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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 64, कुल 530 में से

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पृष्ठ 64

क्षणभङ्गवादः १५
एतेन समर्थव्यवहारगोचरत्वं हेतुरिति निरस्तम् । तादृग्-
व्यवहारगोचरस्यापि बीजस्याङ्कुराकरणदर्शनात् । नासौ मुख्यस्तद्-
व्यवहारः१, तस्य जनननिमित्तकत्वात्, अन्यथा ऽनियम-
प्रसङ्गादिति चेत्, कीदृशं पुनर्जंननं मुख्यसमर्थव्यवहारनिमित्तम् ?
न तावदक्षेपकरणं, करणमेवेत्येतत्स्वभावत्वेना२प्युपपत्तेः । ततश्च
जनननिमित्त३ एवायं व्यवहारो न व्याप्तिसिद्धिरिति ।
इससे “समर्थव्यवहारका विषय होना अर्थात् अङ्कुरसमर्थ कहा
जाना ही अङ्कुरकारी होनेमे हेतु है” यह भी खण्डित हो गया।
क्योंकि अङ्कुरसमर्थ कहे जाते हुए भी कुशूलस्थ बीजका अङ्कुर
नहीं करना देखा जाता है ।
यदि 'कुशूलस्थ बीजमे अङ्कुरसमर्थत्वका व्यवहार मुख्य (वास्त-
विक) नहीं है, क्योंकि वास्तविक व्यवहारका कारण तो कार्यका पैदा
करना है, जो कि खेतमे बोये गये बीजमें ही है । अन्यथा भ्रमवशान्
पत्थरमें किया गया अङ्कुर समर्थत्वका व्यवहार भी वास्तविक व्यवहार
हो जायगा" । तो फिर किस प्रकार कार्य पैदा करना वास्तविक समर्थ
व्यवहारका कारण मानते हो ? यहां अविलम्बसे कार्य पैदा करना
समर्थ व्यवहारका निमित्त नहीं हो सकता है, क्योंकि वह असिद्ध है ।
कारण यह है कि कोई भी कारण अपने सहकारियोंके बिना कार्य नहीं
करता, इसलिये विलम्बसे कार्य करना स्वाभाविक है, जो कुशूलस्थ
बीजमें भी है ही । व्यवहारमे अनियम तो इसीसे मिट जायगा कि
बीज सहकारियोंके जुटनेपर ही करता है, और सहकारियोंके जुट
जानेपर करता ही है । इसलिये पत्थरमे अङ्कुर समर्थत्वका व्यवहार
वास्तविक क्यों कर होगा ?
इसलिये कदाचित् अङ्कुर पैदा करना ही अंकुर समर्थत्व-व्यवहारका
निमित्त है, न कि अविलम्ब पैदा करना । अत कुशूलस्थ बीज अंकुर
समर्थ कहा जायगा । पत्थर तो कभी भी अंकुर नहीं करता, इसलिये यह
अङ्कुर समर्थ नहीं कहा जा सकता ।
१. तत्र व्यवहार —१ पु० पा० २. स्वभावत्वे—१ पु० पा० ।
३. जनननिबन्धन —१ पु० पा०