सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 71, कुल 530 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 71

२२ आत्मतत्त्वविवेके
एवमपि स्यात्, को दोषः इति चेत्, न तावदिदमुपलब्धम् ।
आशङ्क्यत इति चेत् न, तत्समवधाने सत्यपि अकरणवत् तद्विरहे-
ऽप्याशङ्क्येत । आशङ्क्यतामिति चेत्, तर्हि बीजविरहेऽप्या-
शङ्क्येत । तथा च सति साध्वी प्रत्यक्षानुपलम्भपरिशुद्धिः ।
स्यादेतत्, न बीजादीनां परस्परसमवधानवतामेव कार्यकरण-
मङ्गीकृत्याशङ्क्यते येन समवधाननियमात् सर्वेषामेव तज्जाती-
यानामेकरसतानिश्चयः स्यात्, नापि यत्र तत्र समर्थोत्पत्तिमङ्गी-
“ऐसा भी रहे, हानि क्या है ?” यह कहना ठीक नहीं। क्योंकि
ऐसा कहीं देखा नहीं गया है। यदि कहो, “ऐसी संभावना की जाती
है” तो ठीक नहीं है। क्योंकि सहकारियोंके योगमे भी जैसे नहीं करने
की संभावना करते हो, वैसे सहकारियोंके अभावमे करनेकी भी
संभावना की जानी चाहिये। यदि कहो “ऐसी भी संभावना की जा
सकती है” तो बीजके बिना भी कार्य होनेकी संभावना की जानी
चाहिये। ऐसी दशामें अंकुर पैदा करनेके लिये नियमसे बीजकी ओर
प्रवृत्ति नहीं होगी। तब तो अन्वय और व्यतिरेकके द्वारा आप कार्य-
कारणभावका अच्छा निश्चय करेंगे। अर्थात् विपरीत संभावनाओंके
कारण कहीं भी कार्यकारणभावका निश्चय नहीं होगा और नियमित प्रवृत्ति
या निवृत्ति नहीं होगी। इस प्रकार संसारकी सब चेष्टायें अव्यवस्थित
हो जायेंगी।
“अस्तु, कुर्वद्रूपताकी अपेक्षा किये बिना बीज मट्टी-पानी आदि
कारण पारस्परिक सहयोगको पाकर ही कार्य करते हैं—यह मानता हुआ
मैं क्षणिकत्वका आपादन नहीं करता, जिससे अंकुर करनेमे सहका-
रियोंके सन्निधानका नियम होनेके कारण एक ही जातिके कुशूलस्थ और
क्षेत्रस्थ सभी बीजोंमे समान स्वभाव (अंकुर सामर्थ्य) का होना
निश्चित हो सके। एवं जहाँ कहीं अंकुर-समर्थ बीजक्षणकी उत्पत्ति
मानकर भी मैं क्षणिकत्वसिद्धि नहीं करना चाहता, जिससे सहकारि-
हीनताकी दशामे भी कभी कार्य करनेकी संभावनामें कार्यकारणका
परस्पर ग्रहण किये गये अन्वय व्यतिरेक नि... का भङ्ग हो जा...