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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 62, कुल 530 में से

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पृष्ठ 62

क्षणभङ्गवादः १३
प्रसङ्गतद्विपर्ययाभ्यामिति चेत्, न, परस्पराश्रयप्रसङ्गात् ।
एवं स्वभावत्वसिद्धौ¹ हि तयोः प्रवृत्तिः, तत्प्रवृत्तौ चैवंस्वभा-
वत्वसिद्धिरिति ।
स्यादेतत् । कार्यजन्मैव अस्मिन्नर्थे² प्रमाणं, विलम्बकारि-
स्वभावानुवृत्तौ कार्यानुत्पत्तिः सर्वदेति चेत्, न, विलम्बकारिस्व-
भावस्य सर्वदैवाकरणे तत्त्वव्याघातात् । ततश्च विलम्बकारित्वस्य
ठीक हो जबकि भाव-वस्तुका अविलम्ब कार्य उत्पन्न करदेनारूप
स्वभाव प्रमाणित हो । किन्तु वही ( उक्त स्वभाव ) कैसे सिद्ध है, इसे
हम नहीं समझ पाते ।
यदि यह कहो कि “बीज यदि अविलम्ब अङ्कुर करनेका स्वभाव-
वाला न होता तो पत्थरके समान बादमे भी अङ्कुर नहीं करता, किन्तु
अङ्कुर करता है, इस लिये वह अविलम्ब अङ्कुर करनेका स्वभाववाला
है” इस प्रसङ्ग और विपर्य्ययसे उक्त स्वभाव सिद्ध हो जायेगा—
तो यहां अन्योन्याश्रयदोष आ जायगा । क्योंकि कहीं भी पहले इस
प्रकारके स्वभावका होना प्रसिद्ध हो तो उक्त प्रसङ्ग और विपर्य्ययकी
प्रवृत्ति हो सके तथा पहले उक्त प्रसङ्ग और विपर्य्ययकी प्रवृत्ति हो
तब उक्त स्वभावका होना सिद्ध हो । इस प्रकार प्रत्येकको अपनी
सिद्धिके लिये एक दूसरेकी अपेक्षा होनेसे किसीकी भी सिद्धि नहीं
हो सकती है ।
“अस्तु, कार्यकी उत्पत्ति ही बीजके अविलम्बकारी स्वभावका
होनेमे प्रमाण है । क्योंकि यदि यह विलम्बकारी स्वभावका हो तो
उसका वह स्वभाव सदा बना रहेगा, इस प्रकार कभी भी कार्यकी
उत्पत्ति ही नहीं होगी । इससे सिद्ध होता है कि बीज अविलम्बकारी
स्वभावका ही है” यह युक्ति देना भी ठीक नहीं है, क्योंकि विलम्बकारी
स्वभाववाला पदार्थ यदि कभी भी कार्य न करे तो उसका विलम्बकारित्व
अर्थात् विलम्बसे करना यह विशेषण ही असङ्गत हो जायगा । इसलिये
'विलम्बकारी, इस पदका “जब तक सहकारियोंका असंनिधान रहे
१. स्वभावसिद्धौ—१ पु० पा० २. अस्मिन् अलोपकारित्वे ।