं, इसलिये सभी
क्षण समानशील नहीं हो सकते।” तो क्या असमर्थ क्षणमे सह-
कारियोंका योग ही नहीं हो सकता है ? अथवा योग होने पर भी
उससे कार्यकी उत्पत्ति ही नहीं हो सकती है ? यहाँ प्रथम पक्ष ठीक
नहीं है। क्योंकि प्रस्तरखण्डादिमे भी मट्टी पानी गर्मी और हवाका
योग देखा जाता है । दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं है, क्योंकि पत्थरके
टुकड़ोंके समान कभी सहकारियोंका योग पाकर भी बीज से अङ्कुरकी
उत्पत्ति नहीं होनी चाहिये ।
१. प्रसङ्गात् इति पाठः समुचितः ।
२२ आत्मतत्त्वविवेके
एवमपि स्यात्, को दोषः इति चेत्, न तावदिदमुपलब्धम् ।
आशङ्क्यत इति चेत् न, तत्समवधाने सत्यपि अकरणवत् तद्विरहे-
ऽप्याशङ्क्येत । आशङ्क्यतामिति चेत्, तर्हि बीजविरहेऽप्या-
शङ्क्येत । तथा च सति साध्वी प्रत्यक्षानुपलम्भपरिशुद्धिः ।
स्यादेतत्, न बीजादीनां परस्परसमवधानवतामेव कार्यकरण-
मङ्गीकृत्याशङ्क्यते येन समवधाननियमात् सर्वेषामेव तज्जाती-
यानामेकरसतानिश्चयः स्यात्, नापि यत्र तत्र समर्थोत्पत्तिमङ्गी-
“ऐसा भी रहे, हानि क्या है ?” यह कहना ठीक नहीं। क्योंकि
ऐसा कहीं देखा नहीं गया है। यदि कहो, “ऐसी संभावना की जाती
है” तो ठीक नहीं है। क्योंकि सहकारियोंके योगमे भी जैसे नहीं करने
की संभावना करते हो, वैसे सहकारियोंके अभावमे करनेकी भी
संभावना की जानी चाहिये। यदि कहो “ऐसी भी संभावना की जा
सकती है” तो बीजके बिना भी कार्य होनेकी संभावना की जानी
चाहिये। ऐसी दशामें अंकुर पैदा करनेके लिये नियमसे बीजकी ओर
प्रवृत्ति नहीं होगी। तब तो अन्वय और व्यतिरेकके द्वारा आप कार्य-
कारणभावका अच्छा निश्चय करेंगे। अर्थात् विपरीत संभावनाओंके
कारण कहीं भी कार्यकारणभावका निश्चय नहीं होगा और नियमित प्रवृत्ति
या निवृत्ति नहीं होगी। इस प्रकार संसारकी सब चेष्टायें अव्यवस्थित
हो जायेंगी।
“अस्तु, कुर्वद्रूपताकी अपेक्षा किये बिना बीज मट्टी-पानी आदि
कारण पारस्परिक सहयोगको पाकर ही कार्य करते हैं—यह मानता हुआ
मैं क्षणिकत्वका आपादन नहीं करता, जिससे अंकुर करनेमे सहका-
रियोंके सन्निधानका नियम होनेके कारण एक ही जातिके कुशूलस्थ और
क्षेत्रस्थ सभी बीजोंमे समान स्वभाव (अंकुर सामर्थ्य) का होना
निश्चित हो सके। एवं जहाँ कहीं अंकुर-समर्थ बीजक्षणकी उत्पत्ति
मानकर भी मैं क्षणिकत्वसिद्धि नहीं करना चाहता, जिससे सहकारि-
हीनताकी दशामे भी कभी कार्य करनेकी संभावनामें कार्यकारणका
परस्पर ग्रहण किये गये अन्वय व्यतिरेक नि... का भङ्ग हो जा...
