आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्षणभङ्गवादः २३
कृत्य येन विकलेभ्योऽपि कदाचित् कार्यजन्मसंभावनायां
प्रत्यक्षानुपलम्भविरोधः १ स्यात् । किन्नाम बीजादिषु समवहिते-
ष्ववान्तरजातिविशेषमाश्रित्यापि कार्यजन्म सम्भाव्यत इति ।
न, दृष्टसमवधानमात्रेणैवोपपत्तौ तत्कल्पनायां प्रमाणाभावात्
एकत्र जुटे हुए बीजादिकोंमे अवान्तर जातिविशेष (कुर्वद्रूपत्व) का
आश्रय करके ही कार्योत्पत्ति संभव है—ऐसा मानकर ही मैं क्षणिकत्वकी
सिद्धि करना चाहता हूँ। इसलिये हमारे और आपके बीच मुख्यतया
विवादका विषय यही है कि अङ्कुर करनेवाले क्षेत्रस्थबीजमे कुर्वद्रूपत्व-
नामकी जाति रहती है या नहीं ? जो कि अङ्कुर न करनेवाले कुशूलस्थ
बीजमे न रहती हो। इस विवादमे कुशूलस्थ बीजसे क्षेत्रस्थ बीजको
पृथक् कर देनेवाली उक्त जातिके (कुर्वद्रूपत्व) सिद्ध हो जानेपर मेरा
क्षणिकवाद स्वत सिद्ध हो जाता है।"
पर इस प्रकारसे कुर्वद्रूपत्व जातिका मानना और उससे क्षणिकत्वकी
सिद्धिकरना भी ठीक नहीं है। क्योंकि खेतमे रहनेकी दशामे वह
बीज सहकारियोंके सहित देखा गया है, बखारमे रहनेकी दशामे
वही बीज सहकारियोंसे रहित देखा गया है, इसीसे अङ्कुर करना
और न करना दोनों ही बन जाते हैं। अतः कुर्वद्रूपत्वनामकी नयी
जातिकी कल्पनामें कोई प्रमाण नहीं है। क्योंकि बीजत्व-जातिको
अंकुरका निमित्त माननेमे लाघव है, जो प्रत्यक्षसिद्ध है। इसके विप-
रीत अतीन्द्रिय (अप्रत्यक्ष) कुर्वद्रूपत्व-जातिकी कल्पना करनेमें गौरव
दोष है।
दूसरा दोष यह है कि इन्द्रियादि अतीन्द्रिय (सूक्ष्म) वस्तुओंका
विलोप हो जायगा। क्योंकि तुम्हारे मतानुसार बाहरी आलोक आदि
कुर्वद्रूप ही वस्तुओंके साक्षात्कारके प्रति कारण हो जायेंगे और इन्द्रियाँ
अकारण हो जायेंगी।
तीसरा दोष यह है कि कुर्वद्रूपत्वमे बीजत्वका संग्राहकत्व या प्रति-
क्षेपकत्वरूप विकल्प नहीं बन सकता है, क्योंकि कुर्वद्रूपत्व जाति बीजत्व-
१. प्रत्यक्षानुपलम्भविरोध इति सं० मि० सम्मतः पाठः