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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 65, कुल 530 में से

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पृष्ठ 65

१६ आत्मतत्त्वविवेके
स्यादेतत् । एतावतापि भावस्य कः स्वभावः समर्थितो
भवति ? न हि क्षेपाक्षेपाभ्यामन्यः प्रकारोऽस्तीति चेत् , 'न,
दूषणाभिधानसमये१ निश्चयाभावेनैव संदिग्धासिद्धिनिर्वाहे कथापूर्व-
रूप२पर्यवसानात् । उत्तरपक्ष३समये तु सोऽपि न दुर्वचः ।
इस प्रकार "जो समर्थ व्यवहारका विषय होता है, वह अङ्कुर
करता है" यह व्याप्ति असिद्ध है । अतः प्रसङ्गोपस्थापनमे मूल शैथिल्य
हो जाता है । अथवा "जो सत् है वह क्षणिक है" यह व्याप्ति नहीं
सिद्ध हो सकती है । अतः पूर्वमे कहा गया आपका अनुमान क्षणिक-
वादमे प्रमाण नहीं हो सकता है ।
"अस्तु, फिर भी भाववस्तुके कौनसे स्वभावका आप समर्थन
करते हैं ? विलम्बसे करनेका या अविलम्बसे ( तत्क्षण ) करनेका ?
इन दो प्रकारोंसे भिन्न तीसरा प्रकार नहीं हो सकता है । अर्थात्
किसी भी पदार्थको या तो विलम्बसे कार्य करनेवाला अथवा अविलम्ब
कार्य करनेवाला माना जा सकता है । यदि विलम्बसे कार्य करना
स्वभाव मानें तो सहकारियोंका योग रहनेपर भी नहीं करेगा । यदि
अविलम्ब ( तत्क्षण ) कार्य करना स्वभाव माने तो सहकारीकी विना
प्रतीक्षा किये अकेला ही कर देगा" इस प्रकारका उपर्युक्त प्रश्न नहीं
कर सकते हो । क्योंकि इस प्रकारके प्रश्नसे तुम्हारा अभिप्राय मालूम
होता है कि तुम सभी भावोंका अविलम्बकारित्व स्वभाव मनवा कर
प्रकृतमे यह प्रसङ्ग देना चाहते हो कि "बखारका बीज अविलम्बकारी
होता तो अङ्कुर कर देता" । किन्तु तुम्हारे पक्षमे दोष देनेके समय
भावोंके स्वभावको अनिश्चय द्वारा सन्देहमे डाले रखकर ही तुम्हारे
साथ हो रही हमारी जल्पकथाका पूर्वरूप पूरा हो जाता है । क्योंकि
भाव स्वभाव का निर्णय हुए बिना तुम्हारे पूर्वोक्त प्रसङ्गमे सन्दिग्धा-
सिद्धिदोष बिना प्रयासके ही आ जाता है और तुम्हारा प्रसङ्ग खटाई
में ही रह जाता है ।
१. दूषणावसरे—१ पु० पा०
२. पूर्वरूपम् = परपक्षखण्डनम् ।
३. उत्तरपक्षः—स्वपक्षस्य स्थैर्यस्य स्थापनम् ।