क्षणभङ्गवादः २३
कृत्य येन विकलेभ्योऽपि कदाचित् कार्यजन्मसंभावनायां
प्रत्यक्षानुपलम्भविरोधः १ स्यात् । किन्नाम बीजादिषु समवहिते-
ष्ववान्तरजातिविशेषमाश्रित्यापि कार्यजन्म सम्भाव्यत इति ।
न, दृष्टसमवधानमात्रेणैवोपपत्तौ तत्कल्पनायां प्रमाणाभावात्
एकत्र जुटे हुए बीजादिकोंमे अवान्तर जातिविशेष (कुर्वद्रूपत्व) का
आश्रय करके ही कार्योत्पत्ति संभव है—ऐसा मानकर ही मैं क्षणिकत्वकी
सिद्धि करना चाहता हूँ। इसलिये हमारे और आपके बीच मुख्यतया
विवादका विषय यही है कि अङ्कुर करनेवाले क्षेत्रस्थबीजमे कुर्वद्रूपत्व-
नामकी जाति रहती है या नहीं ? जो कि अङ्कुर न करनेवाले कुशूलस्थ
बीजमे न रहती हो। इस विवादमे कुशूलस्थ बीजसे क्षेत्रस्थ बीजको
पृथक् कर देनेवाली उक्त जातिके (कुर्वद्रूपत्व) सिद्ध हो जानेपर मेरा
क्षणिकवाद स्वत सिद्ध हो जाता है।"
पर इस प्रकारसे कुर्वद्रूपत्व जातिका मानना और उससे क्षणिकत्वकी
सिद्धिकरना भी ठीक नहीं है। क्योंकि खेतमे रहनेकी दशामे वह
बीज सहकारियोंके सहित देखा गया है, बखारमे रहनेकी दशामे
वही बीज सहकारियोंसे रहित देखा गया है, इसीसे अङ्कुर करना
और न करना दोनों ही बन जाते हैं। अतः कुर्वद्रूपत्वनामकी नयी
जातिकी कल्पनामें कोई प्रमाण नहीं है। क्योंकि बीजत्व-जातिको
अंकुरका निमित्त माननेमे लाघव है, जो प्रत्यक्षसिद्ध है। इसके विप-
रीत अतीन्द्रिय (अप्रत्यक्ष) कुर्वद्रूपत्व-जातिकी कल्पना करनेमें गौरव
दोष है।
दूसरा दोष यह है कि इन्द्रियादि अतीन्द्रिय (सूक्ष्म) वस्तुओंका
विलोप हो जायगा। क्योंकि तुम्हारे मतानुसार बाहरी आलोक आदि
कुर्वद्रूप ही वस्तुओंके साक्षात्कारके प्रति कारण हो जायेंगे और इन्द्रियाँ
अकारण हो जायेंगी।
तीसरा दोष यह है कि कुर्वद्रूपत्वमे बीजत्वका संग्राहकत्व या प्रति-
क्षेपकत्वरूप विकल्प नहीं बन सकता है, क्योंकि कुर्वद्रूपत्व जाति बीजत्व-
१. प्रत्यक्षानुपलम्भविरोध इति सं० मि० सम्मतः पाठः
२४ आत्मतत्त्वविवेके
कल्पनागौरवप्रसङ्गप्रतिहतत्वात् अतीन्द्रियेन्द्रियादिलोपप्रसङ्गात्
विकल्पानुपपत्तेः विशेषस्य विशेषं प्रति प्रयोजकत्वाच्चेति ।
तथाहि उत्पत्तेरारभ्य मुद्गरप्रहारपर्यन्तं घटस्तान्द् जात्यन्त-
रानाक्रान्त एवानुभूयमानः क्रमवत्सहकारिवैचित्र्यात् कार्यकोटोः१
सरूपा विरूपाः करोति । तत्र एतावतेव सर्वस्मिन् समञ्जसे
अनुपलभ्यमानजातिकोटिस्त्वन्ना२ केन प्रमाणेन केन चोपयोगेन,
येन कल्पनागौरवप्रसङ्गदोषो न स्यात्३ । यो यदर्थं कल्प्यते
तस्यान्यथासिद्धिरैव तस्याभाव इति भवानेव आह इति ।
जातिकी संग्राहिका नहीं हो सकती है, जैसे कि शिंशपात्व जाति वृक्षत्व
जातिकी संग्राहिका होती है । एव कुर्वद्रूपत्व-जाति बीजत्वकी प्रति-
