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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 67, कुल 530 में से

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पृष्ठ 67

१८ आत्मतत्त्वविवेके
ये बाधकाच्च। तथाहि यदि सहकारिविरहेऽकुर्वाणस्तत्समव-
धानेऽपि न कुर्यात्, तज्जातीयमकारणमेव१ स्यात्, समवधानासम-
वधानयोरुभयोरप्यकरणात्।
एवं तत्समवधानविरहेऽपि यदि कुर्यात्, सहकारिणो न
कारणं स्युः, तानन्तरेणापि करणात्। तथा चानन्यथासिद्धान्वय-
व्यतिरेकवतामप्यकारणत्वे कार्यस्याकस्मिकत्वप्रसङ्गः२। तथा
च कादाचित्कत्व३विहतिरिति।
क्योंकि सहकारियोंके अभावमे न करनेवाला कारण यदि सह-
कारियोंके सन्निधानमे भी कार्य न करे तो वह जाति ही अकारण हो
जायगी। क्योंकि सहकारीका सन्निधान और असन्निधान दोनों दशाओं
में यह वस्तु नहीं करती है। जैसे कि मिट्टी, पानी आदि सहकारियोंके
योगमे अथवा अभावमे भी पत्थरसे अंकुर नहीं पैदा होता, इसलिये
समझा जाता है कि पत्थर जाति ही अंकुरके प्रति अकारण है।
इसी प्रकार सहकारियोंके असन्निधानमे भी यदि कार्य करे तो
सहकारी पदार्थ कारण ही न कहे जॉय, क्योंकि उनकी बिना अपेक्षा
किये ही कार्य कर देता है। इस प्रकार जो वस्तु अन्यथासिद्ध नहीं
है और कार्यके साथ अन्वय-व्यतिरेक सहचार वाली है, वह भी यदि
कारण न हो तो विश्वका कार्यमात्र ही आकस्मिक (बिना कारणका)
हो जायगा। अर्थात् कार्योत्पत्तिकी कोई व्यवस्था ही नहीं रह
जायगी। ऐसी दशामे कार्यका किसी समयमे नहीं रहना और पीछे
हो जाना—यह नहीं बनेगा। क्योंकि कार्यको कारणके अधीन माननेसे
ही कारणके अभावमे कार्यका नहीं होना और कारणकी सत्तामे कार्यका
होना—यह व्यवस्था बन पाती है। बिना कारणके कार्य माननेमें तो
कब कार्य होगा और कब नहीं होगा—इसका ठिकाना ही नहीं रहेगा।
इस स्थितिमे कार्य या तो सदा ही रहेगा या कभी न होगा।
१. तज्जातीयमवारणं स्यात्—१ पु० पा०
२. कार्यस्याकारणत्वप्रसङ्गः—२ पु० पा०
३. किञ्चित्कालेऽसतः किञ्चित्कालसत्त्वं कादाचित्कत्वम्।