आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्षणभङ्गवादः २१
अवकाशे वा तेषां तत्त्वानवधारणात् । तृतीये तु सर्व एव
तत्सन्तानान्तःपातिनो बीजक्षणाः समानशीलाः प्राप्नुवन्ति, यत्र
तत्र सहकारि समवधाने सति करणनियमात्, सर्वत्र च सहकारि-
समवधानसम्भवात् ।
समर्थ एव क्षणे क्षित्यादिसमवधानमिति चेत्, किमसमर्थे
सहकारिसमवधानमेव नास्ति ? समवधाने सत्यपि वा तस्मान्न
कार्यजन्म ?
नाद्यः, शिलाशकलादावपि क्षिति-सलिल-तेजः-पवनयोग-
दर्शनात् ।
न द्वितीयः, शिलाशकलादिव कदाचित् सहकारिसाकल्यव-
तोऽपि बीजादङ्कुरानुत्पत्तिदर्शनात्¹ ।
ही नहीं हो सकेगा । किन्तु सहकारियोंमे भी कारणत्व है, इसे पहले
ही सिद्ध किया जा चुका है। अतः द्वितीय संशयपक्ष भी अनुपपन्न है ।
तृतीय संशयपक्षमे तो बखारमे रहनेसे लेकर खेतमे जाने तक
बीजके जितने भी क्षण हैं, वे सभी समान स्वभाववाले सिद्ध हो जाते हैं ।
क्योंकि जिस तिस क्षणमे सहकारीका सन्निधान होने पर कार्य पैदा हो
सक्ता है और सभी क्षणोमे सहकारीका सन्निधान भी हो सक्ता है ।
इस प्रकार सम्पूर्ण बीजजातिमे अङ्कुरकारणत्व सिद्ध होता है ।
यदि कहो कि “जिस क्षणमे अङ्कुर पैदा होता है, उसी क्षणमे मट्टी
पानी आदिका योग हो सकता है, बाकी क्षणोंमे नहीं, इसलिये सभी
क्षण समानशील नहीं हो सकते।” तो क्या असमर्थ क्षणमे सह-
कारियोंका योग ही नहीं हो सकता है ? अथवा योग होने पर भी
उससे कार्यकी उत्पत्ति ही नहीं हो सकती है ? यहाँ प्रथम पक्ष ठीक
नहीं है। क्योंकि प्रस्तरखण्डादिमे भी मट्टी पानी गर्मी और हवाका
योग देखा जाता है । दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं है, क्योंकि पत्थरके
टुकड़ोंके समान कभी सहकारियोंका योग पाकर भी बीज से अङ्कुरकी
उत्पत्ति नहीं होनी चाहिये ।
१. प्रसङ्गात् इति पाठः समुचितः ।