सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 60, कुल 530 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 60

क्षणभङ्गवादः १९
न तावदाद्यः, अकुर्वतोऽपि बीजजातीयस्य प्रत्यक्षसिद्धत्वात् ।
तवापि तत्राविप्रतिपत्तेः ।
न द्वितीयः१, तस्य२ कुर्वतोऽपि मयानभ्युपगमेन दृष्टान्तस्य
साधनविकलत्वात् । को हि नाम सुस्थात्मा प्रमाणशून्यमभ्युप-
गच्छेत् । स हि न तावत् प्रत्यक्षेणा३नुभूयते, तथानव४सायात् ।
दूसरा, बीजकी किसी अवान्तरजाति—(कुर्वद्रूपत्व) का होना । और
तीसरा, केवल सहकारिहीनताके ही कारण अंकुर न कर सकना । अर्थात्
पत्थरके टुकड़ोंके समान नहीं कि जो सहकारियोंके विद्यमान रहनेपर
भी अंकुर नहीं करते ।
इनमें प्रथम प्रकार (बीजजातिका होना) ठीक नहीं है । क्योंकि
तब आपके प्रसङ्ग और विपर्ययका यह स्वरूप होगा "कुशूलस्थ पदार्थ
यदि बीजजातिका होता तो अंकुर करता, नहीं करता है, इसलिए वह
बीजजातिका नहीं है" । किन्तु अंकुर नहीं करते हुए भी धान्यादिक
बीजजातिके हैं, यह प्रत्यक्षसिद्ध है । उनके बीजजातिके होनेमें तुम्हें
भी विवाद नहीं है ।
बीजका कुर्वद्रूपत्वजातिका होनारूप द्वितीय प्रकारकी योग्यता-
का मानना भी ठीक नहीं है । क्योंकि तब आपके प्रसङ्गका यह
स्वरूप होगा "कुशूलस्थ बीज यदि कुर्वद्रूपत्व-जातिवाला होता तो क्षेत्र-
पतित बीजके समान अंकुर करता" । पर यहाँ मैं अंकुर करनेवाले
क्षेत्रस्थ-बीजमें भी कुर्वद्रूपत्वनामकी जाति नहीं मानता, इसलिये
आपका दृष्टान्त हेतुशून्य है । दृष्टान्त वही होता है, जिसे वादी प्रति-
वादी दोनों एक सा मानते हों । पर कौन स्वस्थ दिमाग वाला व्यक्ति
होगा, जो इस तरहकी प्रमाणशून्य वस्तुको माने । क्योंकि वह
१ नापि द्वितीयः—३ पु० पा०
२. तस्य = जातिविशेषस्य ।
३. प्रत्यक्षम् = निर्विकल्पकम् । निर्विकल्पकस्यैव तन्मते प्रामाण्यस्वी-
कारादित्यर्थः ।
४. अनवसायात् = अनुव्यवसायाभावादित्यर्थः ।