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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 56, कुल 530 में से

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पृष्ठ 56

। ' '५१५' '
नापि तदाक्षेपप्रतिषेधाभ्यां वृक्षत्व-शिंशपात्ववत्, परापर-
भावानभ्युपगमात् ।
अभ्युपगमे वा समर्थस्याप्यकरणमसमर्थस्यापि वा करणं
प्रसज्येत ।
बाधदोष¹ तथा कारित्व साध्य रहा तो सामर्थ्य-हेतु नहीं रह सकना, इस
प्रकार असिद्धि दोष आ जाता है । एवं कारित्व हेतुसे सामर्थ्य सिद्ध
करनेमें भी बाध और असिद्धि दोष हो जायगा । क्योंकि विरोधके कारण
हेतुके रहनेपर साध्य नहीं रहेगा और साध्यके रहनेपर हेतु ही नहीं रह
सकेगा । ऐसे ही अकारित्व हेतुसे असामर्थ्यरूप साध्यका अनुमान
करनेमे भी बाध और असिद्धि दोष हो जाते हैं। क्योंकि अकारित्व
रहने पर सामर्थ्यके न होनेसे बाध होगा तथा असामर्थ्य रहने पर
कारित्वका न रहना ध्रुव होनेसे अकारित्व हेतुमे स्वरूपासिद्धि दोष हो
जायगा । इस तरह कुशूल-( बखारी ) स्थ और क्षेत्रस्थ बीजमे पूर्वोक्त
प्रकारसे दिखाया गया प्रसङ्ग और विपर्यय-रूप अनुमान ही दूषित
हो जाता है और क्षणिकत्वसिद्धिके योग्य नहीं रह जाता है ।
"सामर्थ्य और कारित्वरूप व्यावृत्तियोंका वृक्षत्व और शिंशपात्व-
के समान कुछका ग्रहण और कुछका परित्याग कर आंशिक विरोध भी
मानना ठीक नहीं है। अर्थात् जैसे शिंशपात्व-धर्म वृक्षत्वके साथ
सीसमके वृक्षमे रहता भी है, और वृक्षत्व-धर्म वाले आम्रादि वृक्षों-
का परित्याग भी करता है, वैसे ही सामर्थ्य और कारित्व-धर्ममे भी
परस्पर आंशिक विरोध रहेगा और उतनेसे ही दोनों व्यावृत्तियोंमें
भेदकी सिद्धि हो जायगी" यह भी नहीं कह सकते हो । क्योंकि वृक्षत्व
और शिंशपात्वके समान सामर्थ्य और कारित्वमें व्याप्यव्यापकभाव
नहीं मानते हो । अर्थात् आपसमे जहाँ व्याप्यव्यापकभाव रहता है,
वहीं आंशिक विरोध भी रह सकता है ।
यदि इसके लिये व्याप्यव्यापकभाव मानो तो जैसे वृक्ष होता हुआ
१. यदि कारित्वं सामर्थ्येन प्रतिषिध्येत तदाऽभावाद्बाधः स्यात्, यदि कारि-
त्वेन सामर्थ्यं प्रतिषिध्येत तदाऽऽपादकासिद्धिरित्यर्थ इति शङ्करमिश्रः ।