आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
पृष्ठ 68, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्षणभङ्गवादः १९
एवं च द्वितीयपक्षविवक्षायामक्षेपकारित्वमेव भावस्य स्व-
भावः । तृतीयपक्षविवक्षायां तु क्षेपकारित्वमेव भावस्य स्वरूपमिति
नोभयप्रकार³ निवृत्तिरिति ।
तथापि किमसमर्थस्यैव सहकारिविरहः, स्वरूपलाभानन्तरं
कर्तुरेव वा सहकारिसमवधानम्, अन्यथा वेति । किं नियामक-
मिति चेत् इदमुच्यते । कुशूलस्थबीजस्याङ्कुरानुकूलः शिलाशक-
इस प्रकार भाव पदार्थका क्या स्वभाव है ? इस प्रश्नका यही उत्तर
हो सकता है कि—अविलम्ब और विलम्बके पूर्वोक्त चारो पक्षोंमे यदि
दूसरा लिया जाय तो अविलम्बसे करना ही भाववस्तुका स्वभाव है और
तीसरे पक्षके लिये जाने पर तो विलम्बसे करना ही भावका स्वभाव है।
इस तरह परिस्थितिके अनुसार अविलम्बसे करना और विलम्बसे
करना दोनों ही भावके स्वभाव हैं।
"फिर भी इसका निर्णय कैसे हो कि जो असमर्थ रहता है वही
सहकारियोंसे विहीन रहता है और जो अपना स्वरूप पाते ही कार्य कर
देता है, उसीको सहकारियोंका योग प्राप्त होता है—यह ठीक है, अथवा
समर्थ भी कभी सहकारियोंसे रहित रहता है और वही कभी सहकारी
पाकर कार्य कर देता है—यह ठीक है ? तात्पर्य यह है कि समर्थको
(कुर्वद्रूपको) ही सहकारियोंका योग प्राप्त होता है और वह उनसे
च्युक्त होकर कभी नहीं रहता है। इसलिये कुर्वद्रूप (कार्योन्मुख) जो
क्षेत्रस्थ बीज है, वही अंकुर समर्थ है—ऐसा मानना चाहिये। कुशूलस्थ
बीजको तो अंकुर समर्थ कहना और यह कहना कि वही भविष्यमें
सहकारियोंका योग पाकर अंकुर करता है, दोनों ही गलत हैं।" इस तरह
के प्रश्न और तात्पर्यवर्णन पर तुमसे मै यह पूछता हूँ कि पत्थरोंके
टुकड़ोंकी अपेक्षा कुशूलस्थ बीजमें ऐसी कोई विशेषता, जो अंकुरके
अनुकूल हो, है कि नहीं ? यदि नहीं है तो अंकुर चाहने वाले व्यक्ति
की नियमतः एक तरफ (कुशूलस्थ बीजकी ओर) प्रवृत्ति और दूसरी
तरफ से (पत्थर खण्डकी ओरसे) निवृत्ति नहीं होनी चाहिये।
३. नोभयाकार—१ पु० पा०