आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
पृष्ठ 57, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ें८ आत्मतत्त्वविवेके
नाप्युपाधिभेदात् कार्यत्वानित्यत्ववत्, तदभावात् ।
न च शब्दमात्रमुपाधिः, पर्यायशब्दोच्छेदप्रसङ्गात् ।
नापि विकल्पभेदः, स्वरूपकृतस्य तस्य व्यावृत्तिभेदकत्वेऽ-
भी आम सीसम नहीं रहता, वैसे ही समर्थ भी अकारी (नहीं
करनेवाला) हो जाय और असमर्थ भी करनेवाला हो जाय। सारांश
यह है कि जो व्यापक होता है वह व्याप्यके बिना भी रह जाता है।
इसलिये यदि सामर्थ्यको व्यापक और कारित्वको व्याप्य मानो तो
समर्थको भी नहीं करनेवाला मानना पड़ेगा। अथवा यदि कारित्वको
व्यापक और सामर्थ्यको व्याप्य मानोगे तो असमर्थको भी करनेवाला
मानना पड़ेगा, जो सर्वथा अयुक्त है।
यदि कहो कि कार्यत्व और अनित्यत्वके समान सामर्थ्य और
कारित्वरूप व्यावृत्तियोंमें भी उपाधिकृत¹ भेद है, तो वह भी ठीक नहीं
है। क्योंकि यहां कोई उपाधि ही नहीं है। अर्थात् कार्यत्व और
अनित्यत्व-धर्ममें गोत्व अश्वत्वके समान आत्यन्तिक या वृक्षत्वशिंशपात्व-