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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 69, कुल 530 में से

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पृष्ठ 69

२० आत्मतत्त्वविवेके
लात् कश्चिदस्ति विशेषो न वा ? न चेन्नियमनेनैव प्रवृत्तिः
अन्यस्मा¹न्निवृत्तिश्च तदर्थिनो न स्यात् । परम्परयाङ्कुरप्रभवस-
मर्थबीजक्षणजननादयमेवेति चेत्, कदा पुनः परम्परयापि तथा-
भूतं करिष्यतीति । तत्र सन्देह इति चेत्, स पुनः किमाकारः ?
किं सहकारिषु समवहितेष्वपि करिष्यति न चेति, उतासमवहितेष्वपि
तेषु करिष्यति न चेति ।
अथ यदा सहकारिसमवधानं तदैव करिष्यत्येव², परं कदा
तेषां समवधानमिति सन्देहः । न तावत् पूर्वः, सामान्यतः
कारणत्वावधारणे तस्यानवकाशात्, अनवकाशे वा कारणत्वानवधा-
रणात् । नापि द्वितीयः, सहकारिणां तस्यानवधारणे तस्यानवकाशात्,
यदि कहो कि—पत्थरसे वखारके बीजमे यही विशेषता है कि
वखारका बीज अंकुर जमानेमे समर्थ क्षेत्रस्थबीजके क्षणका परम्परा
जनक है—तो बताओ कि परम्परा भी वह क्षेत्रस्थबीजके क्षणको कब
पैदा करेगा ? यदि कहो कि इसमे सन्देह है, तो वह सन्देह किस प्रकार
का है ? क्या—सहकारियोंके रहनेपर भी वह करेगा या नहीं—इस प्रकार
का है ? अथवा सहकारियोंके नहीं रहनेपर भी करेगा या नहीं—इस
प्रकारका है ? अथवा जब सहकारियोंका योग होगा तभी करेगा और
अवश्य करेगा पर कब सहकारियोंका योग होगा—इसमे सन्देह है ?
इनमे प्रथम प्रकारका संशय नहीं हो सकता है । क्योंकि सामान्य
रूपसे बीजमे कारणत्वका निश्चय रहनेपर संशय नहीं हो सकता है ।
यदि संशय होगा तो बीज जातिमे कारणत्व ही नहीं बन सकेगा, जो कि
प्रत्यक्षसे सिद्ध है ।
द्वितीय संशयपक्ष भी नहीं हो सकता है । क्योंकि सहकारियों
मे यदि कारणत्वका निश्चय है तो उक्त संशयका अवसर ही नहीं होगा,
यदि संशय होगा तो इस स्थितिमे सहकारियोंमे कारणताका निश्चय
१ अपरस्मा—१ पु० पा०
२ करोत्येव—१ पु० पा०