क्षेपिका भी नहीं हो सकती है, जैसे कि गोत्वजाति अश्वत्वकी प्रतिक्षेपिका
होती है ।
तुम्हारे कथन के विरुद्ध चौथा आक्षेप यह है कि बीजविशेष
(कुर्वद्रूपबीज) अङ्कुरविशेष के प्रति कारण है, इससे अङ्कुरसामान्यके
प्रति बीजसामान्यका कारण होना खण्डित नहीं होता है। क्योंकि
जैसे विशेषका कारण विशेष होता है, वैसे सामान्य भी सामान्यका
कारण होता है ।
उपर्युक्त मेरे कथनमें उपपत्ति यह है कि घट अपनी उत्पत्तिसे
लेकर मुद्गरप्रहार तक अर्थात् विनाशपर्यन्त घटत्वके अतिरिक्त कुर्वद्रूपत्व
आदि जातियोंसे अनाक्रान्त ही अनुभव में आता हुआ क्रमश प्राप्त
सहकारियों की विचित्रताके कारण ही सरूप या विरूप विविध कार्योंको
करता है । अतः जब इतनेसे ही सब कुछ बन जाता है, तब अनुभवमे
नहीं आनेवाली कुर्वद्रूपत्वजाति की कल्पना किस प्रमाणके आधार
पर या किस प्रयोजनसे की जाय, जिससे कल्पनागौरवप्रसङ्गरूप दोष
१. कर्मकोटी — २ पु० पा०
२. कल्पन—१ पु० पा०
३. न सिद्ध्येत्—२ पु० पा०
क्षणभङ्गवादः २५
दृष्टं च जातिभेदं तिरस्कृत्य स्वभावभेदकल्पनयैव कार्योत्पत्तौ १
सहकारिणोऽपि दृष्टत्वात् कथञ्चित् स्वीक्रियन्ते, अतीन्द्रियेन्द्रि-
यादिकल्पना तु विलीयेत, मानाभावात् विकल्पानुपपत्तेश्च ।
स खलु जातिविशेषः शालित्वसंग्राहको २ वा स्यात् तत्प्रति-
क्षेपको वा । आद्ये कुशूलस्थस्यापि शालेः कथं न तद्रूपत्वम्, ३
द्वितीये स्वभिमतस्यापि शालेः कथं तद्रूपत्वम् । एवं शालित्वमपि
न हो । अर्थात् प्रमाण और प्रयोजनके अभावमें कुर्वद्रूपत्व-जाति
माननेपर कल्पनागौरवप्रसङ्गरूप दोष होगा ही । आपहीका कहना है कि
"जिस प्रयोजनसे जिस वस्तुकी कल्पना की जाती है, उस प्रयोजनकी
प्रकारान्तरसे सिद्धि ही उस वस्तु के अभावमे प्रमाण है।"
एवं प्रत्यक्षसिद्ध बीजत्व-जातिका तिरस्कार करके कुर्वद्रूपत्व-जातिकी
कल्पनासे ही अंकुरादि कार्यकी उत्पत्ति माननेमें सहकारियोंको भी
अंकुरादि कार्यके प्रति कारण मानना निरर्थक हो जायगा । यद्यपि
प्रत्यक्ष दृष्ट होनेके कारण सहकारी भी कारणके रूपमें किसी तरह माने
जा सकते हैं, परन्तु अप्रत्यक्ष इन्द्रियादिकी कल्पना तो प्रमाण न होने
से सर्वथा विलीन हो जायगी । क्योंकि तुम्हारे मतानुसार आलोक
(प्रकाश) गोलकादि गत कुर्वद्रूपत्वसे ही रूप-रसादि ज्ञान हो जायगा
और इन्द्रियाँ अनावश्यक हो जायेंगी ।
अग्रिम विकल्प भी कुर्वद्रूपत्व-जातिमें नहीं बन सकता है । क्योंकि
वह बीजगत जातिविशेष (कुर्वद्रूपत्व) शालित्वका संग्राहक है ? अथवा
उसका प्रतिक्षेपक (विरोधी) है ? यदि प्रथम पक्ष मानो तो बखारमें
रहनेवाला बीज भी तो शालि ही है, फिर उसमे भी क्यों नहीं कुर्व-
द्रूपत्व मानते हो ? यदि द्वितीय पक्ष कहो तो तुम्हारे अभिमत क्षेत्रस्थ
शालिमें भी कुर्वद्रूपत्व कैसे रह सकता है ?
