आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंन तावदाद्यः पक्षः, सिद्धसाधनात् परा^१नभ्युपगमेन हेत्व-
सिद्धेश्च । यत् सहकारिसमवधानवत् तद्धि करोत्येवेति को नाम
नाभ्युपैति^२ यमुद्दिश्य साध्यते । न चास्मत्काले सहकारि-
समवधानवत्त्व^३ मस्माभिरभ्युपेयते, यतः प्रसङ्गः प्रवर्त्तेत ।
प्रातिस्विकी तु योग्यता अन्वयव्यतिरेक^४विषयीभूत बीजत्वं
वा स्यात्, तदवान्तरजातिभेदो^५ वा सहकारिवैकल्यप्रयुक्तकार्या-
भाववत्त्वं वा ?
सबोंके समवधानके कारण मानते हो अथवा प्रातिस्विकी योग्यता मानते
हो ? अर्थात् स्वभावसे ही प्रत्येक बीजमे यह योग्यता है ?
यहाँ प्रथम पक्ष ठीक नहीं है। क्योंकि तब आपके प्रसङ्ग और
विपर्ययका स्वरूप यह होगा 'कुशूलस्थ बीज यदि अपने सहकारियोंसे
युक्त होता तो अङ्कुर करता, नहीं करता है, इसलिये सहकारियोंसे
युक्त नहीं है । इस स्थितिमें यहाँ सिद्धसाधनदोष आ जाता है । एव
स्थिरवादियोंको कुशूलस्थ बीजमें सहकारियोंका समवधान अस्वीकृत
होनेके कारण प्रसङ्गमे दिया हुआ हेतु भी असिद्ध है । क्योंकि जो
सहकारियोंके सहित है, वह करता ही है" इसे कौन नहीं मानता है ?
जिसके प्रति यह साधन कर रहे हो । एव अङ्कुर नहीं करनेवाले
कुशूलस्थ बीजमे हम सहकारियोंका योग तो मानते नहीं कि आपका
दिया कारित्वका प्रसङ्ग लागू हो ।
आपका द्वितीय पक्ष भी ठीक नहीं है । क्योंकि बीजमें स्वाभाविक
अङ्कुर योग्यता तो तीन प्रकारकी हो सकता है । प्रथम बीजके रहते
अङ्कुर होता है और उसके अभावमे नहीं होता, इसलिये अन्वय-
व्यतिरेकज्ञानका विषयभूत बीजजातिका होना ही अङ्कुर योग्यता है ।
१. पर स्थिरवादी । २ नाभ्युपगच्छति—१ पु० पा०
३. समवधानवत्तास्माभि—१ पु० पा०
४ अन्वयव्यतिरेकेतिपदम् अन्वयव्यतिरेकग्रहपरम् ।
५. बौद्धाभिमतं कुर्वद्रूपत्वम् ।