आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्षणभङ्गवाद ९
समर्थव्यावृत्तेरपि भेदप्रसङ्गात् । विषयकृतस्य तु तस्य भेद-
कत्वेऽन्योन्याश्रयप्रसङ्गात्¹ ।
न च निर्निमित्त एवायं व्यावृत्तिभेदव्यवहारोऽतिप्रसङ्गात् ।
नापि द्वितीयः । सा च सहकारिसाकल्यं वा प्रातिस्विकी
वा ?
क्योकि सामर्थ्य और कारित्व रूप व्यावृत्तियोंको भिन्न करनेवाला जो
ज्ञानरूप उपाधियोंमें भेद है, उसे स्वरूपकृत मानते हो या विषयकृत ?
यदि प्रथम पक्ष कहो तो असमर्थव्यावृत्ति ( सामर्थ्य ) भी अपने ही से
भिन्न होने लगेगी । क्योंकि असमर्थव्यावृत्तिके ही अनेक बार करके
हुए ज्ञान विषयके एक होनेपर भी स्वरूपत अर्थात् अपने अपने
व्यक्तित्त्वके विचारसे भिन्न भिन्न हैं। यदि द्वितीय पक्ष कहो तो अन्यो-
न्याश्रय दोष आ जायगा । क्योंकि सामर्थ्य और कारित्व रूप विषयमे
भेद ज्ञानभेदके अधीन होगा और उनके ज्ञानोंमे भेद उन्हीं विषयोंके
भेदके अधीन होगा । इस प्रकार अन्योन्याश्रय दोष हो जाता है ।
यदि सामर्थ