१. कार्योत्पत्तौ-१ पु० पा०
२. शालित्वस्य संग्राहकः- २ पु० पा०
३. तद्रूपवत्त्वम्-२ पु० पा०
तस्य संग्राहकं प्रतिक्षेपकं वा । आद्येऽशालेरतत्त्वप्रसङ्गः१ । द्वितीये
तु शालेरेवातत्त्वप्रसङ्गः ।
न च नोभयमपीति वाच्यम् , विरोधाविरोधयोः प्रकारान्तरा-
भावात् । व्यक्तिभेदेन संग्रहप्रतिक्षेपावपि न विरुद्धाविति२ चेत्,
हतो न्विदानीं तदतज्जातीयताविरोधेन परिदृश्यमानकतिपय-
व्यक्तिप्रतिक्षेपेऽपि मिथः क्वचित् तुरगविहङ्गयोरपि सम्भेद-
सम्भवात् ।
यश्च यस्य जातिविशेषः, स चेत् तं व्यभिचरेद् व्यभिचरेदपि
शिंशपा पादपमविशेषात् , तथा च गतं स्वभावहेतुना । विपर्यये
इसी प्रकार शालित्व-जाति भी कुर्वद्रूपत्व जातिका संग्राहक है ?
अथवा उसका प्रतिक्षेपक अर्थात् विरोधी है ? प्रथम पक्षमे शालिसे भिन्न
मसूर आदिके बीजमे कुर्वद्रूपत्वका अभाव हो जायगा ।
यह भी नहीं कह सकते हो कि 'कुर्वद्रूपत्व और शालित्व परस्पर न
संग्राहक हैं और न विरोधी ही हैं, क्योंकि उनमे या तो परस्पर विरोध
मानना होगा अथवा अविरोध मानना होगा। इन दोनों प्रकारोंसे
अतिरिक्त कोई तीसरा प्रकार हो नहीं सकता है ।
यदि कहो कि "व्यक्ति के भेदसे संग्रह और प्रतिक्षेप दोनों बन सकते
हैं । अर्थात् खेतमे रहने वाले शालिमे शालित्व और कुर्वद्रूपत्व दोनो
साथ रहते हुए परस्परका संग्राहक भी हो सकते हैं और कुशूलस्थ
शालिमें वही शालित्व-जाति कुर्वद्रूपत्वका प्रतिक्षेपक भी हो सकती है
तथा अकेले ही रह सकती है" तब तो एक जातिका अन्य जातिके साथ
विरोध ही लुप्त हो जायगा । क्योंकि प्रत्यक्ष दीख पड़ने वाले कुछ घोडों
और पक्षियोंमे परस्पर विरोध रहते हुए भी कहीं अश्वत्व और पक्षित्व
जातिका मिश्रित होकर भी रहना सम्भव हो जायगा ।
एव, जो जिसकी अवान्तर जाति है वह यदि उसे छोड़कर रहे—
१ अतत्त्वापत्ति —२ पु० पा० द्र० मि० सम्मत
२. संग्रहप्रतिक्षेपावविरुद्धाइविति—१ पु० पा०